The Mysterious Bell – Chapter 1129
“मेरी बारी में एक बाल्टी ही भरने देना था,” गुड्डू के पापा चिल्लाए।
“तुम्हारी बारी थी तो तुम दस मिनट पहले आते। नल पर तुम्हारा ठेका नहीं लगा है।”
“तुम्हारा लगा है?”
“मेरी बीवी बुखार में है, मुझे पानी चाहिए। तुम्हारी बीवी को क्या है?”
“मेरी बीवी को क्या है, वो मैं तुम्हें नहीं बताऊँगा। पर बाल्टी मेरी है और भरी हुई मेरी है।”
“भरी हुई? भरी हुई तो वो है जब पानी उसमें हो।”
मैं उनके बीच चला आया।
“भाई साहब।”
दोनों ने मेरी तरफ़ देखा।
“एक बाल्टी के लिए पूरी गली गीली कर देने की क्या ज़रूरत है। मेरी दुकान पर टब भरा है, दो बाल्टी वहाँ से भर लीजिए, और वो…” मैंने ईंट उठाने को हाथ बढ़ाया।
“मत कर।”
सानिया के अब्बा की आवाज़ सख़्त थी।
“क्यों?”
“क्योंकि तुमको हाथ लगाना नहीं है,” उन्होंने कहा। “तुम्हारा हाथ लगा तो कल को फिर कहीं न कहीं दरार पड़ेगी।”
मेरा हाथ हवा में रुक गया।
“भाई साहब, ये क्या बात कर रहे हैं?”
“जो सब कह रहे हैं,” गुड्डू के पापा बोले। “मैं कुछ नहीं कहता अंकुश। पर मेरी माँ कहती है कि तुम्हारे पास जाना ठीक नहीं।”
“आपकी माँ अपनी दवा के पैसे मेरे साथ तीन महीने से जोड़ रही हैं,” मैंने कहा। और मेरी आवाज़ जितनी चाहिए थी उतनी ही रही। “तीन महीने। एक काग़ज़ नहीं लगा। एक अँगूठा नहीं लगा। सिर्फ़ भरोसा।”
“अब भरोसा नहीं रहा,” उसने कहा।
और ये वाक्य मेरे ऊपर उस तरह गिरा जैसे हम दोनों के बीच खड़ा कच्चा पत्थर का चबूतरा गिर जाए।
“अच्छा,” मैंने कहा।
मैं वहीं से मुड़ा।
“अंकुश।”
मैं रुका।
“बुरा मत मानना,” सानिया के अब्बा ने कहा। “डर हमें भी लगता है। हम भी अपने बच्चों के बारे में सोचते हैं।”
मैंने सिर हिला दिया। मैं आगे बढ़ गया।
पर मेरे भीतर कुछ बोल रहा था और वो बहुत शांत, बहुत ठंडा बोल रहा था — अंकुश, यही सब तेरे जोड़ों का इनाम है। तूने दो लोगों को जोड़ा, तूने झगड़े छुड़ाए, तूने बीसियों को एक-दूसरे से बोलने लायक बनाया। और आज तेरे ही हाथों को “न छूने” की चीज़ मान लिया गया।
चार बजे दरोगा आए।
दो खाकी आदमी, एक जीप, और पीपल के नीचे खड़ा हुआ मैं।
“ये सभा क्या है?” दरोगा ने पूछा।
“सभा नहीं है, हुज़ूर,” मैंने कहा। “ये चबूतरी है। यहाँ कभी लोग बैठते थे।”
“कभी बैठते थे। अब?”
“अब कोई नहीं बैठता।”
“तो ये चबूतरी पर रखा झंडा, ये तख़्ती, ये लोगों के नाम वाला काग़ज़?”
मैंने देखा — किसी ने जोड़ केंद्र का बोर्ड निकालकर रख दिया था, बीचोंबीच। जो बोर्ड मैंने सफ़ेद पेंट से बनाया था, जिस पर लिखा था कि टूटी चीज़ लाओ और टूटा रिश्ता साथ लाओ।
उसके नीचे एक काग़ज़ चिपका था — “बिना अनुमति सभा।”
किसने चिपकाया? मैंने पूछा नहीं। मुझे पता था।
“हुज़ूर, ये मेरी जगह नहीं है,” मैंने कहा। “ये चबूतरी गली की है। यहाँ कोई काग़ज़ नहीं लगता। यहाँ लोग बैठते हैं।”
“तो इसे हटाओ,” दरोगा ने कहा और मुड़ गए। “और सुन लो, अंकुश जी। आगे से यहाँ कोई सभा, कोई जोड़-जुगाड़, कोई काग़ज़ बाँटना — तो अगली बार कुर्सी पर बैठकर बात होगी।”
“हुज़ूर, एक बात पूछूँ?”
“पूछो।”
“ये काग़ज़ किसने लगाया?”
वो रुके। उन्होंने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर कहा, “काग़ज़ काग़ज़ है। किसने लगाया, ये मुझे नहीं पूछना। तुम हटाओ और चले जाओ।”
वो गए।
मैंने बोर्ड उठाया।
तीन टाँगों वाली टूटी मेज़ पलटी पड़ी थी। पेपर, पेंसिल, किसी का छोड़ा हुआ रुमाल, एक टूटी चूड़ी का टुकड़ा — सब धूल में।
मैंने एक-एक चीज़ उठाई।
और मुझे वो तीन महीने पहले वाला दिन याद आ गया जब मैंने पहली बार ये चबूतरी चुनी थी — इसलिए नहीं कि यहाँ जगह थी, बल्कि इसलिए कि यहाँ पीपल था, यहाँ छाया थी, और यहाँ बैठकर लोग एक-दूसरे की आवाज़ सुन सकते थे।
आज यहाँ कोई नहीं था।
सब देख रहे थे। खिड़कियों से, दरवाज़ों से, गुमटी के पीछे से, दुकानों के अंधेरे से।
कोई आया नहीं।
एक भी नहीं।
शाम छह बजे गली ऐसी चुप हो गई जैसी मैंने कभी नहीं सुनी थी।
ये वो चुप्पी नहीं थी जो रात में होती है। रात की चुप्पी में सिसकियाँ, दूर का रेडियो, किसी का खाँसना — कुछ तो होता है।
इसमें कुछ नहीं था।
माँ की रोटी बेलने की आवाज़ आज नहीं आई, क्योंकि माँ को बुख़ार था। काजल अस्पताल गई थी। उस्ताद की मशीन चुप थी। गुमटी पर केतली नहीं खौली। बच्चों की आवाज़ नहीं आई।
स्कूल की छत से पतंग नहीं उड़ी।
मैं दुकान के बाहर कुर्सी पर बैठा था और मुझे लग रहा था कि मैं अपने ही मोहल्ले में अजनबी हूँ।
तभी मैंने वो किया जो करना चाहिए था, या जो मेरी आदत थी।
मैंने जेब से घंटी निकाली।
लाल खोल खोला। पीतल की घंटी हथेली पर रखी।
“बोल,” मैंने कहा।
कुछ नहीं।
मैंने बजाया।
कोई आवाज़ नहीं आई। सिर्फ़ घंटी की आवाज़ — टन। जो हवा में मिल गई और खत्म।
“बोल।”
फिर बजाया।
फिर बजाया।
छह बार। सात बार। दस बार।
घंटी का पीतल ठंडा था। जैसे उसे अभी किसी क़ब्र से उठाया हो।
मैं उठा। दुकान के अंदर आया। शटर गिराया।
अंधेरे में बैठकर मैंने फिर बजाया। फिर बजाया।
“बोल न,” मैंने कहा, और मेरी आवाज़ टूट गई। “तू जो बोलती थी न — ‘अब मुझे भी भूख लगी है’ — वो बोल। ‘दो खाते’ बोल। ‘आधा उधार’ बोल। कुछ बोल।”
घंटी चुप रही।
और उस वक़्त मुझे डॉक्टर इसरानी की वो बात याद आई जो उन्होंने पिछले हफ़्ते अस्पताल के गलियारे में धीरे से कही थी, जब मैं उनके पास बैठा था और मेरी हिम्मत टूट रही थी।
वो सीढ़ी पर बैठे थे, बूढ़े हाथों में काग़ज़, और उन्होंने कहा था — “अंकुश, तुम्हारा ये तंत्र किसी जादू की पुस्तक से नहीं आया। ये लोगों से चला है। जिस दिन मोहल्ला जुड़ा, उस दिन घंटी बोली। जिस दिन मोहल्ला चुप हो जाएगा…”
वो रुके थे।
“तो, डॉक्टर साहब?”
“तो घंटी भी चुप हो जाएगी,” उन्होंने कहा था। “और उस दिन सबसे ज़्यादा डरना ये है कि तुम घंटी को दोष दोगे। घंटी बेज़ुबान है, इसलिए वो अपनी सफ़ाई नहीं दे सकती।”
अब, अंधेरे में बैठे, मुझे वो बात घूँसा दे रही थी।
मैंने घंटी मेज़ पर रख दी।
और मैंने पहली बार, कई महीनों में, अपने आप से एक सच्ची बात कही — “मैं अकेला नहीं कर सकता।”
जब मैंने ये बात मन में कही, तो दुकान का पीछे वाला काला बक्सा, जो गुमटी से वापस दुकान के पीछे के कमरे में रखा गया था, अपनी जगह से हिला।
मैंने आवाज़ सुनी — खट।
मैंने पीछे जाकर देखा। बक्से का ज़ंग लगा ताला झूल रहा था। न खुला, न बंद। बस झूल रहा था।
उससे कोई आवाज़ नहीं आई।
ये भी चुप था।
सात बजे काजल अस्पताल से लौटी, और उसके हाथ में दवा की थैली थी।
“दीदी ने बोला, माँ की दवा दस दिन की है। पर…” उसने थैली नीचे रखी, “…अस्पताल में आज कोई मरीज़ नहीं आया। कोई नहीं। दो दिन पहले तक पचास मरीज़ रोज़ आते थे। आज डॉक्टर साहब आँगन में अकेले बैठे थे।”
“क्यों?”
“क्योंकि गली कह रही है कि उस अस्पताल से वो लड़का जुड़ा है, जिसके पास काला जादू है।”
मैं हँसा। मैंने सच में हँसा। और फिर हँसी मेरे गले में अटक गई।
“काजल, बता,” मैंने कहा। “मैंने आज तक किसी का क्या बिगाड़ा है?”
“कुछ नहीं।”
“तो फिर?”
काजल ने मेरे बगल में बैठकर मेरा कंधा पकड़ा।
“भैया, डर का कोई हिसाब नहीं होता। डर सिर्फ़ जगह ढूँढता है। किसी ने उसे बता दिया कि जगह ये है। बस।”
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