The Mysterious Bell – Chapter 1130
आठ बजे मैं उस्ताद की दुकान से होकर गुज़रा। वो बैठे थे, और उनके सामने एक कटोरी में ठंडी चाय पड़ी थी।
“उस्ताद, आपने सुना? अस्पताल में आज—”
“सुन लिया।”
“और आपको ये सब…”
“अंकुश, बैठ।” मैं बैठ गया। “आज मुझे एक बात समझ आई है।”
“क्या?”
“रणवीर कभी मेहनत नहीं करता था। वो हमेशा लोगों को आपस में लड़ाता था, और जब लोग लड़ते थे, वो सस्ते दाम पर ज़मीन ले लेता था।” उन्होंने कटोरी हटाई। “पर आज उसने कुछ नया किया है। आज उसने लोगों को ये नहीं बताया कि वो एक-दूसरे से लड़ें। आज उसने लोगों को ये बताया कि वो तुमसे लड़ें।”
“फ़र्क़ क्या है?”
“फ़र्क़ ये है कि जब लोग एक-दूसरे से लड़ते हैं, तो हर झगड़े के बाद किसी को भरोसा चाहिए होता है — और तब तेरी ज़रूरत होती है। पर जब लोग तुझसे लड़ते हैं…” उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, “…तो उन्हें किसी पर भरोसा नहीं चाहिए होता। उन्हें सब पर शक चाहिए होता है। और जिस गली में शक हो, वहाँ जोड़ने वाला कोई नहीं होता।”
मैं चुप बैठा रहा।
“तो मैं क्या करूँ, उस्ताद?”
“आज कुछ नहीं।” उन्होंने कहा। “आज सो जा।”
“कल?”
“कल जब कोई मुझे बता देगा कि तेरे दुकान के पास खड़े होने से उसके घर में बीमारी हो गई है,” उस्ताद ने कहा, “तब तू मेरी दुकान पर आकर बैठ जाना। और चाय पीना। बिना सफ़ाई दिए।”
“इससे क्या होगा?”
“इससे ये होगा,” उन्होंने कहा, “कि गली देखेगी कि सबसे बुज़ुर्ग आदमी भी तेरे पास बैठा है। और जब सबसे बुज़ुर्ग बैठा है, तो बाकी लोगों को बैठने की हिम्मत आएगी।”
उस रात नौ बजे मेरी दुकान के बाहर एक सफ़ेद गाड़ी आकर रुकी।
मैं दुकान के अंदर था, कुर्सी पर। मैंने गाड़ी की आवाज़ पहचानी।
शीशा नीचे आया।
मैंने बाहर नहीं जाना चाहा, पर मैं उठा और दरवाज़े तक आया।
खिड़की से वही आदमी था — जो सुबह दस बजे भारद्वाज भवन का संदेश लाया था। वही बिना मुस्कुराए, वही बिना धमकी दिए।
“साहब ने आज नहीं बुलाया,” उसने कहा।
“तो?”
“साहब ने कहा, पहले तुम अपनी गली देख लो।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
“और साहब ने ये भी कहा,” उसने आगे कहा, “कि कल से इस गली में तेरा नाम नहीं होगा। मेरा नाम होगा।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“कह देना साहब से,” मैंने कहा, “कि नाम बोर्ड पर लिखा जाता है, गली में नहीं। गली में नाम लोगों की ज़ुबान पर रहता है। और ज़ुबान वो नहीं लिख सकता जो बोर्ड छापता है।”
वो एक पल मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर उसने शीशा चढ़ाया और गाड़ी चली गई।
मैं वहीं दरवाज़े पर खड़ा रहा।
दुकान के अंदर मेज़ पर घंटी पड़ी थी।
मैंने हाथ बढ़ाया, उसे उठाया, कान के पास लाया, और बजाया।
कुछ नहीं।
न आवाज़। न गरमाहट। न कँपकँपी।
सिर्फ़ पीतल की सीधी-सादी टन।
और मेरे सामने वो गली थी — साइकिल गली — जो आज पहली बार सोई नहीं, बस चुप हो गई थी।
मैंने घंटी जेब में रखी।
एक बात मैं उस रात समझ गया था, और वो ये थी — रणवीर मेरी घंटी नहीं छीनना चाहता था।
वो मेरी गली छीनना चाहता था।
क्योंकि जिस घंटी में लोगों की आवाज़ होती है, उसे तोड़ने के लिए कोई जादू नहीं चाहिए। उसे तोड़ने के लिए बस इतना काफ़ी है कि गली चुप हो जाए।
॥
उस रात मैं सोया नहीं।
चारपाई पर लेटा रहा, छत की तरफ़ देखता रहा, और घंटी मेरी जेब में पड़ी रही — ठंडी, जैसे कोई पत्थर। मैंने उसे तीन बार जेब से निकालकर देखा। हर बार वही पीतल, वही फूल खुदा हुआ, वही पुरानी चमक। और हर बार मैंने उसे कान के पास लाकर हल्का सा बजाया — टन। बस टन। कोई आवाज़ नहीं।
सुबह पाँच बजे माँ के चूल्हे की आवाज़ आई। मैं उठा, कमरे से बाहर आया, और गली में खड़ा हो गया।
गली में सुबह की वो आवाज़ नहीं थी जो मैं बचपन से सुनता आया था। न नल की छपाक, न झाड़ू की खरखर, न किसी बच्चे की चिल्लाती हुई "अम्मी, टिफ़िन दे दे"।
सिर्फ़ एक कुत्ता भौंका। और फिर वो भी चुप हो गया।
मैंने देखा — तीन घरों के दरवाज़े खुले थे, पर कोई बाहर नहीं था। सानिया की माँ कूड़ा फेंकने आई, मुझे देखा, और कूड़ा हाथ में ही लेकर अंदर चली गई। दरवाज़ा बंद। कुंडी की आवाज़। मेरे पेट में कुछ ठंडा सा गया।
तुम सोच रहे होगे कि एक कूड़ा फेंकने वाली औरत से क्या होता है। मैं बताता हूँ — पूरी गली एक औरत की तरह होती है। जब एक औरत आँख चुरा ले, तो बाकी भी सीख जाती हैं।
मैं दुकान आया, शटर उठाया, बैठ गया।
शटर उठाने की आवाज़ सुनी सिर्फ़ उस्ताद ने। वो अपनी दुकान के बाहर, छोटी स्टूल पर बैठे थे। मशीन ढकी हुई थी — सफ़ेद कपड़े से।
"उस्ताद," मैंने कहा। "मशीन क्यों ढकी है?"
वो मेरी तरफ़ देखते रहे। फिर बोले, "क्योंकि कल कोई नहीं आया।"
"आज आएगा।"
"आज कोई आएगा," उन्होंने कहा, "तो मैं कपड़ा उठा दूँगा।"
मैं उनके पास बैठ गया। दो मिनट चुप बैठे रहे। फिर मैंने धीरे से कहा, "उस्ताद, घंटी बोल नहीं रही।"
"मुझे पता है।"
"आपको कैसे पता?"
"क्योंकि आज सुबह मैंने तुम्हारे शटर की तरफ़ देखा," उन्होंने कहा, "और तुम्हारी घंटी मेरे कानों में नहीं आई। जो घंटी पाँच साल से मेरे कान में धीरे-धीरे बोलती थी, वो आज सुबह चुप थी।"
मैंने उनके हाथ की तरफ़ देखा। उनके हाथ में कैंची थी, पर वो कुछ काट नहीं रहे थे। वो बस कैंची पकड़े हुए थे, जैसे कोई चीज़ का सहारा चाहिए हो।
"कल शाम सफ़ेद गाड़ी वाला आया था," मैंने कहा।
"मैंने सुना।" उन्होंने कैंची मेज़ पर रखी। "शबनम ने बताया।"
"उसने कहा कि कल से इस गली में मेरा नाम नहीं होगा।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा और बहुत धीरे से कहा, "अंकुश, अगर कोई आदमी तुम्हारा नाम मिटाने की बात करे, तो समझ लेना उसने मिटा दिया है। बात तब होती है जब कुछ बचता है। जो पहले से मिटा है, वो धमकी नहीं देता, वो सिर्फ़ करता है।"
मैं एक पल के लिए चुप हो गया।
"तो वो धमकी क्यों दे रहा है?"
"क्योंकि," उस्ताद ने कहा, "वो अभी खुद नहीं जानता कि गली किसकी है। और जो अपनी चीज़ पर शक करे, वो धमकी देता है।"
मैं हल्का सा मुस्कुराया। "आप ये बातें कहाँ से लाते हैं, उस्ताद?"
"सत्तर साल की दुकान से," उन्होंने कहा। "जिस दुकान पर सत्तर साल तक लोग आते-जाते रहे, वहाँ आदमी को थोड़ा-बहुत समझ में तो आ ही जाता है।"
तभी शबनम आपा की आवाज़ आई। वो गुमटी के बाहर खड़ी थीं और किसी से बहस कर रही थीं।
"भाई साहब, मैं क्या करूँ? चाय बना रही हूँ, किसी को पीनी नहीं है। समोसा तला है, कोई नहीं बैठता।"
मैं उठकर गया।
गुमटी के सामने नोटिस चिपका था। छोटा सा काग़ज़, सफ़ेद, ऊपर कोई नाम नहीं, नीचे कोई मुहर नहीं। सिर्फ़ टाइप किए हुए टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में एक लाइन — "अस्थायी रूप से काम बंद।"
"कब से?" मैंने पूछा।
"सुबह पाँच बजे, जब मैंने चूल्हा जलाया," शबनम आपा ने कहा। उनका हाथ चिमटी पर था, और चिमटी गरम थी। "मैंने ये काग़ज़ उठाया, पढ़ा, और वापस चिपका दिया।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैं इस पर से कोई नोटिस नहीं उतारना चाहती।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "जो लोग इस काग़ज़ को पढ़कर चले गए, वो कल वापस आएँगे — और देखेंगे कि काग़ज़ अब भी यहीं है। मतलब मैं डरी नहीं।"
"आपा—"
"और मैं डरी नहीं," उन्होंने दोहराया, "क्योंकि मैंने पंद्रह साल एक बात नहीं बोली थी, अंकुश। पंद्रह साल। तब मैं डरती थी। अब मैं डरना छोड़ चुकी हूँ। डरने का ज़माना जा चुका।"
उन्होंने चाय की केतली उठाई और खाली कटोरा मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"पी।"
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