The Mysterious Bell – Chapter 1155
मैंने सिपाही की तरफ़ देखा। वो चुप थे। उनके हाथ पीछे बँधे थे।
"एक बात." दरोगा ने कहा। "तुम्हारी दुकान का काग़ज़ भी अधूरा है। लाइसेंस, रजिस्ट्री, हिसाब। मैं जानता हूँ। मैंने पढ़ा है।"
"साहब—"
"मैं आज कोई कार्रवाई नहीं कर रहा।" उन्होंने कहा। "पर कल से जो सफ़ेद कुर्ते वाले आएँ, उनसे मुझे पूछना पड़ेगा कि तुमने पूछा था कि नहीं।"
वो मुड़ गए।
"साहब।" मैंने कहा।
वो रुके।
"एक बात पूछूँ?"
"पूछो।"
"कल आप ही ने मेज़ हटवाई। आप ही ने सभा पर रोक लगाई। और आज आप कह रहे हैं कि यह जगह सार्वजनिक नहीं। जब मैंने आपको कुछ नहीं दिया था, तब भी आप यही कह रहे थे?"
दरोगा ने मेरी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर कुछ भी नहीं था। न गुस्सा, न नरमी।
"अंकुश।" उन्होंने कहा। "मेरी नौकरी में एक ही नियम है — जो ऊपर से आता है, वो काग़ज़ पर आता है। और मैं उस काग़ज़ को नहीं पूछ सकता कि यह सच है या नहीं। मैं सिर्फ़ पूछ सकता हूँ — मुहर है या नहीं।" उन्होंने सिपाही की तरफ़ देखा। "चलो।"
वो चले गए।
जीपें उलटी मुड़ीं और गली के मुँह से बाहर निकल गईं। धूल बैठ गई।
मैं पीपल के नीचे खड़ा रहा।
चबूतरी खाली थी। उस पर एक सूखा हुआ पीपल का पत्ता पड़ा था। मैंने उसे उठाया, फिर उसे वहीं रख दिया।
छह बजे गली में बच्चों की आवाज़ नहीं आई।
यह सबसे डरावनी बात थी।
सोचो। हमारी गली में शाम छह बजे क्या होता है? चिंटू किसी की साइकिल की हवा निकालता दौड़ रहा होता है। गुड्डू और रफ़ीक़ पीपल के नीचे पत्थर से क्रिकेट खेलते हैं। सानिया ऊपर छत से आवाज़ देती है कि मेरी गिल्ली नहीं गिरी। कहीं से रेडियो बजता है। कहीं से तवे की आवाज़। कहीं से हँसी।
आज कुछ नहीं।
सिर्फ़ नल की टपक। सिर्फ़ किसी दरवाज़े का बंद होना। सिर्फ़ कुत्ते की एक लंबी साँस।
मैं दुकान के बाहर स्टूल पर बैठा रहा। सामने गली। शटर पर मेरा काग़ज़ — आज भी टूटी चीज़ लाओ। कोई नहीं आया। कोई नहीं आया।
मैं उठा। कमरे से घंटी लाया। वो ठंडी थी, पर ठंडी तो कल से ही थी।
मैंने बजाया।
टन।
मैंने इंतज़ार किया। कोई आवाज़ नहीं।
मैंने फिर बजाया। ज़ोर से।
टन।
फिर फिर।
टन। टन। टन।
कुछ नहीं।
मैंने घंटी कान के पास की। मैंने उसे हिलाया। मैंने उसे हथेली में रगड़ा। मैंने उसे एक बार माथे से लगाया — जैसे बच्चे बुखार में करते हैं।
"बोल।" मैंने कहा।
चुप।
"अरे, बोल न।"
चुप।
मेरी आवाज़ धीमी हुई।
"तू कल बोली थी। तूने कहा था कि गली सो रही है, उसे उठाना पड़ेगा। तूने कहा था — जिस दिन कोई अकेला आदमी किसी अजनबी को अपने घर की चाय पिलाएगा, तू लौट आएगी। मैंने काग़ज़ चिपका दिया। मैंने चाय बनाई। मैंने दो कप रखे। कोई नहीं आया। तो अब तू बोल।"
कुछ नहीं।
मैंने घंटी स्टूल पर रख दी और अपना चेहरा हाथों में छिपा लिया।
और तभी मुझे एक बात समझ आई — यह घंटी मेरी जेब में है। यह मेरे पास है। पर यह मेरी नहीं है। यह उस गली की है जो आज चुप है। और चुप गली में घंटी भी चुप।
मैं स्टूल पर बैठा रहा। धीरे-धीरे अंधेरा गहरा हो गया। कहीं कोई बत्ती नहीं जली। मैंने सोचा — क्या सारी गली मर गई है? क्या सारे लोग चले गए?
नहीं। लोग थे। दरवाज़ों के पीछे थे। बत्तियाँ जल रही थीं, पर परदों के पीछे। खिड़कियाँ खुल रही थीं, पर सिर्फ़ आधी। कोई बाहर नहीं झाँक रहा था।
सात बजे मेरे पीछे किसी के पैरों की आवाज़ आई। मैंने पलटकर देखा।
डॉक्टर निहाल इसरानी थे। हाथ में स्टील का छोटा डिब्बा। चश्मा नाक पर। कंधे थोड़े झुके।
"चाय?" उन्होंने डिब्बा मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"मैंने बनाई थी। ठंडी हो गई।"
"तो यह गरम है। पी।"
मैंने पी। गरम थी। गले से नीचे उतरी तो लगा कि कुछ ज़िंदा है अभी भी।
डॉक्टर साहब मेरे पास बैठ गए। कुछ देर चुप रहे। फिर बोले —
"बजाई?"
"बजाई।"
"कुछ नहीं?"
"कुछ नहीं।"
वो सिर हिलाया।
"अंकुश, मैं चालीस साल से इस गली में हूँ। मैंने यह घंटी नहीं देखी। पर मैंने इस गली को कई बार देखा है। एक बार यह गली चुप हुई थी — जब अस्पताल में दो लोग मरे थे और किसी ने किसी से बात नहीं की थी। दूसरी बार जब नल का झगड़ा साल भर चला। तीसरी बार जब बिजली घर बंद हुआ।"
"और घंटी?"
"मैं घंटी की बात नहीं कर रहा।" उन्होंने कहा। "मैं तेरी बात कर रहा हूँ। तू यह समझ रहा है कि घंटी चुप हो गई। सच यह है कि गली चुप हो गई, इसलिए घंटी चुप है। घंटी कोई जादू का डिब्बा नहीं है। यह गली की ज़ुबान है। और ज़ुबान वही बोलती है जो लोग बोलते हैं।"
"तो मैं क्या करूँ?"
"तू घंटी से जवाब माँगना बंद कर।" उन्होंने कहा। "और लोगों से माँग।"
"कौन सुन रहा है?"
"आज कोई नहीं।" उन्होंने कहा। "कल कोई होगा। पर एक बात याद रख — जब गली चुप हो, तब सबसे पहले वो औरत बोलती है जो सबसे ज़्यादा डरती है। आज वो डर रही है। इंतज़ार कर।"
वो उठे।
"और अंकुश।"
"जी।"
"कल सुबह उस्ताद के साथ मेरे पास आ। मेरा पुराना रजिस्टर है। उसमें एक नाम कटा हुआ है। मैंने उसे चालीस साल से नहीं खोला। अब खोलूँगा।"
वो चले गए। मैंने उन्हें जाते देखा। फिर डिब्बे में बची आधी चाय पी।
आठ बजे मैं घर गया।
माँ बैठी थीं, पलंग पर, पीठ में तकिया। आँखें आधी बंद। हाथ में कोई कपड़ा, जिसे वो बार-बार मोड़ रही थीं।
"माँ।"
"आ गया?"
"हाँ।"
"सुबह कुछ खाया?"
"खाया।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगीं। और मैंने झूठ बोला कि खाया, वो जानती थीं कि झूठ है। पर वो कुछ नहीं बोलीं।
काजल रसोई में थी। उसने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से कहा —
"आज कितने बजे तक?"
"कुछ नहीं आया।"
वो चूल्हे के पास रुक गई।
"अंकुश।"
"हाँ।"
"क्या हम… क्या हम उस्ताद से कहें कि दुकान दो दिन के लिए बंद कर दें? सिर्फ़ दो दिन। बात ठंडी हो जाएगी। फिर—"
"नहीं।"
वो चुप हो गई।
मैं उसके पास गया।
"देख काजल। जिस शटर पर कोयले से लिखा है — आज भी टूटी चीज़ लाओ — वो शटर नहीं गिरेगा। तू समझ रही है? अगर मैं गिरा दूँ तो वो काग़ज़ सही हो जाता है। और मैं उसे सही नहीं होने दूँगा।"
काजल ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें भरी हुई थीं। पर उसने रोना शुरू नहीं किया।
"ठीक है।" उसने कहा। "पर आज रात खाना खाएगा। माँ ने कहा है।"
"खाऊँगा।"
"झूठ मत बोल।"
"नहीं बोला।"
रात नौ बजे मैं दुकान के बाहर खड़ा था।
गली में बत्तियाँ जल रही थीं। दरवाज़े बंद। कहीं से रेडियो की आवाज़ भी नहीं। कुत्ते भी नहीं भौंके। मालूम नहीं क्यों, मैंने पीपल के नीचे जाकर उस चबूतरी पर हाथ रख दिया। उस पत्थर पर भी ठंडक थी।
मैं वापस मुड़ा और तभी वो आई।
सफ़ेद गाड़ी।
कोई तेज़ आवाज़ नहीं। बस हवा में एक चमक बढ़ी और गाड़ी आकर मेरी दुकान के सामने रुकी। इंजन बंद हुआ। सड़क जैसे अपनी साँस रोक ले।
पीछे की खिड़की उतरी।
अंदर से वही चेहरा दिखा। हल्की रोशनी में उसके चेहरे की लकीरें और गहरी लग रही थीं। उसके जूते आज भी चमक रहे थे। उसकी उँगली पर वो काली अंगूठी वापस आ गई थी।
"अंकुश।"
"साहब।"
"बैठ जा।" उन्होंने अपने पास वाली सीट की तरफ़ इशारा किया।
"मैं खड़ा ठीक हूँ।"
"जैसी तेरी मर्ज़ी।" उन्होंने कहा। "मैंने तुझे कुछ कहने से पहले कुछ करते देखा है। गली खाली है?"
मैंने कोई जवाब नहीं दिया।
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