The Mysterious Bell – Chapter 1124
मैडम ने उसकी तरफ़ कुछ देर देखा।
फिर उन्होंने कलम उठाई।
“यहाँ नाम लिखना है,” उन्होंने कहा। “पूरा नाम।”
“टिंकू कुमार,” उसने कहा।
“पूरा।”
“मेरे पापा मुझे टिंकू बुलाते थे। कोई पूरा नाम नहीं रखा गया था। स्कूल के रजिस्टर में भी टिंकू कुमार ही लिखा है।”
मैडम ने कलम नीचे रखी।
“तो पूरा नाम आज रख लेते हैं,” उन्होंने कहा। “जो दुकान पर तेरा उस्ताद बुलाता है, वही तेरा नाम है।”
और उन्होंने फ़ॉर्म पर लिखा।
मैं खंभे के पीछे खड़ा था। मैंने अपना मुँह दूसरी तरफ़ कर लिया।
मुझे अपनी आँखें पोंछनी थीं, पर मैं चाहता था कि कोई मुझे इस हाल में न देखे। मैंने अपनी कमीज़ की आस्तीन से चेहरा पोंछा और वहीं खड़ा रहा।
टिंकू बाहर आया।
मुझे खंभे के पीछे देखकर वो एक पल रुका।
“उस्ताद…”
“क्या बात कर रहा था मैडम से?” मैंने कहा, आवाज़ कसकर सामान्य बनाकर।
“कुछ नहीं। फ़ॉर्म भरवा रहा था।”
“फ़ॉर्म?” मैंने आश्चर्य जताया। “कौन सा फ़ॉर्म?”
वो मुस्कुराया। उसे पता था कि मैं झूठ बोल रहा हूँ।
“उस्ताद, तुम मेज़ पर रखा फ़ॉर्म छिपा रहे थे, और अब पूछ रहे हो कौन सा फ़ॉर्म?”
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
“टिंकू।”
“हाँ।”
“क्या सच में जाना है?”
उसने मेरी तरफ़ देखा।
“हाँ, उस्ताद। और अब मैं अपने फ़ैसले से जा रहा हूँ, तुम्हारे डर से नहीं।”
मैंने उसका कंधा दबाया।
“तो ठीक है। पर एक बात।”
“क्या?”
“वहाँ से भागकर नहीं आना। अगर मुश्किल हो, तो आना। पर भागकर नहीं।”
उसने सिर हिलाया।
“और टिंकू।”
“हाँ?”
“मैं तुझे भूलूँगा नहीं। तेरे जाने के बाद भी दुकान में तेरी मेज़ रहेगी।”
वो चुप हो गया।
“मेज़?”
“हाँ। जिस पर तेरा नाम लिखा होगा। और जब तू लौटेगा, तो वहीं बैठेगा।”
वो हँसा, पर उसकी आँखों में पानी था।
“उस्ताद, तुम भी रो रहे हो?”
“मैं? मैं तो पसीना पोंछ रहा हूँ।”
“पसीना सुबह सात बजे आस्तीन से पोंछते हो?”
“चल, निकल यहाँ से।”
खबर गली में बिजली की तरह फैली।
और उसी शाम पीपल की चबूतरी पर वो होने लगा जो मैंने कभी नहीं सोचा था।
शबनम आपा ने गुमटी के बाहर दो कड़ाहियाँ चढ़ा दीं।
“सुन लो सब!” वो चिमटी हिलाते हुए चिल्लाईं। “जो ज़्यादा समोसा खाएगा, उसके हाथ में मैं खुद चिमटी लगाऊँगी! यह टिंकू के लिए है, किसी के पेट की भरपाई के लिए नहीं!”
चिंटू ने तीसरा समोसा मुँह में डालते हुए कहा, “आपा, मैं तो टिंकू भैया के लिए ही खा रहा हूँ।”
“झूठे! तेरे भैया को तेरे तीन समोसे नहीं चाहिए।”
“तो चार दे दो।”
शबनम आपा ने चिमटी उठाई। चिंटू भागा। गली हँसी से गूँज उठी।
सानिया और गुड्डू पुराने अख़बार की टोपी बना रहे थे।
“यह टोपी टिंकू भैया को पहननी है,” सानिया ने कहा। “जो बाहर जाता है, उसके सिर पर टोपी होती है। यह तो मेरी माँ ने बताया था।”
“अरे, वो तो सफ़र की टोपी होती है,” गुड्डू ने कहा।
“तो यही सही।”
रफ़ीक़ ने अपना टूटा चश्मा ठीक करके पहना और बोला, “मैं टोपी पर अक्षर लिखूँगा।”
“क्या लिखेगा?”
“टिंकू भैया — साइकिल भी, पढ़ाई भी।”
“बेवकूफ़, टोपी पर इतना कहाँ लिखेगा! टोपी छोटी है!”
“तो दो टोपी बना दें।”
मैं बीच में बैठा था और मैं देख रहा था कि शाम कैसे धीरे-धीरे रंग बदल रही है।
फिर उस्ताद अली बक्श आए। वो चुप थे, जैसे हमेशा होते हैं। वो सीधे टिंकू के पास गए, उसका बस्ता उठाया और उसे अपनी गोद में रख लिया।
“उस्ताद?” टिंकू ने कहा।
“तेरे बस्ते की ज़िप टूटी है,” उन्होंने कहा। “बाहर जाकर टूटी ज़िप वाला बस्ता ठीक नहीं लगता।”
वो चबूतरी के किनारे बैठ गए। उन्होंने जेब से सुई निकाली, धागा निकाला और बिना किसी मशीन के, अपने हाथ से, उस टूटी ज़िप को सिलने लगे।
मुझे पता है कि उनके पास मशीन है। वो दुकान पर है। पर वो लाए नहीं। वो जान-बूझकर हाथ से सी रहे थे।
क्योंकि हाथ से सिलने में वक़्त लगता है। और उन्हें वक़्त चाहिए था।
टिंकू उनके सामने बैठ गया। उसने कुछ नहीं कहा। वो सिर्फ़ देखता रहा।
“उस्ताद,” टिंकू ने थोड़ी देर बाद कहा, “मुझे माफ़ कर दो।”
“किस बात की माफ़ी?” उस्ताद ने सुई में धागा डालते हुए कहा।
“जाने की।”
“अरे पगले, जाने की माफ़ी नहीं माँगी जाती। जाने की बात बताई जाती है। तूने बता दी, इसलिए तू ठीक कर रहा है।”
उन्होंने सुई खींची।
“और हाँ, सुन।”
“क्या?”
“मेरी दुकान के बोर्ड पर मेरा नाम है। अगर तू बाहर जाकर कुछ बने, तो बोर्ड पर मेरे नाम के नीचे अपना नाम लिखवाने की ज़रूरत नहीं। बस आकर खड़ा हो जाना। मैं खुद लिख दूँगा।”
टिंकू ने सिर नीचा कर लिया।
“उस्ताद, आप भी रो रहे हो?”
“मैं रो क्यों रहा हूँ? मेरी उँगली में सुई लग गई।”
उन्होंने उँगली चूसी और फिर सिलाई करने लगे।
तभी लक्ष्मी दीदी आईं।
उनके हाथ में मोटे लाल कपड़े का एक छोटा सा खोल था। वो चुपचाप आकर मेरे सामने रुकीं।
“यह क्या है, दीदी?” मैंने पूछा।
“घंटी के लिए,” उन्होंने कहा।
मैंने उसे हाथ में लिया। मोटा लाल कपड़ा, किनारों पर छोटी-छोटी टाँके। और बीच में हरे धागे से एक साइकिल बनी थी — दो पहिये, एक हैंडल, और हैंडल पर एक छोटी घंटी।
मैंने उसे घूमाकर देखा।
“दीदी, यह आपने बनाया?”
“आज दोपहर से बना रही थी,” उन्होंने कहा। “घंटी नंगी जेब में रहती है। गरम होती है, ठंडी होती है, लोगों से टकराती है। किसी चीज़ में लिपटी रहे तो ठीक है।”
मैंने साइकिल की तरफ़ देखा। हरे धागे की साइकिल, लाल कपड़े पर, जैसे कोई बच्चा बना रहा हो।
और मैंने अपना मुँह दूसरी तरफ़ कर लिया।
क्योंकि मेरी आँखें भर आई थीं।
“बेटा?”
“दीदी, यह बहुत अच्छा है,” मैंने कहा, आवाज़ नीची करके।
मैंने घंटी जेब से निकाली और उसे उस खोल में रख दिया। घंटी खोल में बंद होकर भी मेरी जेब में गरम थी, जैसे उसे भी पता था कि आज क्या दिन है।
शाम ढलते-ढलते चबूतरी पर पूरी गली जमा थी।
किशनलाल काका चने का लोटा लेकर आए और बोले, “टिंकू, बाहर जाकर खाना ठीक से खाना। यहाँ मिलता है तो ठीक, वहाँ मिले तो भी ठीक। भूखा मत रहना।”
भोला भाई आए और उन्होंने टिंकू के हाथ में एक छोटी टॉर्च रख दी।
“रात में पढ़ने के लिए,” उन्होंने कहा। “बत्ती चली जाए तो काम आएगी।”
टिंकू ने वो टॉर्च दोनों हाथों से ली।
दुबे अंकल अपनी कुर्सी से उठकर आए। उन्होंने टिंकू के सिर पर हाथ रखा।
“बेटा, मैं पच्चीस साल थाने में बैठा हूँ। मैंने बहुत लड़के जाते देखे हैं। कुछ लौटते हैं, कुछ नहीं। पर जो लौटते हैं, वो एक बात कहते हैं।”
“क्या, अंकल?”
“कि बाहर की दुनिया बड़ी है, पर घर की गली छोटी नहीं होती। तू लौट आएगा, तो गली वैसी ही मिलेगी।”
टिंकू ने उनके पैर छुए।
शबनम आपा ने आख़िर में एक थाली उठाई और उस पर दो समोसे, एक कटोरी चटनी और एक गिलास पानी रखा।
“ले,” उसने कहा, “यह तेरी विदाई की थाली है। और सुन — बाहर जाकर मेरी चाय याद करना। मैं जानती हूँ, वहाँ ऐसी चाय नहीं मिलेगी।”
टिंकू ने थाली ली और उसने मुझे देखा।
“उस्ताद, तुम कुछ नहीं बोलोगे?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“मैं सोच रहा हूँ क्या बोलूँ,” मैंने कहा।
“कुछ भी बोलो।”
मैंने चारों तरफ़ देखा — चबूतरी, पीपल, बच्चे, बुज़ुर्ग, लालटेन की रोशनी, शबनम की कड़ाही से उठता धुआँ।
“टिंकू,” मैंने कहा, “मैं तुझे एक बात बताना चाहता हूँ, जो मैंने कभी किसी को नहीं बताई।”
“क्या?”
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