The Mysterious Bell – Chapter 1127
काग़ज़ पर लिखा था—उस्ताद, अब मैं स्कूल में तुम्हारा नाम रोशन करूँगा। तुम मेरे पास नहीं रहे, पर मैं तुम्हारे जैसा बनूँगा, और यह मेरा वादा है। मैं चुपचाप यहाँ से जा रहा हूँ, क्योंकि मुझे नहीं लगता कि मैं सच में चुपचाप जा सकता हूँ। इसलिए यह काग़ज़ लिखकर रख रहा हूँ।
और नीचे, थोड़ी जगह छोड़कर—
मेरी माँ से कहना कि वह अब मशीन रोज़ चलाए। और अगर उस्ताद कहे कि मशीन के टाँके गिनने हैं, तो कहना कि मैंने सीख लिया है कि कितने टाँके एक बात में जाते हैं।
मैं हँसा। फिर मेरी आँखें भर आईं।
मैंने काग़ज़ पलटा, क्योंकि मुझे लगा कि पीछे भी कुछ लिखा है। और था भी।
पर वो लिखाई उसी पेंसिल की थी, और उसी तरह झुकी हुई थी—मगर यह टिंकू की नहीं थी।
मैंने उसे दोबारा पढ़ा। और तीसरी बार भी। और जैसे-जैसे पढ़ता गया, मेरा चेहरा उतरता गया।
वहाँ लिखा था—
तेरी घंटी यों ही तेरे दादा की नहीं हो गई। उन्होंने इसे किसी से लिया था। और जिससे लिया, उसने वापस माँगने की एक शर्त भी साथ लिखवाई थी। शर्त निभी नहीं, तो घंटी तेरी नहीं, उसकी है। अब जिस दिन घंटी अपने असली मालिक से मिलेगी, उस दिन तेरे घर का सबसे पुराना नाम कटेगा। और वो नाम तेरे घर की दीवार पर किसी और की लिखाई में पहले से लिखा है।
मैंने काग़ज़ मेज़ पर रखा। मेरे हाथ काँप रहे थे।
कौन लिख सकता है ऐसी बात? और अगर वो टिंकू के काग़ज़ पर लिखी गई, तो उसे कब लिखा गया? टिंकू तो आज सुबह यह काग़ज़ रखकर गया। और यह लिखाई पुरानी नहीं लग रही थी—पेंसिल की लकीरें ताज़ी थीं, जैसे किसी ने आज ही, मेरे बक्सा खोलने से ठीक पहले, इसे लिखा हो।
मैंने चारों तरफ़ देखा। दुकान में कोई नहीं था।
मैंने काग़ज़ को करीब से देखा। पेंसिल की लकीरें टिंकू की लकीरों से थोड़ी पतली थीं। और लिखाई वैसी ही झुकी हुई थी, जैसे किसी ने उसकी नक़ल की हो। यह वही लिखाई थी जो मैंने पहले भी देखी थी—कॉपी में "भाई" लिखा, ताले के काग़ज़ पर "मैं आ गई", और अब यह।
मैं उठ खड़ा हुआ।
“कौन है?” मैंने कहा। “कौन लिख रहा है मेरे काग़ज़ों पर?”
कोई जवाब नहीं आया।
मैंने काग़ज़ जेब में रखा और पीछे वाले कमरे की तरफ़ बढ़ा। मेरे कदमों की आवाज़ फ़र्श पर गूँज रही थी।
और तभी—
पीछे वाले कमरे में रखा काला बक्सा अपने आप खिसका।
मैं रुक गया।
वो बक्सा वही था जिसे गुमटी के सामने टेम्पो से उतारा गया था—काला, भारी, सफ़ेद पेंट से "अंकुश यादव" लिखा हुआ, और उसके अंदर मैले पीले कपड़े में लिपटा ज़ंग लगा ताला।
मैंने उसे वहीं रखा था। कमरे के कोने में। उसकी जगह से हटाया नहीं था।
पर अब वो खिसककर कमरे के बीच में आ गया था, जैसे किसी ने उसे धक्का दिया हो।
और उसका ताला—
एक बार ज़ोर से खटखटाया।
एक बार। बस एक बार।
फिर पीछे वाले कमरे का दरवाज़ा धीरे से खुला और उसमें से वो बूढ़ी आवाज़ आई जो मैंने रात भर सुनी थी, और जो अब किसी और की लग रही थी।
“अब सुन,” आवाज़ ने कहा। “यह घंटी तेरे खून की नहीं है।”
मैं वहीं खड़ा रह गया।
मेरे हाथ में घंटी थी। लाल खोल में लिपटी, हरे धागे की साइकिल वाली। मैंने उसे हथेली पर रखा। पीतल ठंडा था—आज पहली बार, इतना ठंडा कि लगा जैसे वो मुझे छोड़कर जा रही हो।
“तू झूठ बोल रही है,” मैंने कहा।
“घंटी झूठ नहीं बोलती,” आवाज़ ने कहा। “और जिसकी है वो आज शाम पाँच बजे भारद्वाज भवन में तेरा इंतज़ार कर रहा है।”
मैंने काग़ज़ निकाला। मैंने उसे दोबारा पढ़ा। मेरे हाथ काँप रहे थे।
“कौन है वो?” मैंने पूछा। “किसकी है यह घंटी?”
आवाज़ ने कोई जवाब नहीं दिया।
कमरा चुप हो गया।
मैंने अपनी घंटी उठाई और उसे खोल से बाहर निकाला। पीतल पर वो दो लकीरें और बिंदु अभी भी था—पर आज उसके नीचे एक और हल्की लकीर दिख रही थी। जैसे किसी ने हाल में उस पर कुछ खुरचा हो।
और मैंने कान लगाकर सुना—घंटी के अंदर से एक धीमी खट-खट आ रही थी। ऐसे जैसे कोई उसके भीतर बैठा हो और अपने होने का इशारा दे रहा हो।
बाहर से माँ की आवाज़ आई।
“अंकुश—काजल कह रही है कि अस्पताल से फोन आया है। कह रहे हैं कि तीसरी मंज़िल का काग़ज़ आज ज़ब्त होगा।”
मैंने घंटी जेब में रखी और कमरे से बाहर आया।
माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं। उनका चेहरा उतरा हुआ था।
“माँ,” मैंने कहा। “एक बात पूछूँ?”
“बोल।”
“पापा ने घंटी किससे ली थी?”
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो पल था जब कोई बरसों से छिपी बात याद आ जाए और फिर छिपानी पड़े।
“मुझे नहीं पता,” उन्होंने कहा।
“माँ।”
“बेटा, मुझे सच में नहीं पता। पर एक बात जानती हूँ।”
“क्या?”
“जिस दिन यह घंटी घर में आई थी,” माँ ने कहा, “उस दिन पापा ने मुझसे एक बात कही थी।”
“क्या?”
“उन्होंने कहा—जिस दिन यह घंटी बोलेगी, उस दिन मेरा घर बचेगा या जाएगा।”
माँ की आवाज़ धीमी हो गई।
“और अंकुश,” उन्होंने कहा, “वो घंटी आज बोल रही है।”
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और लाल खोल में लिपटी घंटी को महसूस किया। वो गरम हो रही थी। धीरे-धीरे। जैसे किसी ने उसे छुआ हो।
और मेरे सामने, गली के मोड़ पर, एक सफ़ेद गाड़ी आकर रुकी।
उसकी खिड़की धीरे से नीचे आई।
अंदर से एक आदमी ने बाहर झाँका और बिना मुस्कुराए, बिना हाथ हिलाए, सिर्फ़ इतना कहा—
“अंकुश यादव जी?”
“हाँ।”
“साहब ने याद किया है। पाँच बजे शाम। भारद्वाज भवन। वही पाँच बजे, जो आपके काग़ज़ पर लिखा है।”
वो हँसा नहीं, न ही उसने कोई धमकी दी। उसने सिर्फ़ खिड़की चढ़ाई और गाड़ी चली गई।
मैं वहीं खड़ा रह गया।
मेरे हाथ में काग़ज़ था, जिस पर टिंकू की लिखाई थी—और उसके पीछे वो लाइन, जिसने सब कुछ बदल दिया था।
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली और उसे अपने माथे से लगाया।
“तू कुछ जानती है,” मैंने धीरे से कहा। “और मुझे बताना पड़ेगा।”
घंटी ने कोई जवाब नहीं दिया। बस, बिना बजे, धीरे से काँपी—जैसे अंदर से किसी ने उसे छुआ हो।
और उस धीमी खट-खट के साथ, जो अब साफ़ सुनाई दे रही थी, मुझे लगा कि मेरे दादा ने जो घंटी किसी से ली थी—वो इस शहर में किसी ऐसे आदमी के पास है, जो आज शाम मेरा इंतज़ार कर रहा है। और वो मेरे पास से यह घंटी वापस माँगेगा।
पर वो यह नहीं जानता कि यह घंटी अब सिर्फ़ मेरे गले में नहीं लटकती।
यह मेरे घर के नाम से लटकती है।
और जिस दिन यह घंटी अपने असली मालिक से मिलेगी, उस दिन मेरे घर का सबसे पुराना नाम कटेगा—यह बात उस काग़ज़ पर लिखी हुई है, जो किसी ने टिंकू की लिखाई की नक़ल में छोड़ दिया।
मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा और दुकान के अंदर गया।
पीछे वाले कमरे में काला बक्सा अब भी वहीं खड़ा था। खिसका हुआ। और उसका ताला—
उसका ताला एक बार फिर खटखटाया।
फिर चुप हो गया।
मैंने घंटी जेब में रखी और कुर्सी पर बैठ गया। बाहर से बच्चों की आवाज़ आ रही थी, कोई साइकिल बजा रहा था, गुमटी पर चाय की केतली खौल रही थी।
पर मेरे अंदर एक ही आवाज़ गूँज रही थी—
यह घंटी तेरे खून की नहीं है।
और आज शाम पाँच बजे, उसका असली मालिक मेरा इंतज़ार कर रहा है।
मैंने अपनी कॉपी निकाली। मैंने उस पर आज का पहला नाम लिखा—टिंकू के आगे, सुबह सात बजे गाड़ी, राँची, नाम रोशन करना। और उसके नीचे मैंने लिखा—शाम पाँच बजे, भारद्वाज भवन, घंटी का असली मालिक।
फिर मैंने पेंसिल रखी और काग़ज़ को दोबारा पढ़ा।
मेरे हाथ अब भी काँप रहे थे।
और उसी पल, मेरी जेब में घंटी गरम होकर बजी—
“जिससे ली है, उससे मिलाने का वक़्त आ गया।”
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