The Mysterious Bell1138 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1138

7 min read November 5, 2026

मुझे वहाँ कोई काम नहीं था। मैंने खुद से कहा कि मुझे चिंटू का दस्ताना मिला था, उसे लौटाना है। झूठ था। मैं बस यह देखना चाहता था कि गली में क्या बोला जा रहा है। और गली की सबसे सच्ची खबर हमेशा स्कूल के गेट पर होती है।

मैंने दूर से देखा।

गेट के पास तीन औरतें खड़ी थीं और एक आदमी — मोटा, हाथ में टिफ़िन का थैला। वो बात कर रहे थे और उनकी बात में मेरा नाम नहीं था, पर मेरी दुकान थी।

"वो जो साइकिल वाला है ना," एक औरत बोली, "उसके पास जो जाता है, उसके घर में कोई न कोई पड़ जाता है।"

"मेरी भाभी कह रही थी," दूसरी बोली, "कि उसने अपनी दुकान में कोई तांत्रिक चीज़ रखी है। छोटी सी घंटी है। रात में बजती है।"

"हाँ, मेरे बच्चे ने भी सुना था।"

"और उसके पास जो आया, उसका घर टूटा — भोला भाई की दुकान, शबनम की गुमटी, उस्ताद की सिलाई — सब देख रहे हो ना?"

मैं वहीं खड़ा रहा। मेरे पैर जम गए थे। मैंने सोचा था कि मैं गुस्सा करूँगा। पर गुस्सा नहीं आया। जो आया, वो ठंडा और भारी था, जैसे किसी ने मेरे सीने पर गीली चादर रख दी हो।

मोटे आदमी ने कहा, "मैं तो अपने लड़के को साफ़ कह चुका हूँ — उस गली से निकलना मत, उस दुकान के सामने से मत जाना।"

"पर वो तो गली में ही रहता है," एक औरत ने कहा।

"तो रहता रहे," उसने कहा। "हम नहीं जाएँगे।"

मैं वहीं से मुड़ गया।

दोपहर को नल पर झगड़ा हुआ।

मुझे बच्चों की टोली से खबर मिली — रफ़ीक़ दौड़ता हुआ आया और साँस नहीं ले पा रहा था। उसने सिर्फ़ इतना कहा, "भैया, नल पर अब्बा लड़ रहे हैं!"

मैं दौड़ा।

वहाँ पहुँचा तो देखा — सानिया के अब्बा और गुड्डू के पापा आमने-सामने थे। दोनों का हाथ एक ही लोहे की बाल्टी पर था। पानी बीच में गिर रहा था, धूप में सफ़ेद भाप जैसा उठता हुआ।

"छोड़ बाल्टी," सानिया के अब्बा कह रहे थे।

"तू छोड़," गुड्डू के पापा बोले। "मेरी बारी थी। रोज़ मैं दो बाल्टी भरता हूँ।"

"रोज़ तेरी बारी होती है," सानिया के अब्बा बोले। "मेरी बीवी को बुखार है, मुझे पानी चाहिए।"

"मेरे घर में भी चूल्हा जलाना है।"

"तो चूल्हा पहले जलाओ, बाल्टी बाद में!"

बात इतनी बढ़ी कि दोनों की उँगलियाँ उठ गईं।

"अब्बा!" सानिया ने कहा। वो दूर खड़ी थी और उसका चेहरा सफ़ेद था।

मैं बीच में गया।

"अब्बा," मैंने कहा, "बात सुनिए। बाल्टी दोनों की है, नल सबका है। आधा-आधा भर लीजिए, और चाहे तो मैं एक और बाल्टी लेकर आ जाऊँगा।"

दोनों ने मेरी तरफ़ देखा।

और फिर दोनों ने एक साथ मेरी तरफ़ हाथ उठाया।

"तू बीच में क्यों आता है?" सानिया के अब्बा की आवाज़ कड़क थी, पर उसमें कुछ और भी था, जो उन्हें खुद भी अच्छा नहीं लग रहा था। "तू मेरी बेटी को अपनी दुकान पर मत बुला। वो तेरे पास जाती है, मेरे घर में अशांति है।"

मेरे पेट में कुछ मुड़ा।

"अब्बा, ये क्या कह रहे हैं?" मैंने कहा। "सानिया ने क्या किया?"

"सानिया ने कुछ नहीं किया," गुड्डू के पापा ने कहा। "पर तेरे पास आने वालों का हिसाब ठीक नहीं है। मेरे बेटे ने कल से खाना छोड़ दिया है, तेरी गली से आते ही। तू बता, मैं इसे किसके भरोसे छोड़ूँ?"

"मैंने किसी का कुछ नहीं किया," मैंने कहा। मेरी आवाज़ धीमी थी, और शायद इसीलिए सबने सुना।

"किया हो या न किया हो," सानिया के अब्बा बोले, "अब तेरी दुकान के सामने से मेरी बेटी नहीं गुज़रेगी।"

बाल्टी छूट गई। पानी फैल गया। और ज़मीन पर गिरी बाल्टी लुढ़ककर मेरे पैर के पास रुकी। मैंने उसे उठाया।

"ये लीजिए," मैंने कहा, और सानिया के अब्बा की तरफ़ बढ़ाई।

उन्होंने नहीं ली।

मैंने गुड्डू के पापा की तरफ़ बढ़ाई।

उन्होंने भी नहीं ली।

"रख दे वहीं," सानिया के अब्बा ने कहा, और मुड़ गए।

वो दोनों चले गए। सानिया दूर खड़ी रही। उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में जो था, वो ऐसा था कि मैंने अपनी नज़र नीची कर ली।

मैंने वो बाल्टी वहीं नल के नीचे रख दी। पानी भरकर। दोनों के लिए। अलग-अलग।

कोई उठाने नहीं आया।

मैं वापस दुकान आया और हाथ धोया।

टब में मेरा चेहरा दिख रहा था। मैंने उसे देखा और धीरे से बोला, "अंकुश, तू इनका क्या लगता है?"

पानी में कोई जवाब नहीं आया।

दो बजे उस्ताद की दुकान पर एक और काग़ज़ आया।

मैं वहीं था — उनके साथ बैठा था, जैसा डॉक्टर साहब ने कहा था। उनकी पचास साल पुरानी सिलाई मशीन कपड़े से ढकी थी। आज टिक-टिक नहीं हो रही थी, और उस टिक-टिक के बिना दुकान ऐसी लग रही थी जैसे साँस लेना भूल गई हो।

काग़ज़ एक सफ़ेद कमीज़ वाला आदमी लाया। उसने उस्ताद के हाथ में दिया, कुछ नहीं बोला, और मुड़कर चला गया — वैसे ही जैसे तीन दिन पहले वाला आदमी गया था।

उस्ताद ने उसे खोला। उन्होंने चश्मा नहीं पहना था। उन्होंने काग़ज़ बहुत दूर से देखा, जैसे पढ़ रहे हों, फिर मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।

"पढ़," उन्होंने कहा।

"उस्ताद, आप—"

"पढ़।"

उसमें लिखा था कि दुकान से जुड़े काग़ज़ों की जाँच तक काम बंद रहेगा, और आज शाम पाँच बजे दुकान पर प्रशासन की तरफ़ से ताला लगाया जाएगा। नीचे न मोहर नाम न तारीख़।

मैंने काग़ज़ मेज़ पर रख दिया।

"उस्ताद," मैंने कहा, "ये काग़ज़ नहीं है। ये डर है, काग़ज़ की शक्ल में।"

"मुझे पता है," उन्होंने कहा।

"तो?"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनका चश्मा मेज़ पर था, और उनकी आँखें उसके बिना छोटी और बहुत साफ़ लग रही थीं।

"मैं ताला खुद नहीं लगाऊँगा," उन्होंने कहा। "मैं तीन बजे दुकान खोलूँगा, चार बजे तक बैठूँगा, और पाँच बजे जब वो आएँगे, तो दुकान खुली मिलेगी।"

"और अगर वो ताला लगा दें?"

"तो गली देखेगी," उन्होंने कहा। "मेरे हाथ से नहीं, उनके हाथ से लगेगा। फ़र्क़ यही है।"

वो उठे, मशीन के पास गए, और उससे लगी अलमारी से एक कपड़ा निकाला। फिर वो बैठ गए और उसी कपड़े को गोद में रखकर सीधा करने लगे, हालाँकि वो पहले से सीधा था।

"उस्ताद," मैंने कहा, "घंटी आपसे भी नहीं बोलती?"

उनके हाथ रुक गए।

"मैंने कल रात बजाई थी," उन्होंने कहा। "तू सो रहा था, मैंने जान-बूझकर तुझे नहीं बुलाया। मैंने कहा, चल देखें।"

"तो?"

"कुछ नहीं," उन्होंने कहा। "सिर्फ़ ठंडा पीतल।"

मैंने सिर नीचा कर लिया।

फिर उन्होंने वो कपड़ा मेज़ पर रखा और बोले, "अंकुश, मैं तुझे एक बात बताता हूँ जो मैंने पचास साल में सीखी। जोड़ तंत्र दो चीज़ों से चलता है — सच और भरोसा। सच तेरे पास है। भरोसा गली के पास है। और आज गली का भरोसा तेरे पास नहीं है। इसीलिए घंटी चुप है।"

"तो मैं क्या करूँ?"

"कुछ मत कर," उन्होंने कहा।

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"आज कोई काम मत कर," उन्होंने कहा। "आज कोई सफ़ाई मत दे, किसी को मत कह कि मैंने कुछ नहीं किया, अपना बोर्ड मत लगा, बच्चों को मत बुला। आज बस बैठ। मेरे साथ। चाय पी।"

"इससे क्या होगा?"

"गली देखेगी कि तू डरकर भागा नहीं," उन्होंने कहा। "और बात करने वाले बहुत होते हैं, अंकुश। देखने वाले कम।"

तीन बजे उस्ताद ने दुकान खोली।

उन्होंने मशीन का कपड़ा उतारा, बुनाई की तरफ़ देखा, और फिर मशीन शुरू कर दी। टिक-टिक शुरू हुई — धीमी, कमज़ोर, पर टिक-टिक।

चार बजे एक ग्राहक आया — बूढ़ा किशनलाल काका, पुरानी किराने की दुकान वाला। वो आया और रुका, और उसने कुछ सिलने को नहीं दिया। उसने बस उस्ताद के सामने बैठकर कहा, "क्या हाल है?"

"ठीक," उस्ताद ने कहा।

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