The Mysterious Bell – Chapter 1156
"खाली है।" उन्होंने खुद कहा। "मुझे पता है। आज तेरी दुकान पर एक आदमी नहीं आया। शबनम के पास तीन लोग आए। उस्ताद ने कपड़ा उतार दिया है। तुझे खबर भी नहीं होगी — शाम को स्कूल की सभा में मेरा एक आदमी बैठा था। उसने बच्चों के नाम लिखे।"
"बच्चों के नाम?"
"हाँ।" उन्होंने कहा। "जिन बच्चों के माँ-बाप ने कहा कि वो तेरी दुकान के पास नहीं जाएँगे, उनके नाम मेरे पास हैं। और जिन्होंने नहीं कहा, उनके भी।"
"आपको इन नामों से क्या मतलब?"
"तुझे आज समझ आया?" उन्होंने कहा। "अब मैं सीधा आया हूँ। मैं तेरी घंटी नहीं माँगने आया। मैं तेरी दुकान नहीं माँगने आया। मैं तुझे एक बात बताने आया हूँ।"
वो थोड़ा आगे झुके। उनकी आवाज़ धीमी हुई, बहुत धीमी, जैसे कोई आदमी अपने आप से बोल रहा हो।
"धन रणवीर भारद्वाज। तेरे और मेरे बीच फ़र्क़ यह नहीं है कि मैं बुरा हूँ और तू अच्छा है। फ़र्क़ यह है कि तू चीज़ें जोड़ता है और मैं चीज़ें तोड़ता हूँ। और तेरी बड़ी भूल यह है कि तू जोड़ता है लोगों को, पर उन्हें जोड़कर तू मुझसे लड़ रहा है। लोग जब जुड़ते हैं तो मुझमें ताक़त आती है, अंकुश। तूने कभी सोचा? तूने जिन दो भाइयों को जोड़ा, उनके जुड़ने की आधी आवाज़ मेरी जेब में गिरी। तूने जिन दो बुज़ुर्गों को जोड़ा, वही हुआ। तू मुझे ताक़त दे रहा है। और आज तेरी गली चुप है। इसका मतलब है कि तेरी घंटी अंदर से खोखली हो गई। यही सच है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरी आँखें नहीं झुकीं।
"तो आप मुझे क्यों बता रहे हैं?"
"क्योंकि मुझे तुझ पर तरस आता है।" उन्होंने कहा। और फिर उन्होंने धीरे से मुस्कुरा दिया। "और तेरे लिए एक ही रास्ता बचा है। जो मैं तुझे दे सकता हूँ।"
"क्या?"
"तेरी माँ का इलाज।" उन्होंने कहा। "बिना काग़ज़, बिना अंगूठा। तेरे नाम पर नहीं — तेरी माँ के नाम पर। दस दिन की दवा तेरे पास है। मैं उसे महीने में बदल सकता हूँ। अस्पताल का कोई काग़ज़ तुझसे नहीं माँगूँगा। तेरी दुकान का काग़ज़ भी साफ़ कर दूँगा। तेरी गली का नक़्शा नहीं बदलेगा। तू बस एक बात कह — मैं अपनी गली का हिस्सा नहीं हूँ, मैं अंकुश यादव भर हूँ।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"आपने मेरी माँ का नाम लिया।"
"लिया।"
"बुरा किया।" मैंने कहा। "क्योंकि आपने उनका नाम किसी सौदे में लिया है। और मेरी माँ का नाम किसी सौदे में नहीं जाता।"
वो मुस्कुराए। फिर उनका मुँह गंभीर हो गया।
"अच्छा।" उन्होंने कहा। "फिर सुन। कल से इस गली में तेरा नाम नहीं, मेरा नाम होगा। और यह बात मैं दोहराने नहीं आऊँगा।"
खिड़की ऊपर जाने लगी।
"साहब।" मैंने कहा।
वो रुके।
"आपने कहा कि आप काग़ज़ से खेलते हैं। ठीक है। पर मैं आपको एक बात बता दूँ। मेरी गली चुप है, यह सच है। पर चुप गली एक चीज़ करती है, जो शोर वाली गली नहीं करती। वो सुनती है। और लोग जब चुप में सुनते हैं, तब उन्हें सबसे हल्की आवाज़ भी सुनाई दे जाती है।"
खिड़की ऊपर चली गई। काँच बंद हुआ।
गाड़ी चली।
मैं वहीं खड़ा रहा। मेरी जेब में घंटी थी। ठंडी। चुप।
मैंने उसे निकाला। हथेली पर रखा। उस पर चाँद की रोशनी पड़ी। पीतल में मेरा चेहरा दिखा, ऊपर उलटा।
मैंने घंटी से धीरे से कहा —
"सुन। कल अगर कोई नहीं आया, तो भी मैं शटर उठाऊँगा। कल अगर तू चुप रही, तो भी मैं तुझे जेब में रखूँगा। और कल अगर इस गली में मेरा नाम नहीं होगा, तो भी मैं उस गली का लड़का रहूँगा।"
घंटी ने कुछ नहीं कहा।
पर मुझे लगा, जैसे उस पीतल के भीतर कहीं बहुत दूर, बहुत धीमे, किसी ने साँस ली।
मैंने शटर गिराया। उस पर कोयले से लिखा नाम देखा — वो अभी भी वहाँ था। किसी ने नहीं पोंछा।
और मैंने अपनी कॉपी में, आज की तारीख़ के नीचे लिखा —
"आज गली ने मुझसे बात नहीं की। और घंटी ने भी नहीं। पर जब रणवीर की गाड़ी गई, तब मुझे एक बात समझ आई — वो डरता है। डरता है इस बात से कि चुप गली कभी अचानक बोल पड़ेगी।"
नीचे लिखा —
"कल सुबह डॉक्टर इसरानी का रजिस्टर खुलेगा। उसमें एक कटा हुआ नाम है। और मुझे वही नाम चाहिए।"
फिर नीचे —
"कल मैं सबसे पहले उसी आदमी के पास जाऊँगा जो सबसे ज़्यादा डरता है।"
कॉपी बंद की, बत्ती बुझाई और लेट गया।
॥
सुबह मैंने शटर उठाया तो गली में धूल उठी, पर आवाज़ नहीं उठी।
यही सबसे अजीब बात थी। धूल तो उठी — शटर के नीचे से, पहियों की तरह — पर उसके साथ कोई नहीं उठा। न कोई नमस्ते, न कोई "भैया एक मिनट", न कोई साइकिल की घंटी। सिर्फ़ धूल उठी, हवा में घूमी, और वापस बैठ गई।
मैंने शटर पूरा ऊपर किया। ऊपर काजल का वो काग़ज़ अभी भी चिपका था — "आज भी टूटी चीज़ लो"।
आज भी टूटी चीज़ लो।
मैंने उसे देखा और सोचा — आज किसी ने नहीं लिया। आज मैं ख़ुद टूटा खड़ा हूँ और कोई लेने नहीं आया।
मैंने दुकान के बाहर वाली चौकी खींची, बैठा। पीपल की तरफ़ देखा। चबूतरी खाली थी। दरोगा ने कल जो मेज़, कुर्सी, टूलबॉक्स हटवाया था, उसकी जगह पर सिर्फ़ धूल में चौकोर निशान बचा था। जैसे किसी ने वहाँ से कोई चीज़ उठाई हो और ज़मीन याद रखे हुए हो।
मैंने चारों तरफ़ देखा। सामने उस्ताद की दुकान। शटर आधा उठा। मशीन सफ़ेद कपड़े से ढकी। उस्ताद बैठे थे, मोटा चश्मा, कान पर पेंसिल, हाथ में कुछ नहीं। बस हाथ। खाली हाथ। और उनका हाथ उस कपड़े की तरफ़ रखा था, जैसे कोई बच्चा सो रहा हो और वो उसे जगाना नहीं चाहते।
मैंने हाथ उठाया। उन्होंने सिर हिलाया। बस।
आधे घंटे बाद किशनलाल काका आए। अपनी दुकान से, पीछे की गली से, टेढ़ी चाल से। हाथ में चने का लोटा। वो आए, मेरी चौकी के पास खड़े हुए, और कुछ नहीं बोले। बस चने खाते रहे।
मैंने कहा, "काका, बोलिए ना।"
वो चबाते रहे। फिर बोले, "क्या बोलूँ, बेटा। सुबह से तीन आदमी आए थे मेरी दुकान पर। तीनों ने यही पूछा — काका, तुम्हारा काग़ज़ अभी बोरी के नीचे है ना?"
मेरा हाथ रुक गया।
"क्यों?"
"क्योंकि गली में बात चल रही है कि जो तेरे पास आया, उसका घर टूटता है। और जो तेरे पास नहीं आया, वो भी डर रहा है कि कहीं देर से न हो जाए।"
उन्होंने लोटा नीचे रखा। मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें उनके मोटे चश्मे के पीछे छोटी लगीं।
"अंकुश, मैं बूढ़ा हूँ। मैं नहीं जानता ये काला जादू क्या है। पर मैं इतना जानता हूँ — तू जो करता है, वो काला नहीं है। जो काला होता है, वो छिपकर किया जाता है। तू सबके सामने करता है।"
"तो फिर ये बात फैली कैसे?"
"क्योंकि जो बात सबसे ज़ोर से बोली जाती है, वही सच लगती है। और आज सुबह से तीन जगह यही बात बोली जा रही है — स्कूल के गेट पर, नल पर, और चाय की गुमटी पर। तीनों जगह एक ही आदमी की आवाज़ में।"
मैंने पूछा, "कौन?"
"सफ़ेद कुर्ते वाले। दो। सुबह सात बजे आए, अपना पानी का बोतल लाए, चाय पी, और जाते-जाते कह गए — अंकुश भाई के पास जाने से पहले सोच लेना। उनके जोड़ से घर नहीं जुड़ता, घर टूटता है। जोड़ नहीं होता, जाल होता है।"
मैंने मुँह बंद कर लिया।
किशनलाल काका ने मुझे देखा। फिर बोले, "और एक बात। स्कूल के गेट पर बच्चों के नाम लिखे जा रहे हैं। जो बच्चा तेरी दुकान के पास से नहीं गुज़रेगा, उसका नाम अलग सूची में। जो गुज़रेगा —"
वो रुक गए।
"क्या?"
"उसका नाम नहीं लिखा जाएगा।"
मैं उठा। मेरी चौकी पीछे हटी और धूल में लकीर बन गई।
"कौन लिख रहा है?"
"कोई सफ़ेद कुर्ता, हाथ में कॉपी। नाम नहीं पूछा मैंने। पर जो बच्चे नहीं आ रहे, उनकी माँएँ ख़ुद जाकर नाम लिखवा रही हैं।"
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