The Mysterious Bell – Chapter 1122
लक्ष्मी दीदी ने उसकी तरफ़ देखा।
और फिर उन्होंने कुछ ऐसा कहा जिसने मेरी रीढ़ को ठंडा कर दिया।
उन्होंने कहा, "नहीं, बेटा। यह ताला मेरे मायके से नहीं आया।"
उन्होंने दरार पर उँगली रखी।
"यह ताला मैंने खुद यहाँ से उठाया था। इसी घर से। ब्याह के पहले दिन।"
मैंने उन्हें देखा।
"क्या?"
उन्होंने कहा, "उस दिन मैं इस घर में आई थी। दुल्हन बनकर। और मैंने यह ताला यहाँ पड़ा देखा था। तुम्हारे दादा के औज़ारों के बक्से पर। मैंने इसे उठाया, क्योंकि मुझे लगा कि यह किसी चीज़ का है और कहीं लगा होना चाहिए। और तभी तुम्हारे दादा ने मेरी तरफ़ देखा था।"
उनकी आवाज़ दब गई।
"उन्होंने मुझसे कहा था, बहू, इसे वहीं रख दो। यह किसी का है और वो इसे लेने आएगा।"
वो चुप हो गईं।
कमरे में सिर्फ़ बारिश की गंध रह गई, कपूर की गंध रह गई, और मेरी धड़कन रह गई।
मैंने धीरे से कहा, "दीदी, आपने यह बात आज तक किसी को नहीं बताई?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें भरी हुई थीं।
"बेटा, मैंने इस घर में चालीस साल काम किया। मैंने इस घर के बर्तन धोए, इस घर के कपड़े सीले, इस घर के लोगों की बीमारियों में रातें काटीं। और इस घर में एक चीज़ ऐसी थी जो मुझे लगता था कि मेरी है, पर जिसके बारे में सब कुछ ऐसा था जो मुझे नहीं पता था।"
उन्होंने दरार पर उँगली रखी।
"इसलिए नहीं बताया कि मुझे डर था। डर था कि अगर मैंने पूछा कि यह ताला किसका है, तो कोई पूछेगा कि तूने इसे उठाया क्यों था। और मैं जवाब नहीं दे पाती।"
टिंकू सामने खड़ा था। वो कुछ नहीं बोल रहा था। वो सिर्फ़ अपनी माँ को देख रहा था, जैसे उसे पहली बार देख रहा हो।
और मैं वहीं खड़ा था, हाथ में वो ज़ंग लगा ताला, जिसकी दरार से बारिश और कपूर की गंध आ रही थी।
और मेरे अंदर पहली बार एक बात साफ़ हो रही थी।
जो ताला मेरे घर में चालीस साल से पड़ा था, वो किसी और का था। जो काग़ज़ उसके भीतर बंद था, वो लक्ष्मी दीदी की माँ के हाथ का था।
और जिस आवाज़ ने रात में मेरा नाम बोला था, वो अब नरम होकर कह रही थी कि तीन सच पूरे हुए।
पर अगर तीन सच पूरे हुए, तो चौथा क्या था?
क्योंकि मुझे लग रहा था कि असली खेल तो अब शुरू हुआ है।
और तभी, उस दरार से, बहुत धीमी आवाज़ में, कुछ और सुनाई दिया।
जैसे कोई बहुत दूर से, बहुत पुराने कुएँ से, मेरा नाम बुला रहा हो।
पर इस बार आवाज़ ताले से नहीं आ रही थी।
आवाज़ दरार के भीतर रखे उस काग़ज़ से आ रही थी।
और उस आवाज़ में एक शब्द था, जो मैंने पहले कभी नहीं सुना था।
वो शब्द था, "बच्चा।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
क्योंकि वो आवाज़ मेरी माँ की थी।
नहीं।
वो आवाज़ मेरी माँ की नहीं थी।
वो आवाज़ किसी और की थी, जो मेरी माँ की तरह बोलती थी।
और मैं वहीं खड़ा रह गया, हाथ में ताला, दिल में एक ऐसा डर जो पहले कभी नहीं आया था।
टिंकू ने धीरे से कहा, "उस्ताद, तेरा हाथ काँप रहा है।"
मैंने ताले को सीने से लगाया। मैंने उसे कसकर पकड़ा।
और मैंने धीरे से कहा, "हाँ, टिंकू। काँप रहा है।"
लक्ष्मी दीदी ने मेरी तरफ़ देखा। उन्होंने कुछ कहना चाहा, पर मैंने उन्हें रोक दिया।
मैंने कहा, "दीदी, एक बात पूछूँ?"
"पूछ बेटा।"
"आपकी माँ कहाँ हैं?"
वो चुप हो गईं।
बहुत देर तक चुप रहीं।
फिर उन्होंने कहा, "ब्याह के तीसरे साल में चल बसीं।"
"उनका नाम?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
और जब उन्होंने नाम बताया, तो मुझे लगा कि मेरे अंदर का सारा हवा एक झटके में निकल गया है।
क्योंकि वो नाम मैंने पहले सुना था।
माँ की हिसाब की कॉपी में।
पापा के उस पुराने काग़ज़ में।
और उस पीली पर्ची में, जो मुझे कल शटर के नीचे मिली थी।
उस पर्ची में लिखा था, "जो नाम सबसे पहले आया था, वो अभी भी यहीं है।"
और मुझे अब समझ आ रहा था कि वो नाम कौन था।
मैंने ताले को और कसकर पकड़ा।
मैंने धीरे से कहा, "अब मुझे पता है, दीदी। यह ताला आपके मायके से नहीं आया। और यह आपका भी नहीं है।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगीं।
मैंने कहा, "यह उस औरत का है जिसने हमारे घर से कुछ लिया, और कुछ छोड़ गई।"
और तभी ताले के भीतर से वो आवाज़ फिर आई।
इस बार साफ़।
इस बार पहचानी हुई।
और उसने सिर्फ़ इतना कहा, "बेटा, तेरी माँ को बता देना कि मैं आ गई।"
॥
“बच्चा।”
वो शब्द कमरे में इस तरह गूँजा जैसे किसी पुराने कुएँ में पत्थर गिरा हो और गूँज लौटकर ऊपर न आ रही हो।
मेरे हाथ में ज़ंग लगा ताला था। दरार बाल जितनी पतली थी, पर उस दरार से बारिश, गीली मिट्टी और कपूर की गंध ऐसे आ रही थी जैसे कोई पुराना संदूक अभी-अभी खुला हो।
लक्ष्मी दीदी मेरे सामने बैठी थीं। उनके हाथ गोद में थे, और उनकी आँखें मेरे हाथ पर टिकी थीं, जैसे वो ताला नहीं, कोई ज़िंदा चीज़ पकड़े हुए हूँ।
टिंकू दरवाज़े के पास खड़ा था। उसने अपना बैग कंधे से उतार लिया था और उसे सीने से लगाए खड़ा था।
मैंने धीरे से ताले को मेज़ पर रखा।
“दीदी,” मैंने कहा, “आपने जो नाम बताया, वो मैंने पहले सुना है।”
लक्ष्मी दीदी ने धीरे से सिर हिलाया।
“कहाँ सुना, बेटा?”
“माँ की हिसाब की कॉपी में। पापा के उस पुराने काग़ज़ में। और उस पीली पर्ची में, जो कल शटर के नीचे मिली थी।”
दीदी ने कुछ नहीं कहा।
“उस पर्ची पर लिखा था — जो नाम सबसे पहले आया था, वो अभी भी यहीं है।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
“और अब मुझे लग रहा है कि वो नाम आपकी माँ का है।”
लक्ष्मी दीदी ने अपनी आँखें बंद कर लीं। बहुत देर तक ऐसे बैठी रहीं जैसे कोई पुरानी प्रार्थना याद कर रही हों।
फिर उन्होंने कहा, “बेटा, मेरी माँ का नाम हमारे घर में किसी ने नहीं लिया। मैंने भी नहीं। जिस दिन वो गईं, उस दिन के बाद मेरे पापा ने उनकी तस्वीर भी दीवार से उतार दी थी। कहते थे, देखूँगा तो टूट जाऊँगा।”
“तो फिर यह नाम माँ की कॉपी में कैसे आया?”
“यही तो मैं भी सोच रही हूँ,” उन्होंने कहा।
और तभी, कमरे की हवा में, फिर वो आवाज़ आई।
इस बार ज़्यादा साफ़।
“बेटा, तेरी माँ को बता देना कि मैं आ गई।”
मेरे हाथ से मेज़ का कोना छूट गया। मुझे लगा कमरा घूम रहा है।
टिंकू ने दो कदम आगे रखे।
“उस्ताद…”
“रुक, टिंकू।”
“उस्ताद, यह आवाज़ अंदर से नहीं आ रही।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“कैसे पता?”
“क्योंकि जब यह आवाज़ आती है, तब ताले की दरार से हवा बाहर आती है।”
उसने उँगली दरार के पास रखी।
“देखो, मेरी उँगली पर हवा लग रही है। अंदर से बाहर।”
मैंने देखा। सच में, दरार के किनारे पर उसकी उँगली के आगे हवा का कोई मोहीन हिस्सा ऐसे फिसल रहा था जैसे कोई साँस ले रहा हो।
लक्ष्मी दीदी ने अपना हाथ मेज़ पर रखा।
“बेटा, यह ताला मेरे घर से नहीं आया। यह तुम्हारे घर से आया है। और मैं इसे बरसों अपना समझती रही।”
“दीदी, यह आपका नहीं है, यह मैं अब जान गया हूँ।”
“किसका है?”
“मुझे नहीं पता। पर जो औरत यह ताला लाकर हमारे घर में छोड़ गई, उसने कुछ लिया भी था। और उसी ने कुछ छोड़ा भी था।”
मैंने ताले को उठाया।
“और आज रात मुझे यह पता करना है कि वो औरत कौन थी।”
टिंकू ने तभी कहा, “उस्ताद, सुबह होने में तीन घंटे बाकी हैं। तुम इस वक़्त किसको ढूँढोगे?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“उसको, जो बीस साल से बिजलीघर के पीछे रहता है और उन बक्सों से कभी नहीं डरा।”
टिंकू ने एक पल सोचा।
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