The Mysterious Bell – Chapter 1116
"ये मेरा पुराना कुर्ता है," उस्ताद ने कहा। "सत्तर साल पुराना नहीं, पचास साल पुराना नहीं। असली पुराना। जिस दिन मैंने पहली बार सिलाई मशीन खरीदी थी, उस दिन पहना था। उस दिन से इसे सीना चाह रहा हूँ। पर हर बार हाथ रुक जाता है, क्योंकि ये मेरा है, और अपने काम के लिए वक़्त कहाँ है?"
लक्ष्मी दीदी कुछ देर उनकी तरफ़ देखती रहीं।
फिर उनकी आँखें भर आईं।
और मैंने देखा — पहली बार — कि वो रो रही थीं, पर रोने की वजह उस्ताद का कुर्ता नहीं था। वजह यह थी कि महीनों बाद, छह महीने बाद, किसी ने उनके हाथ से कुछ माँगा था। किसी को उनकी ज़रूरत थी। उनके हाथ को काम मिला था।
उन्होंने दोनों हाथों से कुर्ता लिया, सीने से लगाया, और कहा, "उस्ताद, आज पहली बार कोई मुझसे ये नहीं कह रहा कि बेचारी, तुम्हारे साथ हो गया। कोई कह रहा है — ये सीना है।"
उस्ताद ने कहा, "ख्याल से। पचास साल पुराना है।"
लक्ष्मी दीदी हँसी। "उस्ताद, पचास साल पुराना कपड़ा टूटता नहीं। वो तो सिर्फ़ हम लोगों की तरह पुराना होता है। सिल लगी तो और मज़बूत हो जाता है।"
उस्ताद ने उनकी तरफ़ देखा और कुछ नहीं बोले। बस एक बार सिर हिलाया। पर उस सिर हिलाने में वो सब था जो आज तक नहीं कहा गया था।
फिर वो मेरी तरफ़ मुड़े और कहा, "अंकुश, दुकान तू देख। मैं यहीं रुकता हूँ।"
मैंने कहा, "उस्ताद, आपकी दुकान…"
"मेरी दुकान में आज कोई आने वाला नहीं है। सब यहाँ आए हैं। दुकान वहीं है जहाँ काम है।"
वो चले गए गुमटी के पीछे वाले कमरे में, लक्ष्मी दीदी के सामने एक और स्टूल रखकर बैठ गए, और अपना कुर्ता लक्ष्मी दीदी के हाथ में छोड़कर चुपचाप देखने लगे।
मैं दुकान की तरफ़ चला।
दिन दोपहर तक ऐसे ही बीता।
मैंने उस दिन चार साइकिलें ठीक कीं। एक बच्चे की साइकिल का पंचर, एक बूढ़े की रॉड, एक सफ़ाई कर्मचारी की चेन, और एक बीमार आदमी की साइकिल, जिसे उसकी औरत रोज़ अस्पताल ले जाती है — उसका ब्रेक।
पर जिस काम ने मेरा दिन बदल दिया, वो कोई साइकिल नहीं थी।
दोपहर के करीब एक बजे, मैंने दुकान के पीछे वाले कमरे में जाकर कॉपी खोली।
मेरे हाथ में कॉपी थी और सामने ट्रंक पर घंटी रखी थी। मैंने देखा — आज के जोड़ की एंट्री के आगे जो अंक लिखा होना चाहिए था, वो नहीं लिखा था। उसकी जगह एक आधी लकीर बनी थी। घंटी वही कर रही थी जो उसने कल किया था — मेरे हिसाब से आधा खींच ले रही थी।
मैंने घंटी को उठाया। उस पर एक नई पतली लकीर उभर आई थी।
मैंने धीरे से कहा, "फिर?"
घंटी बोली, "अच्छा जोड़, लक्ष्मी। बड़ा जोड़। चालीस। आधा बीस — जो तेरा है। आधा बीस — उसका।"
"उसका मतलब?"
"जो बक्से में बैठा है। जो हिसाब अपने आप बोलेगा।"
मैंने कॉपी को ट्रंक पर रखा और उस लकीर को देखा।
उस लकीर के पार, दूसरी तरफ़, किसी और के हिसाब में, आज मेरे लक्ष्मी दीदी के काम का आधा दर्ज हो रहा था। और मैं जानता था कि मेरा काम टूटे कपड़े सीना नहीं है — मेरे जोड़ की गर्मी उस दूसरे हाथ में गिरती है और उन्हें मज़बूत करती है।
मैंने घंटी से कहा, "तो मैं क्या करूँ? बंद कर दूँ जोड़ना?"
घंटी बोली, "तू बंद नहीं कर सकता। बंद ही होगा तो वो बढ़ेगा। जो जोड़ता है, वो उसे हराता है। जो डरकर रुक जाता है, वो उसे खाता है।"
"तो फिर उपाय?"
"जो जोड़ो, उसे इतना मज़बूत करो कि उसका हिस्सा उसके पास न पहुँचे। दो घरों की मरम्मत एक साथ करो, तो आधा कहीं नहीं जाएगा। तीन करो, तो कुछ भी नहीं जाएगा।"
मैं शब्दों में उलझ गया।
मैंने बाहर झाँका। गुमटी के आँगन में औरतें अब भी बैठी थीं। गुड्डू अपनी सिली हुई निकर पहनकर घमंड से दौड़ रहा था, और चिंटू अपने पापा के कुर्ते की नई जेब टटोल रहा था जिसे अब कोई नहीं देख सकता था। शबनम आपा दुपट्टा लेकर गई थीं, चलते वक़्त उन्होंने सिर पर इस तरह बाँधा था जैसे वो उनका नया हो, पहली बार पहना हो।
और उस्ताद के हाथ में कुर्ता था — लक्ष्मी दीदी ने उन्हें सिलाकर दे दिया था। उन्होंने उसे पहना था और अब वो अपनी दुकान की तरफ़ नहीं जा रहे थे, वो गुमटी की चबूतरी पर बैठे चाय पी रहे थे, पचास साल पुराने कुर्ते में, ऐसे जैसे कोई रिटायर फ़ौजी अपनी वर्दी पहने बैठा हो।
ये देखकर मेरा दिल एक पल के लिए भर गया।
पर घंटी बोली — "तू अभी भी सोच रहा है। एक बात याद रख — तेरा असली काम कपड़ा सीना नहीं है। तेरा असली काम रिश्ते सीना है। आज चार आए, कल दस आएँगे। हर कपड़े के पीछे एक टूटा रिश्ता है। जब तक वो नहीं सिलेगा, वो कपड़ा फिर फटेगा।"
मैंने घंटी को जेब में रखा और बाहर आ गया।
शाम के चार बजे, स्कूल की रमा मैडम दुकान पर आईं।
मैंने उन्हें पहले कभी इस तरह नहीं देखा था। घर से बाहर, बाहर की औरत की तरह। सिर पर हल्का दुपट्टा, हाथ में लाल किनारे वाली साड़ी, कंधे पर फटा हुआ बैग, और उस बैग में से एक काग़ज़।
वो सीधे मेरी दुकान पर आईं, मेरी मेज़ के सामने खड़ी हुईं और काग़ज़ मेज़ पर रख दिया।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "तुमने मेरे बारे में सब सुना है। जो मीरा ने किया था।"
मैंने सिर हिलाया।
"उसी वजह से," उन्होंने कहा, "अब मैं एक और बच्चे को नहीं छोड़ूँगी।"
उन्होंने काग़ज़ की तरफ़ इशारा किया।
"ये एक आवासीय विद्यालय का फ़ॉर्म है। शहर से बाहर। वहाँ पढ़ाई है, रहना है, खाना है — सब। टीचर रहते हैं। बच्चों को वहीं रखते हैं। जो बच्चा स्कूल बीच में छोड़ चुका हो, उसके लिए एक विशेष सीट है। सिर्फ़ एक।"
मेरी आँखें काग़ज़ पर जम गईं।
"आप किसके लिए लाई हैं?"
रमा मैडम ने मेरी तरफ़ सीधा देखा।
"तुम जिसका नाम लिखोगे, उसके लिए। मैंने सोचा था कि मैं खुद बता दूँगी कि किसका नाम लिखना है। पर मीरा ने मुझे रोका। उसने कहा, अंकुश से पूछिए। वो फ़ैसला उसका है।"
मैं कुछ देर चुप रहा।
फिर मैंने पूछा, "परसों सुबह नाम जमा करना है?"
"हाँ। परसों सुबह नौ बजे तक। उसके बाद कोई नहीं।"
मैंने काग़ज़ उठाया।
फ़ॉर्म दो पन्नों का था। पहले पन्ने पर बच्चे का नाम, पता, माँ-बाप का नाम, फ़ोन। दूसरे पन्ने पर एक खाली जगह — "क्यों?" — और नीचे तीन लाइनें।
और वो नाम वाली जगह — वो खाली थी। बिल्कुल खाली। साफ़ शब्दों में लिखा था — "छात्र का पूरा नाम"।
मैंने अपना पेन निकाला।
पेन की नोक उस खाली जगह के ऊपर पहुँची।
और मेरी उँगलियाँ रुक गईं।
क्योंकि उस पल मेरे दिमाग़ में एक ही बात गूँज रही थी — इस जगह पर नाम लिखते ही, बच्चा चला जाएगा। शहर छोड़कर। छात्रावास में। दुकान से दूर। उस्ताद से दूर। गली से दूर। मशीन से दूर। माँ से दूर।
और मैं खुद उसे यहाँ से भेजने वाला आदमी बन जाऊँगा — वो आदमी जिसकी वजह से वो दूर जाएगा।
मैंने पेन नीचे रख दिया।
रमा मैडम ने कुछ नहीं कहा। वो सिर्फ़ खड़ी रहीं।
फिर उन्होंने धीरे से कहा, "अंकुश, मैंने एक बच्चे को ऐसे ही खो दिया था। जब मैं दूसरे शहर में नौकरी करने आई, तो अपनी बेटी को यहीं छोड़ गई थी, पति के पास। मैंने सोचा, वो ठीक रहेगी। वो ठीक रही। पर मैं ठीक नहीं रही। पाँच साल बाद जब मैं लौटी, तो वो मेरी बेटी नहीं थी। वो एक ऐसी बच्ची थी जो मुझसे अपनी माँ की तरह मिलती थी, पर माँ नहीं कहती थी।"
फिर वो कुछ देर चुप रहीं।
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