The Mysterious Bell – Chapter 1141
मैंने कुछ नहीं कहा।
"एक बात और," उस्ताद ने कहा। "तूने कल रात मुझे बताया था कि तेरी घंटी चुप हो गई। मैंने तुझे सुबह सिर्फ़ इतना कहा था कि घंटी लोगों से चलती है। पूरी बात नहीं कही थी।"
"क्या पूरी बात?"
वो उठे। दुकान के अंदर गए। वो वहाँ से एक छोटा लकड़ी का डिब्बा लाए, जिसके ऊपर पुराना सफ़ेद कपड़ा लिपटा हुआ था। उन्होंने उसे मेरे सामने रखा और फिर उन्होंने वो कपड़ा खोला।
डिब्बे में एक पुरानी सिलाई की सुई थी। बहुत पुरानी। उसका आधा हिस्सा ज़ंग खा चुका था और नोक मुड़ी हुई थी।
"ये मेरी माँ की है," उस्ताद ने कहा। "ये सुई तब टूटी थी जब मेरे भाई ने मेरी मशीन का धागा काट दिया था।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"मेरी माँ ने मुझे ये सुई दी थी और कहा था — याद रख, जो सुई टूटे, उसी से टाँका भी लगता है।"
मैं उनकी बात समझ रहा था और नहीं भी समझ रहा था।
"तू घंटी को बजाकर पूछता है," उस्ताद ने कहा। "पर घंटी कोई अलग चीज़ नहीं है। ये सुई है। ये महसूस करती है कि गली में कोई धागा जुड़ रहा है या नहीं। जब गली में कोई धागा जुड़ता है, ये बोलती है। जब गली में सब धागे टूटे पड़े हों, तो ये क्या बोलेगी? तू बोल।"
"कुछ नहीं," मैंने कहा।
"कुछ नहीं," उन्होंने कहा। "बिल्कुल सही। तेरी घंटी खराब नहीं हुई है। तेरी गली से धागे टूटे पड़े हैं।"
मैंने चाय का कप उठाया। मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने कप रख दिया।
"फिर मैं क्या करूँ?" मैंने पूछा।
"मेरे पास जवाब नहीं है," उस्ताद ने कहा। "जवाब मेरे पास पचास साल पहले था, जब मैंने तेरी उम्र के एक लड़के से कहा था कि गली का काम गली करेगी। आज मैं तुझे वही कहूँगा और तू मुझसे सवाल पूछेगा कि कैसे। और मेरे पास जवाब नहीं होगा।"
उन्होंने अपना कप खाली किया।
"अब जा," उन्होंने कहा। "और तूने जो कहा था ना — बिना सफ़ाई के चाय पीने की बात — वो तूने मेरे साथ निभा लिया। इससे ज़्यादा और कुछ मत माँगना।"
मैं उठा। दरवाज़े तक गया। फिर मैंने पलटकर पूछा, "दुकान पर ताला कब तक टलेगा?"
"जब तक ये मशीन अकेली रहेगी," उन्होंने कहा।
दोपहर में नल पर झगड़ा हुआ।
मैं दुकान पर बैठा था। सामने कुछ नहीं था। मैं बस ट्रंक में रखी रिंचों को एक जगह से दूसरी जगह रख रहा था, जैसे कोई आदमी खाली हाथ बैठा हो और उसे हाथ धोने का बहाना चाहिए हो।
तभी मोड़ से आवाज़ आई।
मैं दौड़ा।
नल पर सानिया के अब्बा खड़े थे। उनके हाथ में लोहे की बाल्टी थी। सामने गुड्डू के पापा खड़े थे। दोनों के चेहरे लाल थे और दोनों की आवाज़ें ऊँची थीं।
"पहले मैं भरूँगा," सानिया के अब्बा ने कहा।
"तुम रोज़ पहले भरते हो," गुड्डू के पापा ने कहा।
"क्योंकि मेरी बीवी बीमार है।"
"और मेरे बच्चे को कल से तेज़ बुखार है।"
मैं बीच में आया। मैंने सानिया के अब्बा की बाल्टी पकड़ी और मैंने गुड्डू के पापा की तरफ़ देखा।
"दो मिनट," मैंने कहा। "आप भरिए, और आप बाद में भरिए। दो मिनट की बात है।"
सानिया के अब्बा ने मेरा हाथ झटक दिया।
"तू दूर रह," उन्होंने कहा।
मैं चौंक गया। मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में जो था, वो गुस्सा नहीं था। डर था। बहुत डर।
"सानिया को कल रात से बुखार है," उन्होंने कहा। "और औरतें कह रही हैं कि ये सब तेरी दुकान से आया है।"
"क्या?"
"बोल, तेरे पास जो आता है, उसके घर में क्या होता है?"
गुड्डू के पापा ने भी अपनी बाल्टी नीचे कर दी। वो मेरी तरफ़ देखने लगे।
"आप ये कहाँ सुन रहे हैं?" मैंने कहा।
"पूरी गली सुन रही है," सानिया के अब्बा ने कहा।
"साहब के आदमी कह रहे हैं—"
"साहब के आदमी?" मैंने कहा। "आप साहब के आदमी की बात सुन रहे हैं और मुझसे पूछ रहे हैं?"
"मैं किसी की बात नहीं सुन रहा," उन्होंने कहा। "मैं अपनी बच्ची का बुखार देख रहा हूँ। और उससे बड़ी बात मेरे पास कोई नहीं है। चाहे वो साहब कहे, चाहे तू कहे।"
मैं खड़ा रहा।
"अब तू यहाँ से जा," गुड्डू के पापा ने कहा। "और अपनी दुकान पर जाकर बैठ। तेरे पास आकर हम लोगों ने अपने घर की शांति खो दी।"
मैं कुछ नहीं बोला। मैंने एक बार सानिया के अब्बा की तरफ़ देखा। उनकी आँखें भरी हुई थीं। वो अपनी बाल्टी उठाकर नल के नीचे रख चुके थे और उनके हाथ काँप रहे थे।
मैं पलटा और चला आया।
रास्ते में मुझे सानिया दिखी। वो अपने घर के दरवाज़े पर खड़ी थी। उसकी आँखें लाल थीं। उसने मुझे देखा और फिर अपनी माँ की आवाज़ आई और वो अंदर चली गई।
मैंने आगे देखा। गुड्डू दुकान के पीछे खड़ा था। रफ़ीक़ उसके साथ था। चिंटू पीपल की जड़ के पास बैठा था।
तीनों ने मेरी तरफ़ देखा और तीनों ने अपनी नज़रें नीचे कर लीं।
मैंने कुछ नहीं कहा।
मैं दुकान पर लौट आया और बैठ गया।
शाम पाँच बजे पुलिस आई।
मैंने पहले आवाज़ सुनी — जीप की, जो गली के मुँह पर रुकी। फिर मैंने कदमों की आवाज़ सुनी। फिर मैंने देखा कि दुबे अंकल अपनी कुर्सी से उठकर खड़े हो गए हैं और उनका हाथ उनकी कमर पर रखी लाठी पर है।
दरोगा जी सामने आए। उनके पीछे तीन सिपाही थे। दरोगा जी ने पीपल के नीचे खाली जगह देखी, जहाँ कल तक मेरी मेज़ थी और फिर उन्होंने मेरी दुकान की तरफ़ देखा।
"अंकुश यादव?"
"जी।"
"तुम्हारा ये जो जोड़ केंद्र है…" उन्होंने पीपल की तरफ़ इशारा किया। "…ये अवैध सभा है।"
"सभा नहीं है," मैंने कहा। "यहाँ लोग अपनी टूटी चीज़ें लाते थे—"
"अब नहीं लाएँगे," उन्होंने कहा।
उन्होंने जेब से एक काग़ज़ निकाला। उसे खोला। उसे पढ़ा। और फिर वो मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"शिकायत आई है," उन्होंने कहा। "तीन दिन में तुम्हारे पास सभा करने की इजाज़त नहीं है। और कोई भी भीड़ जमा होगी, तो उसकी ज़िम्मेदारी तुम पर होगी।"
"शिकायत किसने की?"
दरोगा जी ने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर तक।
"इसी मोहल्ले के किसी ने," उन्होंने कहा।
मेरे पेट में कुछ ठंडा उतर गया।
"अब तुम इसे हटाओ," उन्होंने पीपल की तरफ़ इशारा करके कहा। "कुछ भी रखा हो, वो हटाओ। कल से यहाँ कुछ नहीं दिखेगा।"
सिपाही आगे बढ़े। उन्होंने पीपल की डाल पर लगा लकड़ी का बोर्ड खींचा — वही बोर्ड जिस पर मैंने सफ़ेद पेंट से लिखा था कि टूटी चीज़ लाओ और टूटा रिश्ता साथ लाओ — और उसे ज़मीन पर रख दिया। फिर उन्होंने चबूतरी के पास रखा मेरा पुराना टूलबॉक्स उठाया और जीप में रख दिया।
"ये तुम ले जाओ," दरोगा जी ने कहा। "पर यहाँ मत रखना।"
सबके सामने।
पूरी गली में एक भी आदमी बाहर नहीं आया। एक भी। दरवाज़ों से सिर्फ़ आँखें दिख रही थीं। मुझे शबनम आपा की गुमटी में एक चेहरा दिखा। और उस्ताद की दुकान का आधा शटर, जिसके नीचे उनकी आँखें थीं।
दरोगा जी जाने लगे। फिर वो रुके और बिना पलटे बोले, "एक बात कहूँ, यादव?"
"कहिए।"
"इस मोहल्ले में मैं पैंतीस साल से हूँ," उन्होंने कहा। "मैंने यहाँ बहुत झगड़े देखे हैं। पर जो आज हो रहा है, वो झगड़ा नहीं है। ये डर है। और डर में आदमी अपने ही लोगों को पहले छोड़ता है। तू अपने आप को संभाल।"
वो चले गए।
जीप का पीछा धूल उड़ाकर गायब हो गया।
मैं पत्थर की पटिया पर बैठ गया।
और फिर वो हुआ जो मैंने डरा हुआ था।
शाम सात बजे गली में बच्चों की आवाज़ नहीं आई।
सोचो, एक गली है जहाँ चार बच्चे हमेशा क्रिकेट खेलते हैं। जहाँ सानिया की चप्पल की आवाज़ आती है, गुड्डू की बल्ले की, रफ़ीक़ के चश्मे के गिरने की, चिंटू की हँसी की। आज कोई नहीं था।
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