The Mysterious Bell – Chapter 1139
"मेरी दुकान पर भी काग़ज़ आया था," काका ने कहा। "मैंने जलाया नहीं। बोरी के नीचे रख दिया।"
उस्ताद ने सुई रोक दी।
"क्यों रखा?" उन्होंने पूछा।
"क्योंकि जो काग़ज़ बिना नाम का हो," काका ने कहा, "वो मेरा नहीं। और जो मेरा नहीं, उसे जलाने का हक़ भी मेरा नहीं।"
वो उठे और चले गए।
मैं उनकी तरफ़ देखता रहा।
"देखा?" उस्ताद ने कहा। "ये भी एक ग्राहक है। और गिनती में है।"
शाम को मैंने गुमटी की तरफ़ देखा।
शबनम आपा चूल्हे के पास बैठी थीं। चूल्हा जल रहा था। और उनके सामने वाला बेंच खाली था।
एक आदमी गुज़रा — वो भोला भाई के पास का ही था, मुझे चेहरा याद था। शबनम आपा ने उसे देखकर कहा, "अरे, एक कटोरी चाय पी ले। मेरी तरफ़ से।"
वो आदमी रुका। उसने चूल्हे की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़ देखा — मैं दुकान के बाहर बैठा था — और उसने कहा, "नहीं आपा, अभी जल्दी है।"
और वो चला गया।
शबनम आपा ने कटोरी वापस रखी। उन्होंने कुछ नहीं कहा।
रज़िया बाहर आई और उसने कटोरी उठाई।
"आपा," उसने कहा, "इसे मैं पी लूँ?"
"पी ले," शबनम आपा ने कहा।
रज़िया ने पी, और पीते-पीते उसकी आँखें भर आईं। उसने कटोरी रख दी और अंदर चली गई।
मैंने देखा — शबनम आपा के हाथ काँप रहे थे। पर वो चिमटी उठाकर समोसे पलटने लगीं, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
सात बजे मैं पीपल के नीचे अकेला था।
गली में बच्चों की आवाज़ नहीं थी।
ये बात मुझे तब समझ आई जब मैंने कान लगाकर सुना। हर शाम यहाँ क्रिकेट की आवाज़ होती थी, चिंटू की चीख, सानिया की डाँट, गुड्डू का रोना, रफ़ीक़ का हँसना। आज कुछ नहीं। सिर्फ़ एक तारे जैसी चिड़िया बोली और चुप हो गई।
मैंने जेब से घंटी निकाली।
"सुन," मैंने कहा।
कुछ नहीं।
मैंने उसे बजाया।
टन।
बस टन। ठंडा, सूखा, बिना किसी आवाज़ के।
"अरे," मैंने कहा, "मैं जानता हूँ तू नाराज़ है। पर एक बार बोल।"
कुछ नहीं।
मैंने फिर बजाया। फिर बजाया। फिर बजाया, और अब मेरा हाथ काँप रहा था और मुझे पता था कि मैं कितना बेवकूफ़ लग रहा हूँगा अगर कोई देख रहा हो, पर मैं रुका नहीं।
"तू बोलती थी," मैंने कहा। "तूने मुझे बताया था कि कौन सा रिश्ता टूटने वाला है, तूने मुझे चेताया था, तूने मेरे कान में बातें डाली थीं — अब चुप क्यों?"
कुछ नहीं।
"मैंने कुछ ग़लत किया हो तो बता," मैंने कहा। "मैं सुधार लूँगा।"
कुछ नहीं।
"सुन," मैंने धीरे से कहा। "अगर तुझे लगता है कि मैंने तुझे ग़लत इस्तेमाल किया, तो बता। मैं तुझे वापस कर दूँगा। जहाँ से आई थी, वहीं।"
और जैसे ही ये शब्द मेरे मुँह से निकले, मेरे हाथ में घंटी थोड़ी और ठंडी हो गई। ऐसी ठंडी जैसे बर्फ़।
मैंने उसे तुरंत सीने से लगा लिया।
"नहीं," मैंने कहा। "नहीं, मैं वो नहीं कहूँगा। जाने की बात नहीं करूँगा। तू रह। तू बस रह। चुप रह, पर रह।"
मैं चबूतरी पर बैठ गया और घंटी अपनी हथेली पर रखकर देर तक बैठा रहा। रात गहरी होती गई। मेरे पैर सुन्न हो गए।
तभी मेरे पीछे से आवाज़ आई, "यहाँ अकेले?"
मैं चौंका।
डॉक्टर निहाल इसरानी थे। हाथ में छोटी टॉर्च और एक काग़ज़ का थैला।
"अस्पताल गया था," मैंने कहा, खड़ा होते हुए। "माँ की दवा—"
"माँ की दवा मैंने काजल को दे दी," उन्होंने कहा। "मैं तुझे ढूँढ रहा था।"
वो मेरे पास बैठ गए। उन्होंने चबूतरी पर हाथ रखा और धूल देखी, फिर मेरी हथेली में रखी घंटी देखी।
"बजी?" उन्होंने पूछा।
"नहीं।"
"क्या सोच रहा है?"
"सोच रहा हूँ," मैंने कहा, "कि ये मेरे काम की नहीं रही।"
डॉक्टर साहब कुछ देर चुप रहे। फिर उन्होंने अपनी जेब से अपना पुराना स्टेथोस्कोप निकाला — वो जिसकी नली पर टेप लिपटा था — और उसे अपनी हथेली पर रखकर बोले, "देख।"
"क्या?"
"मेरे पास तीस साल से ये है," उन्होंने कहा। "जिस दिन मरीज़ नहीं आते, ये भी चुप हो जाता है। किसी को सुनता नहीं। बेकार। और जब पहला मरीज़ आता है, ये वैसे ही काम करता है, जैसे कल तक कर रहा था। ये बदला नहीं। मेरा अस्पताल बदला, मरीज़ बदले।"
"आप क्या कहना चाहते हैं?"
"मैं कहना चाहता हूँ," उन्होंने कहा, "कि घंटी कभी तेरी नहीं थी। वो गली की है। जिस दिन गली चुप हो जाती है, वो भी चुप हो जाती है। ये हमारा तंत्र है, अंकुश — ये लोगों से चलता है। जादू से नहीं।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"तो मेरी ग़लती क्या थी?"
"तेरी ग़लती यह नहीं थी कि तूने कुछ ग़लत किया," उन्होंने कहा। "तेरी ग़लती यह थी कि तूने सोचा कि तू काफ़ी है।"
मेरा गला भर आया। मैंने सिर नीचा कर लिया, ताकि वो देख न सकें।
"मैं डर गया था," मैंने कहा। "आज सुबह जब कोई नहीं आया, तो मुझे लगा कि मैं ख़त्म हो गया।"
"नहीं," उन्होंने कहा। "तू ख़त्म नहीं हुआ। तेरा शोर ख़त्म हुआ है। और शोर ख़त्म होना भी ज़रूरी है। जो आदमी शोर करके जोड़ता है, वो शोर ख़त्म होने पर रो देता है। जो चुपचाप जोड़ता है, वो चुप्पी में भी बैठा रहता है।"
उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा और उठ गए।
"कल सुबह," उन्होंने कहा, "उस्ताद के साथ बैठना। बिना काम। और अगर कोई कहे कि तूने उसका घर तोड़ा है, तो बहस मत करना। बस पूछना — भाई, चाय पी ले।"
"और अगर वो चाय न पिए?"
"तो कल फिर पूछना," उन्होंने कहा, और चल दिए।
मैं उन्हें देखता रहा। वो गली के मोड़ पर मुड़ गए और अंधेरे में मिल गए।
रात दस बजे मैंने शटर गिराया।
पर मैं अंदर नहीं गया। मैं बाहर पत्थर की पटिया पर बैठ गया और गली देखने लगा। दूर एक बत्ती जल रही थी और एक कुत्ता कहीं भौंका और चुप हो गया।
तभी मुझे कदमों की आवाज़ सुनाई दी।
पहले मुझे लगा कि डॉक्टर साहब लौट रहे हैं। फिर मुझे लगा कि कोई बच्चा है। फिर मैंने देखा और मेरी साँस रुक गई।
कोई गाड़ी नहीं थी।
वो पैदल आ रहा था।
सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद पैंट, और जूते जिनपर आज धूल थी। वो अकेला था। उसके पीछे कोई नहीं था। वो मेरी दुकान तक आया और रुका, और फिर उसने वो किया जो मैंने सोचा भी नहीं था।
उसने पीपल की डाल की तरफ़ हाथ बढ़ाया।
और वो सफ़ेद काग़ज़ की पतंग उतार ली।
वो उसे दोनों हाथों से सीधा करने लगा। काग़ज़ चरमराया।
"ये किसी की नहीं है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वही पुरानी नरमी थी। "किसी ने मुझे बताया था।"
मैं उठ खड़ा हुआ। मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए।
"आपको क्या चाहिए?" मैंने कहा।
"कुछ नहीं," उसने कहा। "मैं आज कोई काग़ज़ लेकर नहीं आया। कोई वकील नहीं है। कोई गाड़ी नहीं है।"
उसने पतंग मोड़ी, और फिर उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया — मेरी तरफ़।
मैंने हाथ नहीं बढ़ाया।
"ले," उसने कहा। "ये किसी की नहीं है ना? तो अब मेरी है।"
"रखिए," मैंने कहा।
उसने पतंग अपनी जेब में रख ली।
फिर उसने पीपल की तरफ़ देखा, और उस जगह की तरफ़ जहाँ धूल में चार गोल निशान थे।
"कल शाम पाँच बजे," उसने कहा, "मैं यहाँ कुर्सी रखवाऊँगा। एक नहीं, दो। एक मेरी, एक तेरी।"
"मेरी कुर्सी क्यों?"
"क्योंकि मैं चाहता हूँ कि तू बैठे," उसने कहा। "मैं चाहता हूँ कि पूरी गली देखे कि हम दोनों एक ही जगह बैठ सकते हैं। और फिर वो जो तेरे बारे में स। "और फिर वो जो तेरे बारे में सोचते हैं, वो खुद सोचते रह जाएंगे।"
उसने यह कहा और मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ नहीं थी जो अक्सर तस्वीरों में होती है। कोई चमक नहीं, कोई जीत नहीं। बस एक थकान। ऐसी थकान जो बहुत दूर तक चलकर आए आदमी के चेहरे पर होती है।
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