The Mysterious Bell – Chapter 1153
वो चले गए।
मैं अकेला बैठा रहा।
घंटी मेरी हथेली में थी, ठंडी। मैंने उसे जेब में रखा।
रात आठ बजे मैंने दुकान बंद की, पर शटर पूरा नहीं गिराया। आधा खुला छोड़ा। मुझे लगा शायद कोई आए। शायद कोई फोन करे। शायद मीरा आए, या भोला भाई, या कोई बच्चा।
कोई नहीं आया।
मैं अंदर चारपाई पर लेटा। छत का पंखा वैसे ही लटका था, जैसे कल रात था। मकड़ी का जाला थोड़ा और बड़ा हो गया था।
और तभी बाहर गाड़ी रुकी।
मैंने आवाज़ पहचानी। वो बड़ी, भारी गाड़ी थी। उसका इंजन बाकी गाड़ियों से अलग आवाज़ करता था — थोड़ा गहरा, थोड़ा शांत, जैसे कोई बड़ा आदमी खाँस रहा हो।
मैं उठा। शटर उठाया।
सफ़ेद गाड़ी सामने खड़ी थी। पीछे की खिड़की आधी उतरी, और उसमें से एक चेहरा दिखा। हल्की धूल उसके जूतों पर थी, कुर्ता सफ़ेद, और उँगली पर कुछ काला नहीं था — काली अंगूठी नहीं थी, पर उसकी जगह एक पतला चमकता धागा बँधा था।
"अंकुश।"
"साहब।"
"मैं कहने आया हूँ कि कल से इस गली में तेरा नाम नहीं, मेरा नाम होगा।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"तुझे पता है, मैं कैसे करूँगा?"
"आप बताइए।"
"मैं कुछ नहीं करूँगा।" उसने कहा। "कल सुबह से गली में जो होगा, वो अपने आप होगा। एक अम्मा दूसरी अम्मा से नहीं बोलेगी। एक दुकानदार दूसरे दुकानदार के सामने चाय नहीं पिएगा। स्कूल का गेट उस तरफ़ से बंद हो जाएगा। तेरे पास कोई नहीं आएगा। और जब कोई नहीं आएगा, तो तेरा नाम खुद मिट जाएगा।"
"आपको लगता है कि नाम लोगों के आने से बनता है?"
"हाँ।" उसने कहा। "नाम भीड़ से बनता है। और भीड़ मैं तोड़ सकता हूँ।"
"नहीं।" मैंने कहा। "नाम भीड़ से नहीं बनता। नाम उस वक़्त बनता है जब कोई अकेला आदमी किसी अकेली औरत के हाथ में पानी का गिलास रख दे, और कोई न देखे।"
वो हँसा। छोटी, ठंडी हँसी।
"यह बातें तेरी गली में अच्छी लगती हैं।" उसने कहा। "पर बाहर दुनिया में काग़ज़ चलता है।"
"तो आप काग़ज़ लाइए।"
"मैं लाऊँगा।" उसने कहा। "और वो काग़ज़ जो तुझे सबसे ज़्यादा चुभेगा — वो तेरी ही घंटी का होगा।"
खिड़की ऊपर उठी। काँच चढ़ा। गाड़ी चली गई।
धूल उठी और फिर बैठ गई।
मैं सड़क पर खड़ा रहा। मेरे हाथ में घंटी थी।
मैंने उसे देखा। फिर धीरे से बजाया।
टन।
बस टन।
मैंने उसे उठाकर कान के पास लाया। कुछ सुनाई नहीं दिया।
और तभी, बहुत धीमे, बहुत दूर से, जैसे किसी और गली से, किसी और शहर से, किसी और साल से — आवाज़ आई।
"अंकुश।"
मेरा दिल ज़ोर से धड़का।
"हाँ?"
"गली सो रही है। उसे उठाना पड़ेगा। और उठाने का तरीक़ा तेरे पास है।"
"क्या है?"
"याद रख।" आवाज़ ने कहा। "जिस दिन गली में कोई अकेला आदमी किसी अजनबी को अपने घर की चाय पिला देगा, उस दिन मैं लौट आऊँगी।"
और फिर चुप्पी।
मैंने घंटी को जेब में रखा। मैंने शटर गिराया।
और मैंने अपनी कॉपी में आज की तारीख़ के नीचे एक लाइन लिखी —
"आज गली में कोई नहीं आया। पर आज मैं समझ गया कि घंटी किसकी है। वो मेरी नहीं है। वो गली की है। और अभी गली सो रही है।"
फिर नीचे लिखा —
"कल सुबह मैं अपनी दुकान का शटर उठाऊँगा। और उस पर एक काग़ज़ चिपकाऊँगा, जिस पर लिखा होगा — आज भी टूटी चीज़ लाओ।"
फिर नीचे —
"क्योंकि टूटी चीज़ें आती रहेंगी, तभी गली जागेगी।"
मैंने कॉपी बंद की, बत्ती बुझाई, और लेट गया।
और सोने से पहले मुझे एक बात साफ़ हो गई — रणवीर काग़ज़ से लड़ रहा है। और मैं टूटी चीज़ों से लड़ूँगा। काग़ज़ सूखता है, फटता है, जलता है। पर टूटी चीज़ जब जुड़ती है, उसकी आवाज़ आती है।
और आवाज़ को कोई काग़ज़ नहीं रोक सकता।
॥
सुबह छह बजे मैंने शटर उठाया। बाहर की हवा में अभी रात का ठंडापन बचा था। गली साफ़ दिख रही थी, जैसे किसी ने रात में झाड़ू लगा दी हो। पीपल के नीचे कुछ नहीं था। न मेज़, न कुर्सी, न बोर्ड। सिर्फ़ पत्थर की चबूतरी, और उस पर सूखी पत्तियाँ।
मैंने जेब से एक काग़ज़ निकाला। रात में काजल ने उस पर बड़े अक्षरों में लिख दिया था — आज भी टूटी चीज़ लाओ।
मैंने उसे शटर पर चिपकाया। और फिर दुकान के पीछे वाले कमरे से केतली लाया। चाय बनाई। दो कप। एक अपना, एक सामने रख दिया, किसी के आने के इंतज़ार में।
चाय ठंडी हो गई।
कोई नहीं आया।
सात बजे गली की औरतें नल पर पानी भरने आईं। तीन औरतें थीं। उनमें से एक ने मेरी तरफ़ देखा, फिर झट से नज़र फेर ली और धीरे से दूसरी से कहा — "वो खड़ा है।"
"कौन?"
"कौन और? वही। जिसके पास जाने से…" आवाज़ धीमी हो गई।
मैंने सुना। मैंने अनसुना कर दिया। मैं दुकान के बाहर रखी साइकिल की चेन में तेल डालने लगा।
आठ बजे तक मैंने पाँच साइकिलें साफ़ कर दीं जिनमें से एक भी टूटी नहीं थी।
तभी काजल आई। हाथ में दवा की पुड़िया, सिर पर दुपट्टा, आँखों में वो नींद जो रात भर की जाग से बची थी।
"चाय रखी है?"
"हाँ। ठंडी हो गई।"
"फिर बना।" वो बैठ गई। "भाई, सुन।"
"सुन रहा हूँ।"
"सुबह मैं अस्पताल जा रही थी। रास्ते में मुझे तीन औरतें मिलीं। तीनों ने मुझे देखकर सिर नीचा कर लिया। एक ने तो दुपट्टा ही मुँह पर खींच लिया।"
"क्यों?"
काजल ने मेरी तरफ़ देखा।
"क्योंकि मैं तेरी बहन हूँ।"
मेरे हाथ रुक गए।
"किसने कहा?"
"किसी ने कहा नहीं। बस… बात चल रही है। कहते हैं तेरे पास जो भी आता है, उसका घर टूट जाता है। तेरे हाथ में काला जादू है। तू घंटी बजाकर लोगों का नसीब खींच लेता है।"
मैं हँसा। पर हँसी मेरे गले में ही अटक गई।
"काला जादू?" मैंने कहा। "मेरे पास तो बस एक पेचकस है, काजल। और एक रिंच।"
"हँस मत।" उसने कहा। "सुबह सात बजे सानिया की अम्मी ने अपनी बेटी को स्कूल भेजते वक़्त कहा — रास्ते में उस दुकान की तरफ़ मत देखना।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"सानिया की अम्मी ने?"
"हाँ। और सानिया ने सिर्फ़ सिर हिलाया। कुछ नहीं बोली।"
मैंने साइकिल का तेल वाला कप बंद किया और दीवार से टिक गया।
सोचो ज़रा — कल तक यही सानिया मेरी दुकान पर आकर बैठती थी। मेरे औज़ार उलट-पुलट करती थी। कहती थी, अंकुश भैया, तुम्हारी दुकान में सबसे अच्छी गंध आती है। ग्रीस और चाय की।
आज उसने सिर हिलाया। कुछ नहीं बोली।
नौ बजे मैं शबनम आपा की गुमटी पर गया। वहाँ बाहर वाली बेंच खाली थी। कटोरी उलटी पड़ी थी। चूल्हे पर केतली चढ़ी थी, पर भाप धीमी थी, जैसे आग भी थक गई हो।
शबनम आपा चिमटी से समोसे उठा रही थीं। पास में रज़िया बैठी थी, हाथ में कोई पुराना कपड़ा लिए।
"आपा।"
"आ।" उन्होंने बिना देखे कहा।
"चाय।"
"चूल्हा जल रहा है। बना लूँ?"
"बना दो।"
वो मुड़ीं। मेरी तरफ़ देखा। और फिर वो काम जो वो हमेशा करती थीं — अपनी तेज़ ज़ुबान से सब कुछ सीधा कर देना — उस बार नहीं हुआ।
"बैठ।" उन्होंने कहा। "दो मिनट।"
मैं बैठा।
तभी गली के मोड़ से एक औरत आई। हरी साड़ी, हाथ में थैला। वो गुमटी तक आई, फिर मेरी तरफ़ देखा, फिर रुक गई। दो पल सोचा। फिर मुड़कर चली गई।
शबनम आपा ने चिमटी पटक दी।
"यह क्या है?"
"कुछ नहीं।"
"कुछ नहीं नहीं।" उन्होंने कहा। "वो मेरी बारह साल की ग्राहक है। रोज़ एक कटोरी चाय, एक समोसा, और दो बातें। आज वो बिना बात किए लौट गई।"
मैं चुप रहा।
"रज़िया।" शबनम आपा ने कहा। "तू बता। आज सुबह से कितने ग्राहक आए?"
रज़िया ने कपड़ा मोड़ा।
"तीन।" उसने कहा। "और तीनों ने पूछा कि काग़ज़ कब हटेगा।"
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