The Mysterious Bell – Chapter 1123
“भैरों काका?”
“हाँ।”
लक्ष्मी दीदी ने मेरा हाथ पकड़ा।
“बेटा, भैरों से सीधे मत पूछना।”
“क्यों?”
“क्योंकि जो आदमी बीस साल उन बक्सों के पास बैठा है, वो सब जानता है। और जो सब जानता है, वो अगर चुप है, तो उसकी चुप्पी में कुछ बड़ा होता है।”
मैंने उनका हाथ दबाया।
“दीदी, मैं जानता हूँ। इसीलिए जाना है।”
रात के तीसरे पहर मैं घर से निकला।
आसमान पर बादल थे, पर पानी नहीं पड़ रहा था। गली में सिर्फ़ एक लालटेन जल रही थी — पीपल के पास, जहाँ आज कोई बैठा नहीं था।
मैं नंगे पैर चल रहा था, क्योंकि चप्पल की आवाज़ लकड़ी के जूतों की आवाज़ से मिल जाती है, और मैं आज रात किसी को अपनी आहट नहीं देना चाहता था।
बिजलीघर की तरफ़ मुड़ता रास्ता चिकना था। घास पैरों के नीचे भीगी थी। मैं पीछे की झोपड़ी तक पहुँचा।
टिन और तिरपाल की दीवार पर रोशनी पड़ रही थी। भैरों काका जाग रहे थे।
वो टूटी सीमेंट टंकी के किनारे बैठे थे और उनके हाथ में मिट्टी का कुल्हड़ था। कुल्हड़ में से भाप उठ रही थी।
“अंदर आ जा,” उन्होंने मेरी तरफ़ देखे बिना कहा। “तेरे पैरों की आवाज़ पहचान ली। तू नंगे पैर आया है, इसका मतलब बात गंभीर है।”
मैं अंदर गया। झोपड़ी में घास की चटाई थी, एक ज़ंग लगा बक्सा था, और दीवार पर एक पुरानी टिन की लालटेन टँगी थी, जो जल नहीं रही थी।
“काका, मुझे एक बात पूछनी है।”
“पूछ।”
“क्या आपने यह चाबी पहले देखी है?”
मैंने जेब से वो पीतल की चाबी की नक़ल निकाली, जो मंसूर चाचा से बनवाई गई थी — घिसे दाँते, छल्ले पर पीली रस्सी, और उसी पीतल पर दो लकीरें और बीच में बिंदु।
भैरों काका ने उस चाबी को देखा।
और उनका चेहरा ऐसे बदला जैसे किसी ने उनके सामने पुराना दरवाज़ा खोल दिया हो।
उन्होंने कुल्हड़ मेज़ पर रखा। उनका हाथ काँप रहा था। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर चाबी की तरफ़, फिर दीवार पर टँगी उस बुझी लालटेन की तरफ़।
“यह चाबी तूने कहाँ से ली?”
“मैंने बनवाई है। नक़ल है। असली किसी और के पास है।”
“किसके पास?”
“यही जानने आया हूँ।”
भैरों काका उठ खड़े हुए। वो मुझसे कुछ कहना चाहते थे, पर उनके होठ बंद हो गए।
और फिर मैंने देखा, जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था।
भैरों काका डर गए थे।
वो आदमी, जो बीस साल से उन खट-खट करने वाले बक्सों के पास रह रहा था, जिसके पीछे की हथेली में आज तक जला निशान था, वो थरथर काँप रहा था।
“काका…”
“अंकुश,” उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ सूख गई थी, “इस चाबी को जेब में रख। और अगर मेरी बात माने, तो आज रात इसे किसी और को मत दिखाना।”
“काका, मुझे सिर्फ़ यह जानना है कि इसका जोड़ा कहाँ मिलेगा।”
“जोड़ा?”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
“तूने यह शब्द कहाँ से सीखा?”
वो मेरे सामने बैठ गए। उनके हाथ अब भी काँप रहे थे।
“फ़रिश्ते जैसी शक्ल नहीं होती, अंकुश। जोड़े भी इंसान जैसे होते हैं। एक दिखता है, एक छुपा रहता है। और जिस दिन दोनों मिलते हैं, उस दिन कोई चीज़ बंद हो जाती है।”
“क्या बंद हो जाती है?”
“यह मैं नहीं बताऊँगा।”
“काका!”
“अंकुश, मैंने एक बार इस चाबी जैसा कुछ देखा था। उस रात के बाद मैंने शपथ ली थी कि मैं इन बातों में नहीं पड़ूँगा।”
“कौन सी रात?”
उन्होंने कुछ नहीं कहा।
वो उठे और अपनी चटाई की तरफ़ बढ़े। फिर रुके।
“जो आदमी ताला बनाता है, उसके पास चाबी नहीं रहती। उसके पास रजिस्टर रहता है — किसके घर कौन सा ताला लगा, किसकी कितनी चाबी बनी, किसने दूसरी चाबी किसके हाथ में रखी।”
वो मेरी तरफ़ मुड़े।
“अगर तू सच में जोड़ा ढूँढना चाहता है, तो उस आदमी के रजिस्टर तक पहुँच। और अगर वो रजिस्टर ज़िंदा है, तो वो तुझे मिल जाएगा।”
“और अगर नहीं मिला?”
“तो समझ लेना, तेरा ताला जिसका है, उसने अपना नाम रजिस्टर से कटवा दिया है।”
वो झोपड़ी के भीतर चले गए।
मैं वहीं खड़ा रहा।
और तभी भीतर से उनकी आवाज़ आई, बहुत धीमी।
“अंकुश, एक बात याद रखना। जो ताला किसी का बंदा है, उसे खोलने से पहले पूछ — ताला किसका था? क्योंकि ताला अगर किसी औरत का है, तो उसका जोड़ा किसी मर्द के पास होगा। और वो मर्द आज ज़िंदा भी हो सकता है और मरा भी।”
मैंने झोपड़ी की तरफ़ देखा।
“काका, आपको क्या लगता है? वो ज़िंदा है?”
बहुत देर तक कोई जवाब नहीं आया।
फिर सिर्फ़ इतना आया — “जो बीस साल से खुद को ज़िंदा नहीं मानता, वो ज़िंदा होकर भी मरा हुआ होता है।”
मैं बाहर निकला।
बक्सों की कतार अंधेरे में खड़ी थी। छठा बक्सा, जिस पर धूल नहीं थी, वहीं था। मैंने उसकी तरफ़ देखा। मुझे लगा भीतर से कोई साँस ले रहा है।
मैंने तेज़ी से कदम बढ़ाए।
जब मैं दुकान पहुँचा तो सुबह की पहली किरण आसमान पर पीली लकीर बना रही थी।
शटर उठा हुआ था। दुकान के अंदर कोई था।
मैं अंदर गया।
लक्ष्मी दीदी वहीं मेज़ के पास बैठी थीं, पर टिंकू नहीं था।
“दीदी, टिंकू कहाँ?”
“गया है,” उन्होंने कहा।
“कहाँ?”
“जहाँ मैं उसे भेजना नहीं चाहती थी।”
मेरे हाथ में चाबी थी। मैंने उसे मेज़ पर रखा।
“दीदी, साफ़ बोलिए।”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें भरी हुई थीं, पर आवाज़ साफ़ थी।
“वो रमा मैडम के पास गया है। अपने पैरों से। मैंने उसे नहीं भेजा। उसने आज सुबह मेरा हाथ पकड़ा और कहा, माँ, मैं खुद बात करूँगा।”
मैं दुकान से निकला।
सड़क पार करके स्कूल की तरफ़ वाली गली में मुड़ा। रमा मैडम का घर पीपल की दूसरी गली में था, नीला दरवाज़ा, बाहर टूटी सीढ़ी और सूखा हुआ सा आँगन।
मैं दरवाज़े तक गया। दरवाज़ा खुला था।
मैं अंदर नहीं गया। मैं बाहर बरामदे के खंभे के पीछे खड़ा हो गया।
टिंकू अंदर चटाई पर बैठा था। उसके सामने मेज़ पर वही सफ़ेद फ़ॉर्म रखा था, जिसे मैंने औज़ारों के बक्से में छिपा दिया था।
रमा मैडम उसके सामने कुर्सी पर बैठी थीं।
“टिंकू, एक बार फिर सोच ले,” मैडम कह रही थीं। “आवासीय विद्यालय का मतलब है, तू यहाँ से चला जाएगा। रहना, खाना, पढ़ाई, सब वहीं। महीने में एक या दो बार घर आ पाएगा, अगर आ पाया तो।”
“मैडम, मुझे पता है।”
“और तेरी माँ?”
“माँ ने कहा कि मेरा फैसला मेरा है।”
“और उस्ताद?”
टिंकू एक पल चुप रहा।
फिर उसने कहा, “मैडम, मुझे उस्ताद से नाराज़गी नहीं है।”
“तो फिर जा क्यों रहा है?”
टिंकू ने अपने हाथों को गोद में रखा। वो मेज़ पर पड़े फ़ॉर्म को देख रहा था।
“मैडम, गली में लोग उस्ताद को मिस्त्री कहते हैं। किसी के पास साइकिल का पहिया टूटता है, तो वो उसकी दुकान पर जाता है। पर किसी के पास कोई बड़ी मुसीबत आती है, तो वो उसी दुकान पर आता है। क्यों?”
मैडम ने कुछ नहीं कहा।
“क्योंकि उस्ताद लोगों को जोड़ता है,” टिंकू ने कहा। “मुझे नहीं पता वो कैसे करता है। पर वो करता है।”
उसने मैडम की तरफ़ देखा।
“मैं उस्ताद की दुकान पर पच्चीस साल काम कर सकता हूँ। पर मैं उस दुकान का नाम नहीं बना सकता। क्योंकि दुकान का नाम बनाने के लिए मुझे कुछ बनना पड़ेगा। और वो मैं यहाँ रहकर नहीं बनूँगा।”
मेरा गला सूख गया।
“मैं पढ़ूँगा,” टिंकू ने कहा। “मैं वहाँ जाकर पढ़ूँगा, मैडम। और जिस दिन मेरा नाम किसी नतीजे की सूची में ऊपर आएगा, उस दिन मैं उस सूची के नीचे लिखवाऊँगा — यह लड़का उस दुकान से आता है जहाँ साइकिलें भी ठीक होती हैं और रिश्ते भी। और उस दुकान का नाम अंकुश यादव है।”
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno