The Mysterious Bell1115 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1115

7 min read November 5, 2026

और मैं उसे निकाल ही रहा था कि टिंकू ने कहा, "उस्ताद, आज दुकान पर जो बूढ़ा अंकल आया था, वो आपका नाम लेकर रोने लगा।"

मैंने कहा, "कौन से अंकल?"

"वो जो अपनी औरत को अस्पताल ले जाता है। वो बाहर बैठा था और लक्ष्मी दीदी को सिलाई करते देखकर बोला — अब ये दुकान फिर ज़िंदा होगी, क्योंकि इसमें अब किसी औरत के हाथ की गंध आ गई है।"

मैं हँसा। "गंध से दुकान ज़िंदा होती है?"

टिंकू ने बहुत गंभीरता से कहा, "उस्ताद, दुकान ज़िंदा नहीं होती। दुकान के पीछे जो आदमी बैठा होता है, वो ज़िंदा होता है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

और उस वक़्त मेरे हाथ में फ़ॉर्म था, और मुझे समझ आया कि आज इस बच्चे ने मुझे एक लाइन ऐसी दी है जो किसी डिग्री से कम नहीं।

मैंने फ़ॉर्म खोला।

मैंने कहा, "टिंकू, एक बात पूछूँ?"

"पूछो।"

"अगर तुझे ऐसा स्कूल म"अगर तुझे ऐसा स्कूल मिल जाए जहाँ पढ़ाई के साथ रहने-खाने की भी सुविधा हो, जहाँ तुझे कोई मिस्त्री नहीं कहेगा, जहाँ तेरे जैसे पचास बच्चे होंगे — तो तू जाएगा?"

टिंकू ने चाय का कुल्हड़ अपने दोनों हाथों में पकड़ लिया। उसने एक घूँट लिया, फिर दूसरा, फिर कुल्हड़ को अपने घुटनों पर रख दिया।

और फिर वो बोला, "उस्ताद, ये सवाल वो लोग पूछते हैं जिनके पास जवाब पहले से होता है।"

मैं एक पल के लिए चुप हो गया।

"मैं नहीं पूछ रहा, टिंकू। मैं सच में पूछ रहा हूँ।"

"तो फिर सुनो—" उसने कुल्हड़ को दोनों हाथों से ज़मीन पर रखा, जैसे कोई बड़ा बर्तन हो, "—जाऊँगा तो माँ کے पास जा कर कहूँगा, उस्ताद ने भेजा है। और जिस दिन उस्ताद ने भेजा होगा, उस दिन उस्ताद को ये बताना पड़ेगा कि उसने क्यों भेजा। अभी तू खुद नहीं जानता क्यों भेज रहा है। तो मैं भी नहीं जानता क्यों जाना चाहिए।"

मेरे हाथ में फ़ॉर्म था और मुझे लगा जैसे उस काग़ज़ का वज़न अचानक बढ़ गया हो।

मैंने फ़ॉर्म मोड़कर जेब में रख दिया। मैंने कहा, "ठीक है, बात बाद में। अभी एक और काम है।"

"क्या?"

"तेरी चाय ठंडी हो रही है।"

वो हँसा। मैं भी हँसा। पर उसके हँसने में एक चीज़ थी जो मुझे अंदर तक चुभ गई — वो मुझ पर भरोसा कर रहा था कि मैं जवाब ढूँढ लूँगा। और मैं अभी उस जवाब से बहुत दूर था।

सुबह के नौ बजे थे।

गुमटी के पीछे वाले कमरे से मशीन की आवाज़ आ रही थी — टिक-टिक-टिक-टिक — एक लगातार, सधी हुई आवाज़, जैसे किसी बूढ़े आदमी की घड़ी, जो बरसों बंद पड़ी थी और आज फिर अपने आप चल पड़ी हो।

लक्ष्मी दीदी सिल रही थीं।

उनके सामने, लकड़ी की मेज़ पर, पहला पक्का काम रखा था — एक कमीज़, जिसका कालर मैंने खुद दिया था। वो कमीज़ उन्होंने अपने हाथ से उलटी की, कालर को मापा, धागा चुना, और जब सुई पहली बार कपड़े में धँसी, तो उन्होंने आँखें बंद कर लीं।

जैसे कोई दुआ पढ़ रहा हो।

बाहर, गुमटी के आँगन में, औरतें बैठी थीं। दस, बारह, पंद्रह। हर एक के हाथ में एक गठरी। हर गठरी में एक टूटा हुआ कपड़ा। और हर कपड़े के पीछे एक कहानी।

सबसे आगे, पीपल की चबूतरी के कोने पर, गुड्डू अपनी फटी निकर पकड़े खड़ा था, जिसका घुटना पत्थर पर फिसलने से ऐसा फटा था कि उसकी अम्मी ने कह दिया था — इसे पहनता है तो घर मत आना।

गुड्डू ने निकर लक्ष्मी दीदी की मेज़ पर रखी और कहा, "दीदी, इसमें से एक फुट नहीं दिखना चाहिए। ऐसा सिल देना कि अम्मी को पता न चले कि कभी फटी थी।"

लक्ष्मी दीदी ने मुस्कुराकर कहा, "और अगर अम्मी ने पूछा कि ये इतनी चिकनी कैसे हो गई?"

गुड्डू ने अपना सिर खुजाकर कहा, "तो कह दूँगा कि दीदी ने फ्री में कर दिया। उन्हें पता है दीदी फ्री में करती हैं।"

लक्ष्मी दीदी हँस पड़ीं। वो पहली हँसी थी जो मैंने उनके चेहरे पर कई महीनों से देखी थी।

फिर आया चिंटू।

चिंटू आया तो वो दबे पाँव आया। वो गली की तरफ़ देखकर आया, फिर गुमटी की तरफ़, फिर मेरी तरफ़। और उसके हाथ में एक कुर्ता था — मैला, पुराना, भूरे रंग का, जिसकी दो जगह से जेब सिली हुई थी।

उसने मेरे पास आकर धीरे से कहा, "अंकुश भैया, ये पापा का कुर्ता है। मैंने चुपके से लिया है। इसमें कहीं से पैसा न गिरे, इसलिए पापा ने जेब सी दी है। अब जेब ही नहीं है, तो पैसा कहाँ जाएगा? दीदी से कहो, बस इसकी जेब निकाल दें, ऐसा वैसा कर दें, पर पापा को पता न चले।"

मैंने उसका सिर सहलाया। मैंने कहा, "तेरे पापा को पता चलेगा तो क्या होगा?"

चिंटू ने कहा, "पापा कहेंगे — तू बड़ा आदमी बन गया, मेरे कपड़े चोरी करता है।"

मैंने कहा, "तो फिर सच क्यों नहीं बता देते? कि दीदी से सिलवाने ले गए थे।"

चिंटू कुछ देर मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर बोला, "क्योंकि पापा ने कभी अपने लिए कुछ नहीं सिलवाया। वो कहते हैं कि मरते वक़्त कफ़न नया मिलेगा, तो अभी पुराना क्यों बदलें।"

मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था।

मैंने कुर्ता लेकर लक्ष्मी दीदी की मेज़ पर रख दिया और कहा, "चिंटू का काम पहले।"

लक्ष्मी दीदी ने कुर्ता उठाया, जेब को उँगली से टटोला, और फिर बहुत धीरे से कहा, "इस जेब को निकालना नहीं है। इसके नीचे एक जेब और सीनी है। जिसे वो छिपाकर रखते हैं।"

चिंटू की आँखें फैल गईं।

"कैसे पता दीदी?"

"क्योंकि तेरे पापा की तरह बहुत आदमी आए हैं इस दुकान पर। हर आदमी के कपड़े में एक जेब होती है जिसे घर में सब नहीं जानते।"

चिंटू ने कहा, "तो दीदी, उस जेब को भी सी देना, पर ऐसे कि पापा को भी न पता चले।"

और फिर वो दौड़कर बाहर चला गया।

तीसरी आई शबनम आपा।

वो अपनी ही गुमटी के बाहर खड़ी थीं, मेज़ के पास, और उनके हाथ में एक दुपट्टा था — हल्का लाल, किनारों पर पीली कढ़ाई। वो दुपट्टा उन्होंने मेज़ पर रखा और कहा, "ये… ये किसी और का है। एक औरत रोज़ यहाँ चाय पीने आती है, लाल दुपट्टे वाली। आज सुबह उसने ये मेज़ पर छोड़ दिया। मैंने सोचा, टँका वगैरह लगवा दूँ।"

मैंने कहा, "आपा, इस दुपट्टे पर तो कोई फटा हुआ नहीं है।"

शबनम आपा ने मेरी तरफ़ ऐसी नज़र से देखा जैसे मैंने कोई बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो।

"तो?"

"तो फिर सिलवाने क्यों लाई हैं?"

वो एक पल चुप रहीं। फिर उन्होंने धीरे से कहा, "क्योंकि अंदर एक फटा हुआ है। अंदर। जहाँ कोई नहीं देखता।"

मैं चुप हो गया।

शबनम आपा मुड़कर चली गईं, पर जाते-जाते रुकीं और बिना पलटे बोलीं, "लक्ष्मी से कह देना, अंदर वाला टाँका मज़बूत लगाए। बाहर से कोई नहीं देखेगा।"

मैंने सिर हिलाया। वो चली गईं।

मैंने दुपट्टा उठाया और लक्ष्मी दीदी की मेज़ पर रखकर कहा, "आपा का। कहती हैं किसी और का है।"

लक्ष्मी दीदी ने दुपट्टा देखा और हँस पड़ीं। "ये किसी और का नहीं है। ये उनका है। ये कढ़ाई मैंने ही की थी, पंद्रह साल पहले, उनकी बहन की शादी में। और ये मैं दोनों को आज पहली बार देख रही हूँ।"

उन्होंने दुपट्टे को हथेली पर रखा, कढ़ाई पर उँगली फेरी, और कुछ देर चुप बैठी रहीं।

फिर उन्होंने सुई उठाई और काम शुरू कर दिया।

दस बजे के करीब उस्ताद अली बक्श आए।

वो आए तो उनके हाथ में एक पोटली थी — कपड़े की, जिसमें कुछ सिले-धुला था। वो सीधे लक्ष्मी दीदी के सामने पहुँचे, पोटली मेज़ पर रखी और बोले, "पहला पक्का काम मेरी दुकान का होगा।"

लक्ष्मी दीदी ने सिर उठाया।

उस्ताद ने पोटली खोली। उसमें एक कुर्ता था — सफ़ेद, लंबा, एक तरफ़ का कालर घिसा हुआ, और नीचे का हिस्सा ऐसा कि जैसे किसी ने उसे बरसों तह करके रखा हो।

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