The Mysterious Bell1118 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1118

7 min read November 5, 2026

“मैं तो पैदा ही अजीब हूँ, भाई। तूने अब तक पहचाना नहीं?”

वो नहीं हँसा। बस मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर बोला, “चीनी डाली है?”

मैंने चाय पी और मुँह बनाया। “नहीं डाली।”

“तूने दो बार चाय बनाई और दोनों बार चीनी भूल गया।”

“तो तू डाल दे ना। तू मेरा शागिर्द है, उस्ताद का ख्याल रखना तेरा काम है।”

वो गया चीनी लाने। मैंने पीछे वाले कमरे में जाकर औज़ारों का बक्सा खोला। उसमें पुराने पेंच, रिंच, चिमटी, रेती, कुछ टूटे बॉल बियरिंग और धूल भरी एक पुरानी कापी पड़ी थी। मैंने सबसे नीचे वो फ़ॉर्म रख दिया, ऊपर से मैला कपड़ा डाला और बक्सा बंद कर दिया।

फिर मैंने खुद से कहा, “अभी सोचने का वक़्त नहीं है। पहले वो काग़ज़, वो लकड़ी के जूते, वो चौथा दरवाज़ा, माँ की दवा, अस्पताल की सीढ़ी, कल सुबह सात बजे की मशीन। बहुत है। फ़ॉर्म बाद में।”

पर अंदर से कोई आवाज़ आई, “बाद में मतलब कब?”

मैंने बक्सा फिर खोला। फिर बंद किया।

टिंकू दरवाज़े पर आकर खड़ा हो गया। उसने बक्से को खुलते और बंद होते देखा। उसके चेहरे पर वो पढ़ने वाली नज़र आ गई थी जो उसे मुझसे ज़्यादा समझदार बना देती है।

“उस्ताद, उस बक्से में क्या है?”

“औज़ार।”

“औज़ार तो दिन में दस बार खोलता है, पर इतनी जल्दी नहीं।”

“आज मुझे औज़ारों से बात करनी है।”

“तू औज़ारों से बात करता है?”

“हाँ। कभी-कभी रिंच मुझसे ज़्यादा समझदार निकलती है।”

वो मुस्कुराया, पर आधा। आधी हँसी वो वाली होती है जो होंठों तक आकर रुक जाती है, जैसे किसी ने पीछे से पकड़ लिया हो।

मैंने कहा, “क्या हुआ? तेरी चाय ठंडी हो रही है।”

“कुछ नहीं।”

“तो ठीक है।”

और वो चला गया। पर जाते-जाते उसने एक बार पीछे मुड़कर बक्से को देखा। मुझे लगा जैसे बक्सा अब मेरा नहीं, हम दोनों का राज़ बन गया है। और यह बात मुझे अंदर से खटक गई।

उधर गली में चार जासूस सक्रिय हो चुके थे।

सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू। पीपल के नीचे पत्थर की चबूतरी पर बैठे। सानिया की लाल कवर वाली कॉपी खुली थी, गुड्डू के हाथ में टाट का एक टुकड़ा था, रफ़ीक़ अपना टूटा चश्मा बार-बार आँख पर लगा रहा था और चिंटू अपनी चप्पल से ज़मीन पर कोई नक्शा बना रहा था।

सानिया ने कहा, “मुझे पक्का पता है, उस्ताद कुछ छिपा रहा है।”

गुड्डू ने कहा, “क्या छिपा रहा है?”

“कोई तोहफ़ा।”

चिंटू ने चप्पल हवा में उठाई। “किसके लिए तोहफ़ा?”

“अरे बेवकूफ़, टिंकू के लिए। आज सुबह से उस्ताद बार-बार बक्सा खोल रहा है और बंद कर रहा है।”

रफ़ीक़ ने चश्मा ठीक किया। “बक्सा तो वो रोज़ खोलता है।”

“पर रोज़ इतनी जल्दी नहीं। और आज उसने दो बार चाय में चीनी भूली।”

गुड्डू ने गंभीरता से सिर हिलाया। “यह तो बड़ा सुराग है।”

चिंटू ने कहा, “मेरी अम्मी कहती हैं, जब बड़े लोग चीनी भूलने लगें तो समझो उनके दिमाग़ में कोई बड़ी बात घूम रही है।”

सानिया ने कॉपी में लिखा — उस्ताद सुबह से अजीब। बक्सा दो बार खुला। चाय में चीनी नहीं। हँसी आधी। ये सब मिलाकर कुछ है।

इसके बाद चारों ने तय किया कि दुकान के पीछे चुपके से जाकर देखना है। वे पीपल की चबूतरी से उतरे, नाली के पुराने पुल को पार किया और दुकान के पीछे वाली गली में घुसे। चिंटू ने अपनी चप्पल हाथ में उठा ली, ताकि आवाज़ न हो। रफ़ीक़ ने गुड्डू को धक्का दिया, गुड्डू ने सानिया को, और सानिया ने आख़िर में चिंटू को। चारों एक-दूसरे के पीछे ऐसे चल रहे थे जैसे कोई स्कूल की कवायद कर रहा हो।

दुकान के पीछे वाले कमरे की खिड़की खुली थी। अंदर से औज़ार गिरने की आवाज़ आई। फिर मेरी आवाज़ आई, “अरे, ये पेंच कहाँ गया?”

सानिया ने धीरे से कहा, “देखा? पेंच ढूँढ रहा है।”

चिंटू ने कहा, “तोहफ़े में पेंच?”

“चुप कर।”

तभी पीछे से आवाज़ आई, “तुम चारों यहाँ क्या कर रहे हो?”

चारों ने पलटकर देखा। शबनम आपा खड़ी थीं। हाथ में लोहे की चिमटी, आँखों में वो भाव जो किसी भी जासूसी मिशन को पहली ही सुबह खत्म कर सकता है।

“कुछ नहीं आपा।”

“कुछ नहीं? यहाँ दुकान के पीछे कुछ नहीं करने आते हो? भागो यहाँ से, वरना ये चिमटी आज तुम्हारे कानों को नई जगह दिखाएगी।”

चारों भागे। चिंटू की चप्पल हाथ से छूटी, उसे उठाने के चक्कर में रफ़ीक़ गिरा, गुड्डू उस पर गिरा और सानिया ने दोनों को खींचकर उठाया। शबनम आपा ने चिमटी हवा में घुमाई और वे चारों पीपल की चबूतरी तक भागे।

वहाँ पहुँचकर वे हाँफते रहे। फिर सानिया ने कॉपी खोली और कहा, “अब और गंभीरता से सोचना होगा।”

चिंटू ने अपनी चप्पल पहनते हुए कहा, “मुझे लगता है, यह तोहफ़ा नहीं, कोई गुप्त मिशन है।”

रफ़ीक़ ने कहा, “मिशन?”

“हाँ। उस्ताद कल से कुछ खोज रहा है। कल रात भी देर तक जागा था। और आज सुबह उसने पीपल के नीचे काग़ज़ उठाया। मैंने अपनी आँखों से देखा।”

गुड्डू ने कहा, “तो इसका मतलब वो काग़ज़ उसने नहीं छिपाया, कोई और दे गया।”

सानिया ने कहा, “अब बात समझ में आई। उस्ताद को कोई चिट्ठी मिली है। और वो हमसे छिपा रहा है।”

चिंटू ने कहा, “पर क्यों?”

सानिया ने कहा, “क्योंकि वो बड़ा है। बड़े लोग हर बात नहीं बताते।”

रफ़ीक़ ने चश्मा पोंछा। “मेरी अम्मी कहती हैं, बड़े लोग जब ज़्यादा चुप हो जाएँ तो घर में कुछ पक रहा होता है।”

चारों ने एक साथ सिर हिलाया। फिर सानिया ने अपनी लाल कॉपी में एक नया पन्ना खोला और सबसे बड़ा सुराग लिखा — उस्ताद ने आज दो बार चाय में चीनी डालना भूल गया।

गुड्डू ने कहा, “यह सुराग क्यों?”

सानिया ने कहा, “क्योंकि उस्ताद चीनी कभी नहीं भूलता। वो चाय में चीनी दो चम्मच डालता है। आज उसने दोनों बार चीनी भूली। इसका मतलब उसका दिमाग़ कहीं और है।”

चिंटू ने गंभीरता से कहा, “तो हमें उसका दिमाग़ ढूँढना होगा।”

रफ़ीक़ ने कहा, “दिमाग़ नहीं, बक्सा।”

सानिया ने कहा, “बक्सा और दिमाग़, दोनों।”

उधर दुकान में मैं सच में पेंच ढूँढ रहा था। एक पेंच मेज़ के नीचे गिरा था और मैं घुटनों के बल बैठा था। टिंकू ने आकर पेंच उठाया और मेरी हथेली पर रख दिया।

“उस्ताद, तू आज बहुत चीज़ें ढूँढ रहा है।”

“हाँ।”

“क्या ढूँढ रहा है?”

“पेंच।”

“पेंच तो मिल गया।”

“तो अब दूसरा ढूँढूँगा।”

वो मुस्कुराया, पर फिर वही आधी हँसी। मैंने उसकी तरफ़ नहीं देखा। मैं डर रहा था कि अगर देखा तो वो मेरी आँखों में फ़ॉर्म पढ़ लेगा।

दोपहर में मुझे अस्पताल जाना था। माँ की नई दवा की खुराक देखनी थी और डॉक्टर इसरानी से कुछ बात करनी थी। मैंने टिंकू से कहा, “तू दुकान पर रह। मैं अस्पताल जाकर आता हूँ। किसी को कुछ न देना, किसी को कुछ बेचना नहीं। और हाँ, चाय में चीनी डालना।”

उसने कहा, “हाँ।”

मैं गया। मेरे जाने के बाद टिंकू ने दुकान का शटर आधा गिराया। फिर वो पीछे वाले कमरे में आया। औज़ारों का बक्सा खोला।

उसने पहले बहाना बनाया। खुद से बोला, “मुझे रिंच चाहिए।” फिर रिंच निकाली। फिर रख दी। फिर उसने बक्से में हाथ डाला। सबसे नीचे मैला कपड़ा था। उसने वो हटाया और उसके हाथ में वो फ़ॉर्म आ गया।

काग़ज़ सफ़ेद था। ऊपर बड़े अक्षरों में लिखा था — आवासीय विद्यालय। नीचे कुछ लाइनें थीं, जिनमें नाम की जगह खाली थी। कहीं कोई नाम नहीं लिखा था।

टिंकू ने उसे देखा। उसके हाथ धीरे-धीरे ठंडे हो गए। उसने फ़ॉर्म को दोनों हाथों से पकड़ा, जैसे कोई बहुत कीमती चीज़ हो और डर हो कि गिर न जाए। फिर उसने उस पर अपनी उँगली रखी — नाम की खाली जगह पर।

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