The Mysterious Bell – Chapter 1120
उसकी आँखें लाल थीं। वो रो नहीं रहा था। पर उसकी साँस तेज़ चल रही थी। ऐसी साँस जो गुस्से में इंसान लेता है जब उसे अपनी ही बात पर यक़ीन होने लगे हो।
मैंने कुछ नहीं कहा।
मैंने जेब से घंटी निकाली। वो फिर बजी थी। बिना वजह। बिना किसी चीज़ के। जैसे वो मुझे इशारा दे रही हो कि अब बोलना है।
मैंने घंटी को मेज़ पर रख दिया।
फिर मैंने वो काला बक्सा उठाया, जो गुमटी के सामने से आया था और जिसमें दादा का ज़ंग लगा ताला और रणवीर का काग़ज़ था। मैंने उसे बंद किया। ढक्कन रखकर ज़ोर से दबाया, ताकि कोई और उसे न खोले।
टिंकू ने देखा। बोला नहीं।
मैंने कहा, "अंदर आओ। दोनों।"
टिंकू कुछ पल खड़ा रहा। फिर वो चला। लक्ष्मी दीदी ने एक बार गुमटी के बाहर देखा, फिर अंदर आ गईं।
मैंने शटर आधा गिरा दिया। पूरा नहीं, आधा। ताकि हवा आती रहे, पर गली की नज़र अंदर न पड़े।
दुकान के पीछे वाला कमरा छोटा है। एक चारपाई। एक लोहे की अलमारी। औज़ारों का ट्रंक। और एक पुराना बल्ब, जो जलते वक़्त गुनगुनाता है।
मैंने बल्ब जलाया। वो गुनगुनाया। और उसकी पीली रोशनी में कमरे की हर चीज़ अपनी उम्र के हिसाब से दिखने लगी।
मैंने लक्ष्मी दीदी को चारपाई पर बैठाया।
टिंकू खुद बैठ गया। ट्रंक पर। मेरे सामने, आमने-सामने।
मैं बैठा नहीं। मैं खड़ा रहा। क्योंकि मुझे लगा कि अगर मैं बैठ गया तो मैं आराम से बोलूँगा, और आज आराम से बोलने का दिन नहीं था।
मैंने कहा, "टिंकू, आज मैं झूठ नहीं बोलूँगा। एक भी नहीं। बात कितनी भी बुरी लगे, कितनी भी बेतुकी लगे, मैं सच बोलूँगा।"
टिंकू ने कहा, "अभी तक तो बोल ही रहा था।"
यह सुनकर मेरे अंदर कुछ हिला। पर मैंने उसे जवाब नहीं दिया। मैंने उसकी बात को चुपचाप लिया। क्योंकि वो सच थी। अभी तक मैं बोलता रहा था, पर पूरा नहीं बोलता था।
मैंने कहा, "तूने पूछा कि मैंने फ़ॉर्म क्यों छिपाया। मैंने कहा, डर से। पर वो पूरा डर नहीं था। आधा था।"
लक्ष्मी दीदी ने कपड़ा अपनी गोद में रख दिया।
मैंने कहा, "टिंकू, मैंने मशीन सिर्फ़ इसलिए ठीक नहीं की कि लक्ष्मी दीदी खुश हों, या तेरा रास्ता साफ़ हो। मैंने मशीन इसलिए ठीक की क्योंकि मैं तुझे अपने पास रखना चाहता था।"
कमरे में चुप्पी हो गई।
बल्ब गुनगुनाता रहा।
मैंने कहा, "मैं डरता हूँ, टिंकू।"
"किससे?"
"इससे कि जो लोग पढ़कर आगे बढ़ते हैं, वो एक दिन लौटते नहीं।"
मैंने कहा और मुझे खुद अपनी आवाज़ में वो चीज़ सुनाई जो मैंने किसी को नहीं बताई थी। कई साल से नहीं बताई थी।
मैंने कहा, "मैं इस गली में पैदा हुआ। यहीं पढ़ा। यहीं रहा। मेरे स्कूल के बच्चे बड़े हुए, शहर गए, नौकरी की, फ़ोन किया, फिर फ़ोन बंद हो गया। फिर एक दिन वो गली में आए, कार से उतरे, और मुझसे ऐसे बात की जैसे मैं उनका कोई पुराना नौकर हूँ। मैंने उन्हें बुरा नहीं कहा। वो बुरे नहीं थे। बस वो मुझे भूल चुके थे। और भूलना ग़लत भी नहीं था। वो बड़े हो गए थे। मैं वहीं रह गया था।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"मुझे यह डर नहीं है कि तू मुझे भूल जाएगा। मुझे यह डर है कि तू बड़ा हो जाएगा और मैं तेरे लिए उस गली की याद बन जाऊँगा, जहाँ से तू निकलकर आया था। ऐसी याद, जो अच्छी लगती है पर जिसे याद करने की ज़रूरत नहीं रहती।"
टिंकू नीचे देखने लगा।
लक्ष्मी दीदी ने उसकी तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
मैंने कहा, "और जब रमा मैडम फ़ॉर्म लेकर आईं, तो मेरे अंदर एक चीज़ बोली कि अगर ये फ़ॉर्म भर दिया, तो तेरा जाना तय हो जाएगा। और मैं उस फ़ैसले को अपने हाथ में रखना चाहता था। इसलिए मैंने फ़ॉर्म छिपा दिया। करने के लिए नहीं, टालने के लिए। ताकि कुछ दिन और निकल जाएँ, जैसे अभी हैं।"
मैंने साँस ली।
"यह चालाकी नहीं थी, टिंकू। यह मेरी कमज़ोरी थी। और मैंने उसे तेरे ऊपर लाद दिया।"
टिंकू ने अब भी ऊपर नहीं देखा। उसने धीरे से कहा, "तू डरता है कि मैं लौटकर नहीं आऊँगा।"
"हाँ।"
"पर उस्ताद, तूने मुझसे पूछा भी नहीं कि मैं क्या चाहता हूँ। तूने मान लिया कि जाना मेरे लिए बढ़िया है, और तूने मान लिया कि रुकना मेरे लिए घाटा है। तूने मेरे पास रहने को मेरी बेईज़्ज़ती समझ लिया।"
मैं कुछ नहीं बोला।
क्योंकि यह सच था।
लक्ष्मी दीदी ने गोद से कपड़ा उठाया। उन्होंने उसे दोनों हाथों से पकड़ा। फिर उन्होंने अपने आँचल से आँखें पोंछीं। धीरे से। जैसे कोई बूढ़ी औरत पोती के सामने रोने से बचती हो।
उन्होंने कहा, "बेटा, सुन।"
टिंकू ने सिर उठाया।
लक्ष्मी दीदी ने कहा, "मुझे तेरे सवाल पर शर्म नहीं आ रही। मुझे अपने डर पर शर्म आ रही है।"
टिंकू ने कहा, "माँ…"
"नहीं, सुन।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर उसकी तरफ़। "तेरे पापा गए, छह महीने हो गए। उसके बाद मैंने तुझसे एक बात नहीं पूछी। मैंने नहीं पूछा कि तू स्कूल जाना चाहता है या नहीं। मैंने नहीं पूछा कि तू मिस्त्री क्यों बनना चाहता है। मैंने नहीं पूछा कि रात को तू क्या सोचता है। मैंने बस मान लिया कि जो मैं कर रही हूँ, वो तेरे लिए सही है।"
उनकी आवाज़ दब गई।
"और जब ये फ़ॉर्म आया, तो मैं तुझसे यह भी नहीं पूछ पाई कि तू जाना चाहता है या नहीं। क्योंकि मुझे डर था। डर था कि कहीं तू हाँ न कह दे।"
टिंकू ने उन्हें देखा।
"पर माँ, तूने तो मुझे राँची भेजने की बात कही थी।"
"कही थी। और उस वक़्त मैंने सोचा था कि यह तेरे लिए सही है। पर सच यह है कि मैं यह कहकर अपने डर को साफ़-सुथरा बना रही थी। मैं वो डर छिपा रही थी जो मेरे अंदर बैठा था। जब भी अंकुश तुझे दुकान पर रखता, मुझे लगता कि तू उसका शागिर्द बनकर यहीं रह जाएगा और मेरी तरह हर शाम दरवाज़ा देखेगा। मैं तुझे अपने डर से बाँध रही थी, बेटा।"
उन्होंने कपड़े को मोड़ा।
"मुझे तेरे सवाल पर शर्म नहीं आती। मुझे अपने उस अंधे डर पर शर्म आती है, जिसने मुझे तेरी राय पूछने लायक भी नहीं रखा।"
वो चुप हो गईं। कमरे में सिर्फ़ बल्ब की आवाज़ रही।
टिंकू कुछ देर तक बैठा रहा। फिर उसने धीरे से कहा, "माँ, मैं राँची नहीं जाना चाहता। यह मैंने उस दिन भी कहा था, और आज भी कहता हूँ। पर मैं पढ़ना नहीं छोड़ना चाहता। मुझे लगता है कि दोनों चीज़ें साथ हो सकती हैं।"
लक्ष्मी दीदी ने उसका सिर पकड़ लिया। उन्होंने उसे सीने से लगा लिया। और इस बार वो रोईं। इस बार छिपाकर नहीं। ऐसे रोईं जैसे किसी ने छह महीने का बोझ उनके कंधों से उतार दिया हो।
मैं वहीं खड़ा रहा। मैंने उन दोनों की तरफ़ नहीं देखा। मैंने दीवार की तरफ़ देखा, जहाँ पुरानी अलमारी थी। मेरा अपना गला भरा हुआ था, और मैं उसे नीचे नहीं उतारना चाहता था।
फिर मैंने कहा, "एक और बात है।"
दोनों अलग हुए।
मैंने कहा, "यह उससे भी ज़्यादा बेतुकी लगेगी।"
लक्ष्मी दीदी ने कहा, "बोल बेटा।"
मैंने कहा, "मेरी नई कॉपी में, मेरी लिखाई के नीचे, पेंसिल से एक शब्द लिखा मिला। भाई।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"वो लिखाई मेरी नहीं है, टिंकू की नहीं है, माँ की नहीं है, पापा की नहीं है। मुझे नहीं पता वो किसने लिखा।"
लक्ष्मी दीदी ने कहा, "किसी ने मज़ाक में…"
"नहीं। मज़ाक की लिखाई नहीं थी। वो बहुत छोटे अक्षरों में, बहुत सँभालकर लिखी गई थी।"
टिंकू ने कहा, "तो तूने किसी को बताया क्यों नहीं?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"क्योंकि मुझे डर था कि घर वाले मुझे पागल समझेंगे।"
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