The Mysterious Bell – Chapter 1126
सुबह छह बजे की गुमटी पर भाप उठ रही थी। शबनम आपा का चूल्हा आज रोज़ से पहले जला था, और गली में अभी भी वो आधी नींद वाला सन्नाटा था जो सूरज निकलने से पहले आता है।
टिंकू गुमटी के सामने खड़ा था। एक छोटा सा बैग—वही जिसे उस्ताद ने हाथ से सीया था—कंधे पर लटका था, और टोपी आज उसने सीधी नहीं, थोड़ी टेढ़ी पहनी थी, जैसे जान-बूझकर अपने उस्ताद की आदत निकाल रहा हो।
शबनम आपा ने बिना कुछ पूछे गरम समोसा उसकी हथेली पर रख दिया। फिर एक रुमाल निकाला—लाल बॉर्डर वाला, घिसा हुआ—उसमें कुछ पैसे बाँधकर उसकी कमीज़ की जेब में डाल दिए।
“आपा, यह क्या?”
“चुप,” शबनम आपा ने कहा। “रास्ते में जब भूख लगे, तो गुमटी की याद आएगी।”
“मैं भूखा नहीं हूँ।”
“तू सुबह से भूखा है,” शबनम आपा ने कहा। “सामने आईना है, मुँह देख।”
टिंकू हँसा। और मैं—अंकुश—गुमटी के पीछे से निकलकर आया। मेरे हाथ में एक छोटी पोटली थी, जो माँ ने आधी रात को बनाई थी, और आँखों में वो नींद थी जो इस वक़्त किसी को नहीं दिखानी चाहिए।
“उस्ताद!”
“हाँ, हाँ,” मैंने कहा। “बड़ा नाम है तेरा। सुबह छह बजे भी टोपी टेढ़ी है।”
मैंने उसके बाल बिगाड़ दिए। वो मुस्कुराया, फिर अपने बाल सीधे किए।
“उस्ताद, यह पोटली क्या है?”
“माँ ने बनाई है।”
“पर कल रात तो—”
“कल रात माँ की नींद खुली थी,” मैंने कहा। “उन्हें क्या पता कि तू सुबह गाड़ी में बैठेगा? उन्हें लगा जैसे किसी को रास्ते में जाना है, तो कुछ बना दिया।”
टिंकू ने पोटली दोनों हाथों से पकड़ी। उसका वज़न हल्का था, पर मैं जानता था कि उसका हिसाब भारी है।
“उस्ताद,” उसने कहा। “एक बात कहूँ?”
“बोल।”
“तुमने मुझे कल रात कहा था कि ताले का जोड़ा ढूँढोगे। मुझे एक बात समझ आई है।”
“क्या?”
“जब तुम जोड़ा ढूँढने जाओ, तो मुझे याद करना।”
मैंने हँसते हुए उसके कंधे पर हाथ रखा।
“तू यह सोचता है कि मैं तुझे भूल जाऊँगा?”
“नहीं,” उसने कहा। “पर उस्ताद, एक बात है।”
“बोल ना।”
“मेरे पास तुम्हारी कोई चीज़ नहीं है जो मैं साथ ले जाऊँ। और मुझे लगता है कि जब तुम जोड़ा ढूँढने जाओगे, तुम्हें भी कोई चीज़ चाहिए जो तुम्हें बताए कि मैं कहीं हूँ।”
मैंने गले से अपनी चाबी उतारी और उसे हथेली पर रख लिया। फिर मैंने उसे वापस गले में डाल लिया।
“यह तेरी नहीं है,” मैंने कहा। “यह मेरे पापा की है, और मुझे अभी इसकी तलाश है।”
टिंकू का चेहरा थोड़ा उतर गया।
“पर सुन,” मैंने कहा। “जब भी मेरी घंटी बजेगी, तुझे उस आवाज़ में मेरा नाम सुनाई देगा।”
“कैसे?”
“क्योंकि तू जानता है कि मैं कब बजाता हूँ।”
टिंकू ने एक पल सोचा, फिर हँस दिया।
“तुम धोखेबाज़ हो, उस्ताद।”
“बाप-दादा का पेशा है,” मैंने कहा।
तभी गली के मोड़ से माँ आईं। उनके हाथ में छोटा सा कपड़े का टुकड़ा था—कोई रुमाल नहीं, कोई पोटली नहीं, बस एक मोड़ा हुआ टुकड़ा जिसमें उन्होंने कुछ सिल रखा था।
“सुशीला दीदी,” शबनम आपा ने कहा। “आप भी आ गईं?”
“मेरा बेटा मुझे बताए बिना कहीं नहीं जाता,” माँ ने कहा। फिर वो टिंकू के पास आईं और उसके गालों पर हाथ रखकर उसे देखा। “बेटा, खाना खाता रहना। किताबें पढ़ना। और माँ की मशीन जब चले, तो उसे कोई गाना गाते हुए सुनना।”
“कौन सा गाना, माँ?”
“जो मैं सीते वक़्त गाती हूँ,” माँ ने कहा। “वो।”
टिंकू ने रुमाल लिया और अपनी जेब में डाल लिया। काजल पीछे खड़ी थी, और उसकी आँखें भरी हुई थीं।
“काजल दीदी,” टिंकू ने कहा। “तुम रो रही हो?”
“नहीं,” काजल ने कहा, और मुँह फेर लिया। फिर पलटकर बोली, “मैं नहीं रो रही। तुम्हारी टोपी टेढ़ी है।”
टिंकू ने टोपी सीधी की और हँसा।
उस्ताद अली बक्श तब पहुँचे जब शबनम आपा चाय के कप गिन रही थीं। उनके हाथ में एक छोटी सी थैली थी, और काँपते हाथ से उन्होंने उसे टिंकू के कंधे पर रख दिया।
“मास्टर तुझसे कहेगा कि तू उसका सबसे अच्छा शागिर्द है,” उस्ताद ने कहा। “पर तू उसे बताना कि तेरे असली में दो उस्ताद हैं। एक वहाँ का, और एक यहाँ का।”
“मैं बता दूँगा,” टिंकू ने कहा। “पर क्या वो यह सुनकर नाराज़ होंगे?”
“वो भी उस्ताद है,” उस्ताद ने कहा। “वो समझ जाएगा।”
भैरों काका आए। वो बिजलीघर के पीछे वाली झोपड़ी से आ रहे थे और उनके कपड़ों पर धूल थी। उन्होंने टिंकू के सिर पर हाथ रखा।
“मैंने तुझे बचपन में देखा है,” उन्होंने कहा। “जब तू दुकान के बाहर हाथ से लोहे की छड़ मरोड़ता था। अब जा। पर वापस आते वक़्त मेरी झोपड़ी में रोटी खाने आ जाना।”
टिंकू ने सिर हिलाया।
चारों जासूस तब आए जब सब गली के मोड़ की तरफ़ बढ़ रहे थे।
सानिया की लाल कवर वाली कॉपी हाथ में थी और उसने अपने गले में एक सफ़ेद फीता बाँधा था, जैसे कोई बैज हो। गुड्डू बैग उठाने की ज़िद कर रहा था, पर उसका बैग किसी और से भी बड़ा था। रफ़ीक़ अपना टूटा चश्मा पहने था, और चिंटू एक छोटी पोटली में मिठाई लाया था।
“यह क्या है?” टिंकू ने पूछा।
“यह तुझे रास्ते में खाना है,” सानिया ने कहा। “पर हमने इसमें से थोड़ी खा ली है, क्योंकि हम जासूस हैं और हमें चेक करना पड़ता है।”
टिंकू हँसा और पोटली ले ली।
“और यह,” गुड्डू ने एक काग़ज़ निकाला। “यह तेरे लिए है।”
टिंकू ने काग़ज़ खोला। उस पर बच्चों के हाथ की लिखाई में लिखा था—तू हमारा जासूस है। तू जहाँ भी रहेगा, हमारा नाम रोशन करना।
टिंकू ने काग़ज़ मोड़कर अपनी कमीज़ की जेब में रख लिया।
“पर एक बात बताओ,” उसने कहा। “तुम चार लोग यहाँ हो, तो गली में कौन जासूसी करेगा?”
“अंकुश भाई है ना,” चिंटू ने कहा, और सब हँसे।
तब गाड़ी आई। वो कोई बड़ी बस नहीं थी, बल्कि एक छोटा सा टेम्पो था जो रोज़ सुबह स्टेशन तक लोगों को ले जाता था। ड्राइवर गाड़ी रोककर हॉर्न बजाया।
“चल बेटा, देर हो रही है,” उसने आवाज़ दी।
टिंकू ने एक बार पलटकर सबको देखा। माँ ने हाथ उठाया, काजल ने, उस्ताद ने, भैरों काका ने, शबनम आपा ने। मैंने नहीं।
मैं वहीं खड़ा रहा।
टिंकू टेम्पो में चढ़ा। उसने खिड़की से बाहर हाथ निकाला और हिलाया। बच्चे दौड़े—सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू—गाड़ी के पीछे-पीछे दौड़ते रहे जब तक गली का मोड़ आड़ में नहीं आ गया।
मैं उसी जगह पर खड़ा रहा जहाँ खड़ा था।
माँ आईं और मेरे कंधे पर हाथ रखा।
“बेटा, वो जाएगा, और लौटेगा,” उन्होंने कहा।
“मुझे पता है, माँ।”
“पता है, तो चल। चाय ठंडी हो रही है।”
मैं दुकान पर लौटा। शटर उठाया। अंदर अंधेरा था और धूल की वो गंध थी जो लोहे के औज़ारों पर बरसों में बनती है।
मैं अकेला बैठ गया।
बाहर से आवाज़ें आ रही थीं। कोई साइकिल पर से गुज़रा और उसकी घंटी बजी। कोई बच्चा हँसते हुए भागा। गुमटी की तरफ़ से शबनम आपा की आवाज़ आई—चाय, दो, एक बिना चीनी।
पर मेरी दुकान में सिर्फ़ मशीन की टिक-टिक बची थी।
मैंने औज़ारों का बक्सा खोला।
वो मज़बूत लोहे का बक्सा था जिसे मेरे पापा ने बनवाया था, और जिसका ताला पिछले हफ़्ते ही बदला था। मैंने उसे खोला और उसमें से एक-एक करके औज़ार निकाले—रिंच, पेचकस, छेनी, हथौड़ा, कुछ पुराने पेंच। सबसे ऊपर, सबसे ऊपर रखा था एक काग़ज़।
मैंने उसे उठाया। उस पर टिंकू की टेढ़ी लिखाई थी—वही लिखाई जो मैंने उसे कई बार सुधारने की कोशिश की थी, और वो कभी नहीं सुधरी।
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