The Mysterious Bell – Chapter 1154
"चाय नहीं पूछी?"
"एक ने पूछी। फिर बोली — रहने दो, मैं नल पर भर लूँगी।"
शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखा।
"सुन रहा है? मेरी गुमटी का बोर्ड ज़मीन पर है क्या? मेरे चूल्हे ने बारह साल में एक दिन नहीं छोड़ा। आज तीन ग्राहक आए।"
"आपा, काग़ज़ हटा दो।" मैंने धीरे से कहा।
"नहीं।" उन्होंने कहा।
"आपा—"
"नहीं, अंकुश।" उन्होंने केतली उठाई और कप में चाय डाली। "वो काग़ज़ मेरा नहीं है। वो काग़ज़ मेरे शटर पर बाहर से चिपका है। जिसने चिपकाया, वो आकर उतारेगा। मैं अपने शटर पर किसी का काग़ज़ नहीं छूऊँगी।"
फिर उन्होंने कप मेरे सामने रखा।
"पी। टूटी चीज़ें आएँगी तो मैं इन्हीं हाथों से उनका हिसाब लिखूँगी।"
मैंने चाय पी।
रज़िया ने अचानक कहा — "और कल?"
"कल क्या?"
"कल भी तीन ग्राहक आएँगे तो तुझे पता है न, भाई? तेरे कारण।"
अंकुश ने उसकी तरफ़ देखा।
"रज़िया।" शबनम आपा ने कहा।
"क्या है?" रज़िया उठ खड़ी हुई। "मैं झूठ बोल रही हूँ? पंद्रह साल बाद मैं लौटी हूँ। पंद्रह साल। और एक हफ़्ते में गुमटी पर काग़ज़ आ गया। तू कहेगी कि यह सब उस सफ़ेद कुर्ते वाले का काम है। पर मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। काग़ज़ पर नाम मेरे बहनोई का क्यों नहीं आया? क्यों सिर्फ़ हमारा?"
मैं कुछ कहने ही वाला था कि शबनम आपा ने हाथ उठाया।
"बस।" उन्होंने कहा। "दोनों चुप।"
और फिर वो धीमे से बोलीं, जैसे अपने आप से — "गुमटी मेरी है। और गुमटी का चूल्हा मैं बंद नहीं करूँगी। चाहे एक कप चाय बिके, चाहे एक भी नहीं।"
ग्यारह बजे मैं उस्ताद अली बक्श की दुकान के सामने खड़ा था।
उनकी दुकान का शटर आधा उठा था। अंदर अंधेरा था। सिलाई मशीन ढकी हुई थी — सफ़ेद कपड़े से, जिसके कोने में उन्होंने बड़ी करीने से गाँठ लगाई थी।
उस्ताद बाहर पत्थर की चौकी पर बैठे थे। हाथ में एक टूटी सुई थी, और वो उसे उलट-पलट कर देख रहे थे।
"उस्ताद।"
"आ।"
"दुकान कब तक?"
"बंद नहीं होगी।" उन्होंने कहा। "कपड़ा ढका है, कपड़ा उतरेगा। शटर आधा है, पूरा उठेगा।"
"काग़ज़?"
"काग़ज़ वहीं है।" उन्होंने दुकान की तरफ़ आँख से इशारा किया। "शटर पर। मैंने उतारा नहीं।"
"उस्ताद, दो दिन की बात है। कल दूसरा दिन है।"
"तो?"
"तो काग़ज़ उतारो। पहले तुम इसे उतार सकते हो। फिर लोग सोचेंगे—"
"लोग क्या सोचेंगे?" उन्होंने सुई नीचे रखी। "यही सोचेंगे कि अली बक्श डर गया। और डर एक बार आ जाए, तो फिर आदमी अपनी दुकान नहीं, अपना नाम भी उतार देता है।"
मैं चुप बैठ गया।
उस्ताद ने सुई की नोक देखी।
"यह सुई मेरी माँ की थी।" उन्होंने कहा। "टूटी है। पर टाँका लगाती है। पता है कैसे?"
"कैसे?"
"सिर्फ़ पहली सिलाई अच्छी करती है। उसके बाद टेढ़ी हो जाती है। पर टाँका लगता रहता है।" उन्होंने सुई अपनी जेब में रखी। "बस तुझे एक बात समझनी है। घंटी तेरी नहीं, गली की है। और गली जब सो जाए, घंटी सो जाती है। गली को सुलाने वाला कोई बाहर का नहीं, कोई अंदर का है।"
"मतलब?"
"मतलब — जिस दिन तू बोलेगा कि मैं अकेला सब ठीक करूँगा, उस दिन घंटी फिर चुप हो जाएगी।"
दोपहर बारह बजे स्कूल के गेट पर अभिभावकों की छोटी-सी भीड़ दिखी। मैं आगे नहीं गया। मैं दूर, पेड़ के पीछे खड़ा रहा।
तीन माँएँ, चार पिता, और स्कूल का एक मास्टर, जो एक हाथ में कॉपी लिए धीरे-धीरे बोल रहा था। मैं सिर्फ़ टुकड़े सुन पाया।
"…जो दुकान वाला है, उसके पास न जाएँ…"
"…बच्चों को रोक दिया है…"
"…उसकी घंटी है, हमें क्या पता उसमें क्या है…"
फिर गुड्डू के पापा बोले, ऊँची आवाज़ में —
"मैं साफ़ कहता हूँ। मेरा लड़का उसकी दुकान की तरफ़ से गुज़रेगा नहीं।"
और सानिया के अब्बा ने सिर हिलाया। "मेरी बेटी भी नहीं।"
मैं वहीं से लौट आया। रास्ते में मुझे अपनी ही दुकान का बोर्ड टेढ़ा दिखा। दो साल से टेढ़ा है। मैंने कभी सीधा करने की ज़हमत नहीं की।
आज उसे देखकर लगा कि वो मेरी तरफ़ भी टेढ़ा मुँह बना रहा है।
ढाई बजे नल पर झगड़ा हुआ।
मैं दुकान के पीछे किसी पुराने रिम को सीधा कर रहा था, तभी बाहर आवाज़ें उठीं।
"मैं पहले आया था!"
"तू पहले आया था तो बाल्टी पहले पानी से क्यों नहीं भरी गई?"
"रख दो बाल्टी नीचे!"
"तू रख!"
मैं दौड़कर गया। नल पर सानिया के अब्बा खड़े थे, एक हाथ में लोहे की बाल्टी, दूसरे हाथ में रस्सी। सामने गुड्डू के पापा, दोनों हाथ जेब में, गर्दन आगे।
पानी लगातार बह रहा था। बाल्टी एक तरफ़ पड़ी थी, और पानी उसके बाहर गिरकर मिट्टी में सोख रहा था।
"अब्बा—" सानिया पीछे खड़ी थी, डरकर।
"तू घर जा।" उसके अब्बा ने कहा।
"अब्बा, बाल्टी…"
"मैंने कहा, घर जा।"
मैं आगे आया।
"भाई साहब—"
दोनों ने एक साथ मेरी तरफ़ देखा।
"तू?" सानिया के अब्बा ने कहा।
"बाल्टी रखो। पानी भर लो। झगड़ा बाद में।"
"कौन हो तू?" गुड्डू के पापा ने कहा। "तू क्या है — गली का मुखिया?"
"मैं कुछ नहीं हूँ। बस रोज़ इसी नल पर हाथ धोता हूँ।"
"तो हाथ धो।" सानिया के अब्बा ने कहा। "और हमारे बीच मत आ।"
"पर बात तो—"
"बात नहीं।" उन्होंने कहा। और फिर उनकी आवाज़ ऊँची हुई। "सुन। तू अपनी दुकान में बैठ। तूने जो चीज़ें शुरू की हैं, उनका हिसाब तेरे पास है। मेरी बेटी रात भर बुखार में तड़पी और सुबह मुझे कोई कहता आया — इसका कारण उसकी घंटी है। अब तू छोटे-छोटे झगड़े सुलझाकर अपना नाम साफ़ मत करने चल।"
"वो घंटी—"
"वो घंटी तेरे पास से हटाई जानी चाहिए।" गुड्डू के पापा ने कहा।
मैं रुक गया।
"क्या कहा?"
"तूने सुना।" उन्होंने कहा। "एक बात बाहर से आई है, अंकुश। सब वही कह रहे हैं। तेरे पास जो जाता है, उसका घर टूटता है। तेरा अपना घर देख — तेरी माँ बेड पर है। तेरे पीछे पड़े हो हो, तू किसी और का घर जोड़ेगा?"
मैं वहीं खड़ा रहा।
बाल्टी पानी से भर गई और बहने लगी। सानिया के अब्बा ने उसे उठाया और चले गए।
गुड्डू के पापा ने मेरी तरफ़ देखा और कुछ कहने के बाद भी नहीं कहा। वो चले गए।
नल बहता रहा।
पानी मिट्टी में सोख गया और सिर्फ़ गीला दाग बचा। मैं वहीं खड़ा रहा। मुझे याद आया कि इसी गली में, कुछ हफ़्ते पहले, दो भाइयों ने मेरी दुकान पर बैठकर हाथ मिलाया था। मैंने मुझे याद दिलाया — वो सच था। पर इस वक़्त वो सच किसी और गली का सच लग रहा था।
शाम चार बजे पुलिस आई।
एक के बाद एक, दो खाकी जीपें। ब्रेक की चीख़। दरवाज़े खुलने की आवाज़। और फिर चौकी से पीपल तक की एक सीधी लकीर — दरोगा साहब उसमें सबसे आगे।
वो सीधे पीपल के नीचे पहुँचे और उस खाली चबूतरी को देखने लगे, जहाँ से उन्होंने खुद कल मेज़-कुर्सी हटवाई थी।
फिर वो मेरी तरफ़ मुड़े।
"अंकुश यादव।"
"जी।"
"यहाँ कुछ रखा है?"
"नहीं।"
"किसी ने कुछ रखने की बात कही?"
"नहीं।"
"अच्छा।" उन्होंने घड़ी देखी। "कल शाम से इस जगह पर किसी भी तरह की सभा, बैठक, मेला, चाय-पानी — सब पर रोक है। तीन दिन। यह पीपल अब सार्वजनिक जगह नहीं रही। इसे जो ज़मीन मिली है, उसका काग़ज़ नगरपालिका के पास है और उस पर यहाँ की कोई सभा दर्ज नहीं है।"
"साहब, हम यहाँ कुछ—"
"बहुत हो गया।" उन्होंने कहा। "तुम लोगों ने इस जगह को अड्डा बना रखा है। नाम रख दिया — जोड़ केंद्र। किसका जोड़? किसने सरकार से इजाज़त ली?"
"किसी ने पैसा नहीं लिया।"
"पैसे से मतलब नहीं।" उन्होंने कहा। "काग़ज़ से मतलब है। और काग़ज़ में जो नहीं है, वो अवैध है।"
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