The Mysterious Bell1157 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1157

7 min read November 5, 2026

मैं वहीं खड़ा रहा। सूरज सिर पर चढ़ रहा था और मुझे ठंड लग रही थी।

मैंने कहा, "काका, आपका काग़ज़ कल सबके सामने खुलेगा।"

वो हँसे। बूढ़ी हँसी, जिसमें दाँत कम थे और सच ज़्यादा था।

"बेटा, अगर कल तक सबके सामने कोई आया। आज गली में सन्नाटा है। कल सन्नाटा और गहरा होगा। फिर तू अकेला बोलेगा और तेरी आवाज़ लौटकर तुझे ही सुनाई देगी।"

वो चले गए। चने का लोटा भूल गए मेरी चौकी पर। मैंने उठाया। उसमें चार चने बचे थे। मैंने एक खाया।

नमक नहीं था। फीका था। पर खाया।

फिर मैं चला।

स्कूल का गेट दोपहर में सबसे ज़्यादा भरा होता है — छुट्टी के वक़्त। मैं वहाँ पहुँचा तो देखा — गेट पर भीड़ थी, पर किसी के हाथ में स्कूल बैग नहीं था। बच्चे गेट के अंदर से बाहर झाँक रहे थे और उनकी माँएँ बाहर खड़ी थीं, आधी माँएँ गेट के अंदर बच्चों को पकड़े हुए थीं, जैसे कह रही हों — देखा? वो आ गया। अंदर रहो।

सानिया की अम्मी सबसे आगे थीं। सानिया उनकी साड़ी के पल्लू में हाथ डाले खड़ी थी।

मैंने दूर से हाथ उठाया। सानिया ने देखा। उसकी आँखें एक पल मेरी तरफ़ आईं, फिर अम्मी के हाथ की तरफ़ चली गईं और वहीं रह गईं।

सानिया की अम्मी ने मुझे देखा। फिर सबको देखा। फिर ज़ोर से बोलीं, "जिसके बच्चे को पढ़ाना है, वो मेरे साथ। जिसे जादूगर के पास भेजना है, वो उस तरफ़ से जाए।"

कुछ औरतें हँसीं।

कुछ नहीं हँसीं।

फिर गुड्डू की अम्मी बोलीं, "मैंने तो कल ही से गुड्डू का रास्ता बदल दिया है। अब वो दूसरी तरफ़ से जाता है।"

मैं वहीं खड़ा रहा। मैंने कुछ नहीं कहा। मुझे किसी से कुछ कहना भी नहीं था। मैं सिर्फ़ यह देखना चाहता था — कौन मेरी तरफ़ देखता है और कौन आँख फेरता है।

पूरा गेट आँखें फेर रहा था। सिर्फ़ एक — पीछे की दीवार से सटी एक औरत — सुनीता दीदी, जो स्कूल में बर्तन धोती हैं — उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। फिर जल्दी से नज़र नीचे कर ली। पर देखा था। मैंने देखा कि उन्होंने देखा था।

मैं वहाँ से चला।

गुमटी पर पहुँचा तो शबनम आपा चूल्हे के सामने बैठी थीं। चिमटी हाथ में थी, पर वो चिमटी से नहीं, बस हाथ से ही कड़ाही को हिला रही थीं। तेल में समोसे पड़े थे और वो देख रही थीं, जैसे देखने के लिए कुछ और नहीं बचा।

"आपा।"

"आ गया।"

"कितने आए?"

"आज?" उन्होंने चिमटी मेज़ पर रखी। "दो। एक ने चाय पी और कह गया कि काग़ज़ हटा दो। दूसरे ने चाय नहीं पी, सिर्फ़ पूछ गया कि रोज़ कितना नुक़सान हो रहा है।"

"और रज़िया?"

"अंदर है। गुस्से में है। कल से बोल नहीं रही मुझसे।"

मैंने पीछे देखा। गुमटी के पीछे वाले कमरे का परदा हिला, फिर रुक गया। रज़िया अंदर थी, सुन रही थी।

"आपा, वो काग़ज़ नहीं उतारा आपने?"

"नहीं।"

"क्यों?"

"क्योंकि मैंने नहीं चिपकाया।" उन्होंने कहा। "जिसने चिपकाया है, वो आकर उतारेगा। अगर मैं ख़ुद उतारूँगी, तो सब कहेंगे — देखो, शबनम भी डर गई। और एक बात, मैं चूल्हा नहीं बुझाऊँगी। ये चूल्हा मेरे बाप ने जलाया था। इसे एक काग़ज़ नहीं बुझा सकता।"

फिर चुपचाप बोलीं, "अंकुश, उस्ताद की दुकान पर आज कुछ हुआ।"

मेरा पेट कस गया।

"क्या?"

"शाम को कोई दो आदमी आए थे। सफ़ेद कुर्ता। साथ में एक और — मोटा, हाथ में फ़ाइल। उन्होंने उस्ताद से कहा — आपकी दुकान का काग़ज़ असली नहीं, आपका लाइसेंस पुराना है, और आपकी दुकान की ज़मीन के काग़ज़ में गड़बड़ है। दो दिन में दुकान खाली कर दें, वरना कल से ताला लगेगा।"

मेरा हाथ मेज़ पर कस गया।

"उस्ताद ने क्या कहा?"

"उस्ताद ने कुछ नहीं कहा।" शबनम आपा ने कहा। "उन्होंने सिर्फ़ अपनी मशीन पर हाथ रखा और बोले — ताले की चाबी बनाने वाले से पूछ लेना, क्या ताला भी चाबी के बिना लगेगा।"

मैंने आँखें बंद कीं।

"और फिर?"

"फिर वो दोनों चले गए। और उस्ताद ने अपनी मशीन पर वो सफ़ेद कपड़ा ओढ़ दिया।"

मैं बाहर निकला। गुमटी के बाहर खड़ा हुआ। गली देखी।

गली खाली थी। पर खाली नहीं भी थी। हर दरवाज़े के पीछे कोई था — परदे के पीछे, खिड़की की जाली के पीछे, दीवार के पीछे। आज गली बंद थी। पूरी गली बंद।

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी।

शाम चार बजे डॉक्टर इसरानी का फोन आया। मेरे फोन की घंटी बजी — पुराने रेडियो जैसी धुन — और उनकी आवाज़ आई, "अंकुश, आज कोई मरीज़ नहीं आया। पूरे दिन एक भी नहीं। अस्पताल के बाहर वाले बोर्ड पर किसी ने सफ़ेद पाउडर से लिख दिया — यहाँ आने से पहले सोच लें।"

मैंने कहा, "डॉक्टर साहब, आप मुझे बताने के लिए फोन कर रहे हैं?"

वो हँसे। बूढ़ी हँसी, थकी हुई।

"मैं तुझे यह बताने के लिए फोन कर रहा हूँ कि तू अकेला नहीं है। मैं भी उसी सूची में हूँ। गुमटी भी। उस्ताद भी। इसका मतलब — हमें एक-दूसरे से बात करनी है।"

मैंने कहा, "कल सुबह रजिस्टर।"

"कल सुबह रजिस्टर।" उन्होंने दोहराया। "पर आज शाम तुम नल पर जाना। मुझे पता है वहाँ कुछ होने वाला है।"

"कैसे पता?"

"क्योंकि जब गली सूखती है, तो पहला झगड़ा पानी पर होता है।"

वो फोन काट गया।

मैं शाम पाँच बजे नल पर पहुँचा। मैं पहले से जानता था कि मुझे वहाँ नहीं जाना चाहिए था। पर मैं गया। क्योंकि मैं यह भी जानता था कि अगर मैं नहीं जाऊँगा, तो कोई और बीच में पड़ेगा, और वो किसी और पर लगेगा।

नल पर भीड़ थी। दस-बारह लोग। दो बाल्टियाँ ज़मीन पर रखी थीं, दोनों भरी हुईं। एक बाल्टी के ऊपर हाथ — सानिया के अब्बा का। दूसरी के ऊपर हाथ — गुड्डू के पापा का।

और बीच में एक नई ईंट तिरछी रखी थी, जिससे नल का पानी गली की तरफ़ फैल रहा था।

"ये ईंट किसने रखी?" सानिया के अब्बा चिल्ला रहे थे।

"मैंने रखी।" गुड्डू के पापा बोले। "पानी गड्ढे में जाता है, मेरी बाल्टी में नहीं आता।"

"तो ईंट रखकर पूरी गली कीचड़ कर दोगे?"

"मैंने तुम्हारे हिस्से का पानी नहीं छीना। मैंने बस ईंट रखी।"

"ईंट रखने से पहले पूछ लेते।"

"किससे? तुमसे? तुम हो कौन?"

और फिर वो दोनों भिड़ गए।

शब्द नहीं — हाथ। गुड्डू के पापा ने सानिया के अब्बा का कंधा धक्का दिया, और सानिया के अब्बा का हाथ बाल्टी से छूट गया और बाल्टी गिर पड़ी। पानी फैल गया, ईंट के ऊपर, दोनों के पैरों पर, धूल में।

और मैं बीच में आ गया।

"रुकिए।" मैंने कहा। मैंने दोनों के बीच हाथ डाले। "रुकिए। एक बाल्टी के लिए?"

दोनों रुके। दोनों ने मेरी तरफ़ देखा।

और फिर — दोनों की आँखों में वो चीज़ आई जो मुझे पता थी। मैंने उसे पहले भी देखा था — तीन दिन पहले, कल, परसों। वो नफ़रत नहीं थी। वो थकान थी। और जो थकान में इंसान करता है, वो नफ़रत में भी नहीं करता।

सानिया के अब्बा ने कहा, "तू हट।"

गुड्डू के पापा ने कहा, "तू यहाँ क्यों आया? तेरे पास जाने से लोगों के घर टूटते हैं। तू हमें सिखाने आया है?"

"मैं सिखाने नहीं —"

"तू हमारे बीच नहीं आया कर।" सानिया के अब्बा ने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी और यही सबसे बुरा था। "तेरे आने से पहले हम लड़ते थे, पर सुबह फिर बात कर लेते थे। अब तीन दिन से हम बात नहीं कर रहे। तीन दिन से हमारे बच्चों को कहना पड़ रहा है — तुम उस गली से नहीं जाओगे। और सबका कारण एक है।"

"कारण मैं नहीं —"

"कारण तू है।" उन्होंने कहा। "क्योंकि तेरे आने के बाद से इस गली में सुबह से सुबह तक सब कुछ बदल गया है। और जो बदलता है, उससे डर लगता है।"

मैं कुछ नहीं बोला।

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