The Mysterious Bell – Chapter 1121
मैंने कहा और मुझे लगा कि यह कहकर मैंने अपने बारे में कुछ ऐसा खोल दिया है जो मैं खुद भी नहीं देखना चाहता था।
"सोच, टिंकू। मैं एक साइकिल मिस्त्री हूँ। मेरी जेब में एक घंटी है जो मेरे ही हाथ में बजती है, और जिसकी मुझे कोई वजह समझ नहीं आती। रात को मेरे ही घर का एक ताला मेरा नाम बोलता है। और मेरी कॉपी में कोई बिना दिखे आकर भाई लिख देता है। यह सुनकर कोई भी कहेगा कि इस लड़के का दिमाग़ खराब हो गया है।"
मैंने साँस ली।
"माँ की दवा पर पैसा लग रहा है। अस्पताल की ज़मीन जा रही है। गली में एक-एक करके शटर गिर रहे हैं। और मैं इन सबके बीच यह कहने की हिम्मत नहीं करता कि मेरे घर का ताला मेरा नाम बोलता है और कोई मेरी कॉपी में आकर लिख जाता है।"
टिंकू ने कहा, "उस्ताद, मैं तेरी बात मानता हूँ।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"मैंने खुद देखा है। घंटी बजती है। ताला बोलता है। मैंने खुद सुना है।"
लक्ष्मी दीदी ने कहा, "और मैंने आज देखा। जब मैंने वो चाबी उठाई, तो वो मेरे हाथ में ऐसे ठंडी थी जैसे वो एक ग़लत हाथ में आ गई हो।"
मैंने कहा, "पर गली वाले नहीं मानेंगे। उन्हें यह कहानी नहीं चाहिए। उन्हें अपने किराए चाहिए, अपने बच्चों के स्कूल चाहिए। रणवीर उन्हें एक बात दे रहा है। मैं उन्हें क्या दे रहा हूँ? एक मिस्त्री जो कहता है कि ताला बोलता है।"
लक्ष्मी दीदी ने कहा, "तू यह कब से अकेले उठा रहा है?"
मैंने कहा, "बहुत दिन से।"
"अकेले क्यों?"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। मैंने कुछ कहना चाहा, पर कुछ नहीं निकला।
वही सवाल था। वही सवाल जो शबनम आपा ने पूछा था। वही सवाल जो मीरा ने पूछा था। वही जो रणवीर ने अपनी मीठी आवाज़ में पूछा था, यह कहकर कि यह लड़का सब अकेले क्यों लड़ना चाहता है। और मैं हर बार चुप हो जाता था।
तभी दुकान के बाहर मशीन से आवाज़ आई।
टिक।
टिक, टिक।
हम तीनों चौंककर उस तरफ़ देखने लगे।
शटर से आती पीली रोशनी में मशीन दिख रही थी। वो मशीन जो अब शबनम आपा की गुमटी के पीछे, दुकान के पास रखी थी। लक्ष्मी दीदी का अधूरा काम उस पर पड़ा था।
और उसका पहिया धीरे-धीरे घूम रहा था।
मैंने बल्ब की रोशनी में देखा। हम तीनों उस तरफ़ चले। लक्ष्मी दीदी आगे, टिंकू पीछे, मैं सबसे पीछे।
मशीन के पहिये पर लक्ष्मी दीदी का आधा सिला कपड़ा था। सुई टिक-टिक कर रही थी।
टिक।
टिक।
टिक।
इस बार पहिया बिना हाथ घूम रहा था। धीरे। इतना धीरे जैसे कोई बूढ़ा आदमी सीढ़ी चढ़ रहा हो।
मैंने पास जाकर देखा। मशीन अपने आप चल रही थी। सुई उठ रही थी, गिर रही थी, और कपड़े पर उन्नीस बार सी रही थी, फिर रुक गई।
टिक।
और फिर बिल्कुल चुप।
लक्ष्मी दीदी ने उस कपड़े को उठाया।
वो आख़िरी कमीज़ थी। उस्ताद अली बक्श का पचास साल पुराना सफ़ेद कुर्ता। जिसे वो अपनी पहली सिलाई मशीन के दिन पहने थे। जिस पर लक्ष्मी दीदी ने आज पूरा दिन काम किया था।
सुई उसके नीचे आख़िरी टाँके पर टिक करके रुक गई थी।
लक्ष्मी दीदी ने उसे देखा। उनके हाथ काँप रहे थे। उन्होंने टाँका छुआ।
उन्होंने धीरे से कहा, "यह टाँका मेरे हाथ का नहीं है।"
मेरे अंदर एक ठंडी लकीर दौड़ी।
मैंने कहा, "क्या मतलब?"
उन्होंने कपड़ा मेरी तरफ़ किया।
"मैं सीना भूल सकती हूँ, बेटा। उँगली फिसल सकती है। पर मैं अपना टाँका नहीं पहचानूँ, यह नहीं हो सकता। यह टाँका मेरे हाथ का नहीं है।"
टिंकू ने धीरे से कहा, "उस्ताद, देख।"
उसने कपड़े की दूसरी तरफ़ इशारा किया।
वहाँ, सफ़ेद कपड़े के कोने पर, बहुत छोटे अक्षरों में कुछ सिला हुआ था। नीले धागे से। वैसे ही, जैसे कॉपी के पन्ने पर लिखा था।
भाई।
इस बार यह लिखा नहीं था। यह सिला हुआ था।
मैंने उसे देखा और मेरी साँस रुक गई।
तभी मेरी जेब में घंटी गरम होने लगी।
वो गरम हो गई। जैसे किसी ने उसे आग पर रख दिया हो। मैंने उसे निकाला। वो मेरी हथेली पर चमक रही थी, पीली, गरम।
और वो बजी।
नहीं, सिर्फ़ बजी नहीं। वो खुलकर बजी। जैसे पचास साल बाद किसी ने उसकी जीभ खींच दी हो।
और खुले बक्से में रखे ज़ंग लगे ताले से आवाज़ आई।
वो वही बूढ़ी आवाज़ थी जो रात में मेरा नाम बोली थी। वही आवाज़ जो कहती थी कि अधूरा सच नहीं जोड़ेगा। वही आवाज़ जो कहती थी कि तेरा भाई दरवाज़े के उस पार है।
पर इस बार वो नरम थी।
बहुत नरम।
इतनी नरम कि मुझे लगा कि मैं उसे पहचानता हूँ।
उसने कहा, "तीन सच।"
कमरे में साँस तक नहीं थी।
"तीन सच पूरे हुए। तूने अपना डर बोला। लक्ष्मी ने अपना डर बोला। टिंकू ने अपना डर बोला। तीनों बिना टालमटोल के।"
मैंने मशीन के पास देखा। पहिया अब भी थोड़ा धीरे घूम रहा था, जैसे अभी-अभी साँस लेकर थमा हो।
आवाज़ आई, "अधूरा सच अब पूरा हुआ।"
और फिर, बहुत धीमे, जैसे कोई बूढ़ी औरत अपने बेटे को बुला रही हो, उसने कहा, "देख, अंकुश। देख, ताले की पीठ।"
मैं गया। मैंने बक्सा खोला। उसमें से ज़ंग लगा ताला निकाला। उसे दोनों हाथों से पकड़ा।
ताले की पीठ पर मैंने वो दो लकीर-बिंदु वाला निशान पहले भी देखा था। पचास बार। हर बार।
पर इस बार निशान के बीच में एक बाल जितनी पतली लकीर दिख रही थी।
दरार।
छोटी। बाल जितनी। इतनी पतली कि ठीक से देखो तो लगे कि नहीं है।
मैंने उँगली लगाई। वो ज़ंग छूकर फट गई, और दरार थोड़ी चौड़ी हो गई।
भीतर से गंध आई।
बारिश की गंध। गीली मिट्टी की गंध। और उसमें एक और गंध, मीठी सी, तेज़ सी, पुरानी सी।
कपूर की गंध।
वो कपूर जो पुराने संदूकों में रखा जाता है, कपड़ों के बीच, ताकि कीड़े न लगें।
मैंने दरार में आँख लगाई।
भीतर कुछ था।
काग़ज़। पीला, मुड़ा हुआ, किसी कपड़े में लिपटा हुआ कोना। मैंने उसे देखा। उसे खींचने की कोशिश की, पर वो फँसा था। मैं नहीं खींच सका।
मैंने कहा, "भीतर कुछ है।"
लक्ष्मी दीदी पास आईं। उन्होंने झुककर देखा।
"दरार से दिख रहा है?"
"हाँ। काग़ज़ का कोना है। लिपटा हुआ।"
वो और झुकीं। उनके सफ़ेद बाल उनके चेहरे पर आ गए। उन्होंने उसे ध्यान से देखा।
और फिर वो रुक गईं।
बिल्कुल रुक गईं।
जैसे किसी ने उनके भीतर के सारे खून को एक पल में ठंडा कर दिया हो।
उनका चेहरा सफ़ेद हो गया। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
मैंने कहा, "दीदी?"
वो नहीं बोलीं।
टिंकू ने कहा, "माँ, क्या हुआ?"
उन्होंने धीरे से उँगली दरार पर रखी। काँपती हुई। फिर उन्होंने काग़ज़ के उस कोने को देखा, जो बाहर झाँक रहा था।
उस पर लिखाई थी। बहुत पुरानी, बहुत हल्की, नीली स्याही में।
मैंने उसे पढ़ने की कोशिश की। मैं पढ़ नहीं सका, क्योंकि कोना छोटा था और स्याही फीकी थी।
पर लक्ष्मी दीदी उसे पढ़ रही थीं।
और वो पढ़ रही थीं जैसे कोई अपनी माँ की आवाज़ पचास साल बाद सुन रहा हो।
उन्होंने धीरे से, बहुत धीरे से कहा, "यह मेरी माँ की लिखाई है।"
कमरे में चुप्पी हो गई।
मैंने कहा, "क्या?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और उनकी आँखों में जो था, वो डर नहीं था। वो कुछ और था। कुछ गहरा। जैसे कोई ज़मीन अपने नीचे से खिसक रही हो।
उन्होंने कहा, "यह लिखाई मेरी माँ की है। मैं इसे कहीं भी पहचान लूँगी। उनकी क, उनकी म, उनका वो अधूरा अ… मैंने यह लिखाई अपनी कॉपियों पर, अपनी किताबों पर, अपने हाथों की हथेली पर देखी है।"
टिंकू ने कहा, "पर माँ, यह ताला तो नानी के घर से आया था ना?"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno