The Mysterious Bell – Chapter 1125
“जब मैं तेरी उम्र का था, तो मुझे लगता था कि बड़ा होना मतलब अपने दम पर सब करना। मैंने सब कुछ अकेले करने की ज़िद की। और उस ज़िद में मैंने बहुत कुछ तोड़ दिया।”
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
“तू बाहर जा रहा है। वहाँ तेरे पास कोई पीपल नहीं होगा, कोई शबनम आपा नहीं होगी, मैं नहीं होऊँगा। वहाँ अगर तुझे कोई दिक्कत हो, तो अकेले मत सहना। किसी से कहना। किसी को भी। सुन्नी पड़ी दुकान में भी कोई न कोई होता है, जो चाय पीने आ जाता है।”
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।
“तुम्हारे जैसा बोल रहा है यह?”
“हाँ, आज का दिन है। बोलने दो।”
वो हँसा। फिर उसने मेरा हाथ पकड़ा।
“उस्ताद, एक बात पूछूँ?”
“पूछ।”
“तुम मुझे भूल जाओगे?”
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।
“वो मेज़ जो मैंने तेरे नाम की बोली थी, वो आज भी खाली है। उस पर तेरा नाम तभी लिखूँगा, जब तू लौटेगा। और उस दिन तक मैं उस मेज़ को किसी और को नहीं दूँगा।”
रात ग्यारह बजे के आसपास चबूतरी खाली हो गई।
मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में गया। चारपाई पर चादर बिछी थी। बल्ब गुनगुना रहा था।
टिंकू भी आया। उसके हाथ में वो अख़बार की टोपी थी और कंधे पर सिला हुआ बस्ता।
“कल सुबह की गाड़ी है?” मैंने पूछा।
“हाँ, सात बजे।”
“मैं साथ चलूँगा।”
“नहीं,” उसने कहा।
“क्यों?”
“क्योंकि तुम्हारे साथ चलने से मैं रो पड़ूँगा, और स्टेशन पर मेरी टोपी गीली हो जाएगी।”
मैं हँस पड़ा।
वो चारपाई पर बैठ गया। मैं भी बैठ गया।
कुछ देर हम दोनों चुप बैठे रहे। बाहर से नाली में पानी की आवाज़ आ रही थी।
“उस्ताद,” उसने कहा।
“हाँ।”
“वो ताला।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“क्या?”
“जो तुम रात भर हाथ में पकड़े थे। जिससे आवाज़ आ रही थी।”
“हाँ, क्या?”
“मुझे उसकी आवाज़ सुननी है।”
मैंने एक पल उसकी तरफ़ देखा।
“टिंकू, वो कोई खिलौना नहीं है।”
“मुझे पता है।”
“उससे आवाज़ आती है, और आवाज़ सिर्फ़ आवाज़ नहीं होती। वो अंदर जाती है।”
“मुझे पता है, उस्ताद। इसीलिए सुननी है।”
“क्यों?”
“क्योंकि मैं जब चला जाऊँगा, तो तुम अकेले रह जाओगे। और मैं नहीं चाहता कि तुम अकेले उससे बात करो। मैं भी सुन लूँ, तो शायद मुझे भी पता चल जाए कि अंदर कौन बोल रहा है।”
मैं एक पल चुप बैठा रहा।
फिर मैं उठा, औज़ारों के ट्रंक को खोला, उसमें से मैले कपड़े के नीचे से वो ज़ंग लगा ताला निकाला।
वो मेरे हाथ में भारी था।
मैंने उसे टिंकू के आगे किया।
“एक बात पहले,” मैंने कहा। “अगर अंदर से कुछ गलत लगे, तो तुरंत मेरे हाथ में डाल देना। वादा?”
“वादा।”
और मैंने ताला उसके हाथ में रख दिया।
टिंकू ने उसे दोनों हाथों से पकड़ा।
पहले कुछ नहीं हुआ। वो ताले को अपनी गोद में रखकर देखता रहा। मैंने देखा कि उसके हाथ ठीक हैं।
फिर उसकी उँगलियाँ दरार तक गईं।
और वो काँप गया।
पूरे शरीर से।
“टिंकू?”
उसने ताले को और कसकर पकड़ लिया। उसकी आँखें खुली थीं, पर वो कहीं और देख रहा था।
“टिंकू!” मैंने आगे झुककर उसके कंधे को पकड़ा।
वो एक झटके में मेरी तरफ़ मुड़ा।
उसका चेहरा ऐसा था जैसे उसने अभी कुछ ऐसा देखा है जो उसकी उम्र का नहीं है।
“उस्ताद…”
“क्या हुआ? क्या सुना?”
उसने ताला वापस मुझे दिया। उसके हाथ अब भी काँप रहे थे। उसने अपनी बाँह रगड़ी, जैसे बर्फ़ लगी हो।
“किसी ने कान में कुछ कहा,” उसने कहा, आवाज़ फटी हुई।
“क्या कहा?”
उसने पानी पीने के लिए हाथ बढ़ाया। मैंने स्टील का गिलास उठाकर उसकी तरफ़ बढ़ाया। उसने दो घूँट पिए और गिलास मेज़ पर रख दिया।
“एक नाम कहा,” उसने कहा।
“कौन सा नाम?”
“वो नाम जो मैंने पहले कभी नहीं सुना। पर… पर जैसे ही उसने कहा, मुझे लगा कि यह नाम मुझे पता होना चाहिए था।”
“टिंकू, नाम क्या था?”
वो मेरी तरफ़ देखता रहा। बल्ब की पीली रोशनी में उसकी आँखों में पानी था।
“मंसूर,” उसने धीरे से कहा।
मेरे हाथ से गिलास छूटते-छूटते बचा।
“क्या कहा?”
“मंसूर,” उसने दोहराया। “उस्ताद, आवाज़ ने कहा — मंसूर।”
मैं वहीं बैठ गया। मेरा दिमाग़ तेज़ी से चलने लगा।
मंसूर। वो बूढ़ा, जो पुराने बाज़ार में ताले-चाबी की बंद दुकान चलाता है। जिसने कहा था कि उसने यह ताला बनाया था। जिसने कहा था कि चाबियाँ बदलने की रात के बाद उसने दोबारा वो चाबियाँ नहीं देखीं।
“और कुछ कहा?” मैंने पूछा।
टिंकू ने हाँ में सिर हिलाया।
“क्या कहा?”
वो एक पल चुप रहा। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा।
“आवाज़ ने कहा कि ताले का जोड़ा उसी मंसूर के पास है।”
मैं उठ खड़ा हुआ।
“तो फिर कल सुबह मैं सीधे उसकी दुकान जाऊँगा।”
“उस्ताद, रुको।”
मैं रुका।
टिंकू ने अपने हाथों को गोद में रखा। उसकी आवाज़ अब थोड़ी सँभली हुई थी, पर उसमें एक अजीब सी शांति थी, जो मुझे डरा रही थी।
“आवाज़ ने एक बात और कही,” उसने कहा।
“क्या?”
“उसने कहा कि जोड़ा जिस दिन खुलेगा…”
वो रुका।
“हाँ, तो?”
“उस दिन एक नाम हमेशा के लिए बंद हो जाएगा।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
बल्ब गुनगुनाता रहा। बाहर नाली में पानी बहता रहा। और मेरी जेब में घंटी, लाल कपड़े के खोल में लिपटी हुई, ठंडी पड़ी रही — ऐसी ठंडी जैसे उसने भी यह बात सुन ली हो और अब बोलना नहीं चाहती हो।
मैं धीरे से चारपाई पर बैठ गया।
“टिंकू, आवाज़ ने यह नहीं बताया कि कौन सा नाम बंद होगा?”
“नहीं,” उसने कहा। “और उस्ताद, अगर तुम मुझसे यह पूछो कि मैं डर गया हूँ या नहीं…”
“तो?”
“तो हाँ,” उसने कहा। “मैं डर गया हूँ। पर डर के साथ एक बात और भी है।”
“क्या?”
“मुझे लगा, आवाज़ मुझसे यह नहीं कह रही थी कि रुक जाओ। वो मुझसे यह कह रही थी कि तैयार रहो।”
मैंने ताला उठाया। वो अब ठंडा था। दरार से आती गंध भी हल्की हो गई थी, जैसे आवाज़ ने अपना काम कर दिया हो और अब सो गई हो।
मैंने ताले को सीने से लगाया।
मेरे दिमाग़ में एक ही बात चल रही थी — मंसूर ने कहा था कि वो ताला उसने बनाया। और मंसूर ने यह भी कहा था कि दो चाबियाँ हैं। दो बड़ी, दो छोटी। एक इस घर में, एक रणवीर के घर में।
तो फिर जोड़ा कहाँ है?
और जो नाम हमेशा के लिए बंद होगा — वो किसका नाम है?
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। वो चारपाई पर बैठा मुझे देख रहा था, और उसकी आँखों में वो डर अब भी था, जो उसने कभी किसी को नहीं बताया था।
“टिंकू,” मैंने कहा।
“हाँ, उस्ताद।”
“कल सुबह तू गाड़ी में बैठेगा। और मैं मंसूर की दुकान पर जाऊँगा।”
“उस्ताद…”
“सुन। तेरा काम पढ़ना है। मेरा काम ताले का जोड़ा ढूँढना है। और अगर वो जोड़ा ऐसा है कि खुलने पर कोई नाम बंद हो जाए, तो मैं पहले यह जानूँगा कि वो नाम किसका है।”
मैंने ताले को औज़ारों के ट्रंक में वापस रखा और उसे बंद किया।
“पर एक बात माननी पड़ेगी,” मैंने कहा।
“क्या?”
“तू जब तक शहर से बाहर है, मैं ताले के जोड़े को अकेले नहीं खोलूँगा।”
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।
“क्यों?”
“क्योंकि शायद वो आवाज़ तुझे ऐसे ही नहीं चुनी।”
और उस रात, बहुत देर बाद, जब टिंकू सो गया, तो मैं दुकान के बाहर निकला।
गली में सिर्फ़ पीपल के नीचे जलती छोटी आग की पीली रोशनी थी।
मैंने जेब से घंटी निकाली।
लाल कपड़े का खोल, हरे धागे की साइकिल, और उसके भीतर पीतल की घंटी।
मैंने उसे धीरे से हिलाया।
घंटी ने एक बार बजकर कहा — “अब नाम नहीं, निशान ढूँढ।”
और फिर चुप हो गई।
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