The Mysterious Bell1148 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1148

6 min read November 5, 2026

मैंने औज़ारों का ट्रंक खोला। रिंच निकाली। पंचर वाला टब भरा। चाय की केतली चूल्हे पर रखी। सब ठीक वैसा ही।

बस गली नहीं थी।

दस बजे तक कोई नहीं आया। ग्यारह बजे एक आदमी आया — वो भी बाहर से झाँककर चला गया, जैसे अंदर कुछ गिरा हुआ हो जिसे छूना मना हो।

फिर मोड़ से चार औरतें आईं। मैंने सुना — वो मेरी दुकान के सामने से नहीं, दूसरी तरफ़ से निकलीं, ताकि मेरा शटर उनकी नज़र में न आए।

उनमें से एक बोली, "उसी के पास जाते हैं तो घर में झगड़ा हो जाता है। मेरी बहू कल से बोल नहीं रही।"

दूसरी बोली, "मेरे बच्चे के हाथ पर फोड़ा निकल आया। एक ही हफ़्ते में।"

तीसरी ने धीमे से कहा, "काला जादू है। गोरा-गोरा मुँह, अंदर से कुछ और।"

मैंने रिंच हाथ में पकड़ी रखी और मैंने आँख नहीं उठाई। तुम सोच रहे होगे कि मैं भागकर उन्हें रोकता, कहता कि ऐसा कुछ नहीं है। पर उस वक़्त मुझे एक बात समझ आ गई थी — जो इल्ज़ाम हवा में डाला जाता है, उसे हवा से ही लड़ना पड़ता है। ज़ुबान से नहीं।

किशनलाल काका की दुकान का बल्ब अब भी जल रहा था। मैंने देखा — शटर आधा खुला। अंदर कोई नहीं। बोरियों के ढेर पर एक चटाई पड़ी थी, जैसे किसी ने बैठकर इंतज़ार किया हो और फिर उठ गया हो।

मैं वहाँ गया।

दरवाज़े पर खड़ा होकर मैंने कहा, "काका?"

अंदर से आवाज़ आई, "कौन?"

"मैं हूँ। अंकुश।"

फिर चुप्पी। लंबी चुप्पी। फिर धीमे पैरों की आवाज़, और काका बोरी के पीछे से निकले। उनके हाथ में चने का लोटा था, जो वो मुँह के पास उठाए हुए थे, जैसे बात टालने के लिए पकड़ा हो।

"काका, कल रात के बाद कुछ हुआ?"

"कुछ नहीं हुआ।" उन्होंने कहा। बहुत जल्दी कहा। "कुछ नहीं हुआ। बस… बस कुछ लोग आए थे। समझाने।"

"कौन?"

"तू जानता है कौन।" उन्होंने लोटा नीचे रखा। "अंकुश, मैं बूढ़ा आदमी हूँ। मेरी दुकान है, एक बेटा है जो बाहर काम करता है, एक बीवी है जिसकी कमर में दर्द रहता है। मुझे किसी से लड़ना नहीं है।"

"काका, मैंने किसी से लड़ने को नहीं कहा—"

"तूने नहीं कहा।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखें कमज़ोर थीं, पर उस वक़्त उनमें कुछ था जो मुझे चुभा। "तूने कभी नहीं कहा। पर तेरे पास आने वाले का घर टूटता है। यह बात मैंने तेरे मुँह से नहीं सुनी। गली के मुँह से सुनी। और गली की बात गली में रहती है, अंकुश। मेरे जैसे आदमी के लिए गली ही दुनिया है।"

मैं चुप खड़ा रहा।

"मैंने अपना काग़ज़ नहीं जलाया।" उन्होंने धीमे से कहा। "बोरी के नीचे है। तेरे कहे मुताबिक।" वो रुके। "पर अभी मत खुलवा। मुझे सोचने दे।"

मैंने सिर हिलाया।

"अच्छा है।" मैंने कहा। "आप सोचिए। पर काका, एक बात — जो काग़ज़ आपने नहीं जलाया, वही आपका सबसे बड़ा सबूत है। उसे और मत दबाइए।"

वो कुछ कहते, उससे पहले ही पीछे से किसी ने आवाज़ दी — "काका, दाल तौलनी है?" और काका ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे कह रहे हों, बेटा, अब तू जा।

मैं चला आया।

दुकान लौटकर मैंने उस्ताद की दुकान को देखा। परदा ढका हुआ। मशीन ढकी हुई। शटर आधा गिरा। और दरवाज़े पर वो काग़ज़ अब भी चिपका था — दो दिन में दुकान खाली करने वाला, बिना मुहर वाला।

मैं वहाँ गया। परदे के पास खड़ा होकर मैंने धीमे से कहा, "उस्ताद?"

अंदर से आवाज़ आई, "अंदर आ।"

मैं अंदर गया। उस्ताद सिलाई मशीन के पास बैठे थे। मशीन ढकी थी, पर उनका हाथ उस पर था, जैसे कोई बीमार आदमी की नाड़ी पकड़े बैठा हो।

"बैठ।" उन्होंने कहा।

मैं बैठ गया।

"ताला नहीं लगाया।" मैंने कहा।

"नहीं लगाया।" उन्होंने कहा। "मशीन अकेली रहेगी, तब ताला लगाऊँगा। आज सुबह मनोज आया था। उसने कहा — उस्ताद, आपका काग़ज़ साफ़ नहीं है। मैंने कहा, बेटा, मेरी सिलाई साफ़ है। काग़ज़ तो सरकार का धोबी धोएगा।"

वो हँसे। छोटी हँसी। फिर चुप।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "तूने कल घंटी बजाई थी?"

"बजाई।"

"आवाज़ आई?"

"नहीं।"

उन्होंने सिर हिलाया। "मुझे पता था।"

"आपको कैसे पता?"

"क्योंकि आज सुबह मेरी मशीन ने भी आवाज़ नहीं दी।" उन्होंने कहा। "मैंने सुई बदलनी चाही, तो धागा टूट गया। मैंने फिर लगाया, फिर टूट गया। तीन बार। फिर मैंने मशीन ढक दी।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"उस्ताद, आप डर रहे हैं?"

"मैं डर नहीं रहा।" उन्होंने कहा। "मैं सोच रहा हूँ।" वो रुके। "पचास साल पहले जब मैंने दुकान छोड़ी थी, तब भी मशीन ने ऐसे ही धोखा दिया था। धागा तोड़ना मशीन का गुस्सा नहीं होता, अंकुश। धागा तब टूटता है जब जोड़ने वाला हाथ काँप रहा हो।"

"मेरा हाथ नहीं काँप रहा।"

"मेरा काँप रहा है।" उन्होंने कहा। सीधा। बिना शर्म के। "और उसमें तेरा कसूर नहीं। मेरी उम्र का कसूर है। पचास साल में मैंने एक बात सीखी — जब गली चुप होने लगे, तो सबसे पहले बूढ़े की ज़ुबान सूखती है। क्योंकि बूढ़े को लगता है कि अब उसके पास खोने को कुछ नहीं बचा। पर सच यह है — सबसे ज़्यादा उसी के पास बचा होता है।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"जा।" उन्होंने कहा। "आज मुझे अकेले बैठने दे। और अंकुश—" वो रुके। "मशीन का परदा मत उठाना। जब तक मैं खुद न उठाऊँ।"

मैं उठा।

दरवाज़े पर पहुँचकर मैं रुका। "उस्ताद, कल सुबह डॉक्टर इसरानी ने रिकॉर्ड कमरे के लिए बुलाया है।"

"मुझे पता है।" उन्होंने कहा। "वो काग़ज़ आज किसी और के पास जाने वाला है। और मैं उसे जाने नहीं दूँगा। भले मेरी मशीन अकेली रहे।"

मैं बाहर आया।

दोपहर में शबनम आपा की गुमटी पर गया। वहाँ बेंच खाली थी। चूल्हा जल रहा था, कड़ाही में तेल गरम था, समोसे तले जा रहे थे — पर कोई खाने वाला नहीं था।

रज़िया बैठी थी। रोटी परोस रही थी, जिसे कोई माँगने वाला नहीं।

"आपा," मैंने कहा, "इतने समोसे?"

"आदत नहीं छोड़ सकती।" उन्होंने कहा। "चूल्हा जलता रहेगा, तो कोई न कोई आएगा।"

"काग़ज़ नहीं हटाया?"

"नहीं हटाया।" उन्होंने चिमटी उठाई। "यह काग़ज़ मेरे चूल्हे के ऊपर लटका है। जब चूल्हा बुझेगा, तब हटेगा।"

रज़िया ने धीमे से कहा, "दीदी, अब मान जाओ। दो दिन से कोई नहीं आया।"

"तो क्या?" शबनम आपा ने कहा। "मैं चूल्हा उनके लिए नहीं जलाती जो आते हैं। मैं उनके लिए जलाती हूँ जो नहीं आ रहे। जिस दिन वो लौटेंगे, चाय गरम मिले।"

मैंने चाय माँगी।

वो मुस्कुराईं। "अच्छा किया। कम से कम एक ग्राहक तो है।"

चाय पीते हुए मैंने कहा, "आपा, कल शाम को रणवीर की सभा है। पीपल के नीचे। दो कुर्सी।"

"मुझे पता है।" उन्होंने कहा। "मेरे पास भी काग़ज़ आया है।"

"आप जाएँगी?"

"जब तक चूल्हा जलता है, मैं अपनी जगह पर रहूँगी।" उन्होंने कहा। "वो मेरे पास आएंगे, तो बात करूँगी। मैं उनके पीछे नहीं जाऊँगी।"

मैंने चाय ख़त्म की।

जाते वक़्त मैंने देखा — रज़िया की आँखें भरी हुई थीं। उसने कुछ कहना चाहा, पर शबनम आपा ने उसका हाथ पकड़ लिया और वो चुप हो गई।

तीन बजे गली के नल पर मैं गया। पानी भरने की बाल्टी मेरे हाथ में थी। वहाँ सानिया के अब्बा खड़े थे — बाल्टी नीचे रखी, हाथ में रस्सी। और गुड्डू के पापा आ रहे थे, अपनी बाल्टी लेकर।

"नल पर मेरा नंबर पहले था।" सानिया के अब्बा ने कहा।

"नंबर का काग़ज़ कहाँ है?" गुड्डू के पापा ने कहा।

"काग़ज़ की बात मत कर।" सानिया के अब्बा की आवाज़ चढ़ गई। "काग़ज़ वालों ने ही तो यह हाल किया है।"

"मतलब तू मुझे काग़ज़ वाला कह रहा है?"

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