The Mysterious Bell – Chapter 1119
मुझे नहीं पता वो उस वक़्त क्या सोच रहा था। पर बाद में उसके चेहरे से समझ आया कि उसने एक कहानी बना ली थी। अपनी कहानी। जिसमें उस्ताद उसे चुपचाप शहर के छात्रावास भेजना चाहता था, ताकि कहना न पड़े कि दुकान पर बोझ बढ़ रहा है। जिसमें उस्ताद उसके लिए सोच रहा था, पर उससे बात नहीं कर रहा था। जिसमें टिंकू को पता भी नहीं चलता और वो चला जाता।
उसने फ़ॉर्म को वापस मैले कपड़े में लपेटा, बक्से में रखा और बक्सा बंद कर दिया। फिर वो दुकान के बाहर आया और पत्थर की पटिया पर बैठ गया। चार जासूस दूर से उसे देख रहे थे। उन्हें लगा कि वो उस्ताद के तोहफ़े का इंतज़ार कर रहा है। उन्हें क्या पता कि वो अपने ही दिल में एक तोहफ़ा तोड़ रहा है।
मैं अस्पताल से लौटा तो शाम हो रही थी। दुकान पर टिंकू चुप बैठा था। उसने मेरी तरफ़ देखा और फिर ज़मीन की तरफ़।
मैंने कहा, “क्या हुआ? दुकान ठीक चली?”
“हाँ।”
“कोई ग्राहक आया?”
“ना।”
“चाय पी?”
“हाँ।”
“माँ की दवा रखी?”
“हाँ।”
मैंने उसके पास जाकर बैठना चाहा। वो थोड़ा खिसक गया।
“टिंकू, तबीयत ठीक है?”
“हाँ।”
“भूख लगी है?”
“ना।”
“अरे, तू तो आज कल के बच्चों में सबसे ज़्यादा खाता है। बता क्या बात है।”
“कुछ नहीं।”
मैंने शबनम आपा की तरफ़ देखा। वो गुमटी पर खड़ी थीं और चिमटी से समोसे निकाल रही थीं। उन्होंने कंधे उठाए। मतलब उन्हें भी नहीं पता।
मैंने उस्ताद अली बक्श की तरफ़ देखा। वो अपनी मशीन पर झुके थे। उन्होंने भी सिर हिलाया — कुछ नहीं पता।
तो फिर मैंने खुद ही मामला सुलझाने की सोची। मैंने मज़ाक किया, “देख टिंकू, आज मैंने सुना है कि गली में कोई जासूस घूम रहा है। चार जासूस। तूने देखे?”
उसने कहा, “हाँ।”
“क्या देखा?”
“कुछ नहीं।”
“अरे, कुछ तो बोल। तू ऐसे चुप है जैसे तेरे अंदर बैटरी खत्म हो गई हो।”
“ना।”
मैं थोड़ा झुंझला गया। पर गुस्सा नहीं किया। क्योंकि उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मुझे डरा रही थी। दुख नहीं। शिकायत। एक छोटी सी शिकायत, जो बड़े होने की तरफ़ बढ़ रही थी।
रात हो गई। गुमटी की रोशनी जल रही थी। पीपल के नीचे बुज़ुर्ग अपनी-अपनी बातों में लगे थे। मैं दुकान के बाहर बैठा था और टिंकू अंदर कोने में। उसने अपने घुटनों को सीने से लगा रखा था।
मैंने कहा, “टिंकू, अब सच बता।”
“क्या?”
“तू आज दिन भर अजीब है।”
“ना।”
“देख, मैं तेरा उस्ताद हूँ। मुझे पता चलता है।”
तभी उसने अपना सिर उठाया। उसकी आँखें लाल थीं। वो उठा। पीछे वाले कमरे में गया। औज़ारों का बक्सा खोला। फ़ॉर्म निकाला। और मेरे सामने मेज़ पर रख दिया।
“उस्ताद, यह क्या है?”
मैंने देखा। मेरा गला सूख गया।
“यह… यह तो…”
“यह वही है जो तूने बक्से में छिपाया था।”
“टिंकू…”
“उस्ताद, तूने नाम लिखने से पहले मुझसे एक बार पूछा भी नहीं।”
मेरे हाथ में पेंच था। मैं उसे पकड़े हुए था — शायद किसी साइकिल की सीट कसने के लिए। और जब उसने यह कहा, तो पेंच मेरे हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिर गया।
धड़ाम।
वो आवाज़ गली में गई। और मैं वहीं रह गया, हाथ हवा में, जैसे किसी ने मेरी सारी समझ को एक झटके में उतार दिया हो।
टिंकू ने फ़ॉर्म की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
“मैं तो बस तुझसे यह जानना चाहता था कि उस्ताद, तूने यह क्यों छिपाया? मैंने कहा था ना, जो सीट किसी को चाहिए, उसे दो। फिर तूने मेरा नाम क्यों सोचा? मुझे क्यों छुपाकर भेजना चाहता है? मैं बोझ हूँ क्या?”
मैं कुछ नहीं बोल पाया।
और उस वक़्त मेरी जेब में घंटी बजी। धीरे से। एक बार।
फिर बिल्कुल चुप हो गई।
मैंने जेब से मोबाइल निकाला। स्कूल का नंबर था। मिस्ड कॉल। मैंने उसे देखा और वापस जेब में रख दिया।
टिंकू ने देखा। उसने कुछ नहीं कहा। बस देखा।
मैंने कहा, “कुछ नहीं। स्कूल का फ़ोन था।”
“तूने उठाया क्यों नहीं?”
“अभी नहीं।”
“क्यों? क्योंकि मैं सुन रहा हूँ?”
मैं चुप हो गया।
टिंकू उठा। उसने फ़ॉर्म उठाया। उसकी तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़।
“उस्ताद, तूने मुझे बताया भी नहीं। तूने बस फ़ॉर्म भर दिया। नाम की जगह खाली छोड़ दी। ताकि बाद में मैं खुद लिख दूँ? या ताकि तू बाद में सोच सके कि किसका नाम लिखे?”
“टिंकू, मैं…”
“मैं जानता हूँ तू क्या कहेगा। कि मैं तेरा भला चाहता हूँ। कि शहर में अच्छी पढ़ाई होगी। कि यहाँ दुकान पर बोझ बढ़ रहा है।”
“नहीं, ऐसी बात नहीं है।”
“तो क्या है? तूने मुझसे पूछा क्यों नहीं? मैं तेरा बेटा नहीं हूँ, पर मैं तेरे साथ हूँ। तूने मुझे अपना शागिर्द बनाया। फिर मुझे छुपाकर भेजने की क्या ज़रूरत थी?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में आँसू थे। पर वो रो नहीं रहा था। वो गुस्से में था। और गुस्सा उसके लिए नया था।
मैंने धीरे से कहा, “टिंकू, मैंने सोचा कि तू पढ़ लिखकर बड़ा आदमी बनेगा। मैं तो बस एक मिस्त्री हूँ। मैं चाहता हूँ कि तू मेरी तरह ज़िंदगी भर पेंच कसता न रहे।”
“तो तूने मुझसे पूछा क्यों नहीं? तूने मेरी राय क्यों नहीं ली? मैं तेरा शागिर्द हूँ, तेरा नौकर नहीं।”
मैं कुछ नहीं बोल पाया।
तभी मेरी जेब में फिर घंटी बजी। इस बार लंबी। मैंने निकाला। स्कूल का नंबर। मैंने काट दिया।
टिंकू ने कहा, “उठा ले। तू तो यही चाहता है ना? मुझे भेजना।”
“नहीं, टिंकू।”
“तो फिर बता, तूने नाम क्यों नहीं लिखा? तूने फ़ॉर्म क्यों छिपाया? अगर तू मुझे भेजना चाहता था, तो सामने रखकर बात करता। तूने क्यों छिपाया?”
मैंने कहा, “क्योंकि मुझे डर था।”
“डर? किस बात का?”
“डर था कि तू मना कर देगा। और मैं तुझे मना नहीं कर पाता।”
टिंकू हँसा। ज़हर वाली हँसी।
“तो तूने चालाकी की। मुझे बिना बताए सब तय कर लिया। उस्ताद, तूने नाम लिखने से पहले मुझसे एक बार पूछा भी नहीं।”
मेरे हाथ में पेंच था। मैं उसे पकड़े हुए था। शायद मैंने उसे फिर से उठा लिया था। और जब उसने यह कहा, तो पेंच मेरे हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिर गया।
धड़ाम।
वो आवाज़ गली में गई। और मैं वहीं रह गया, हाथ हवा में, जैसे किसी ने मेरी सारी समझ को एक झटके में उतार दिया हो।
टिंकू ने फ़ॉर्म की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
“अब बता, उस्ताद। अब क्या?”
मैं कुछ नहीं बोल पाया। बस उसकी आँखों में देखता रहा। और मेरी जेब में फिर घंटी बजी। इस बार मैंने निकाला भी नहीं।
॥
मैं वहीं खड़ा रहा। हाथ हवा में, जैसे कोई चीज़ पकड़ने की कोशिश कर रहा हो जो पहले ही गिर चुकी है।
पेंच ज़मीन पर पड़ा था। छोटा सा, ग्रीस लगा, किसी साइकिल का आम पुर्ज़ा। पर उस वक़्त वो पुर्ज़ा नहीं लग रहा था। उस वक़्त वो मेरी पूरी बनाई हुई चालाकी जैसा लग रहा था, जो गिरकर आवाज़ कर चुकी थी।
टिंकू मेरे सामने खड़ा था। फ़ॉर्म हाथ में। नाम की जगह खाली।
लक्ष्मी दीदी दरवाज़े के पास खड़ी थीं। उनके हाथ में कपड़ा था, आधा सिला हुआ, और वो कपड़ा उनकी उँगलियों में ऐसे दबा था जैसे किसी का हाथ पकड़ रही हों।
गुमटी के बाहर से आवाज़ें आ रही थीं। कोई बर्तन रख रहा था। कोई लकड़ी का स्टूल खींच रहा था। गली अपनी रोज़ की आवाज़ों में चल रही थी, और मेरी दुकान के भीतर वक़्त रुक सा गया था।
मैंने धीरे से हाथ नीचे किया।
मैंने झुककर वो पेंच उठाया। उसे अपनी हथेली पर रखा। ग्रीस मेरी उँगलियों पर फैल गई।
फिर मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
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