The Mysterious Bell – Chapter 1114
मैंने उसे उठाया। ऊपर लिखा था — आवासीय विद्यालय, शहर के बाहर, कक्षा छह से आठ तक। नीचे छोटी लाइन में — "उन बच्चों के लिए जिन्होंने पढ़ाई बीच में छोड़ दी हो।"
मैंने पूछा, "ये मेरे लिए है?"
रमा मैडम ने कहा, "नहीं। ये तुम्हारे लिए नहीं है। ये उसके लिए है जिसे तुम चुनो।"
मैंने फ़ॉर्म को ठीक से खोला।
"मैडम, इसमें सिर्फ़ एक सीट है?"
"एक। पूरे शहर के लिए एक। और ये सीट उन बच्चों के लिए है जिन्होंने तीन साल से ज़्यादा की पढ़ाई खो दी है। चार बच्चों के नाम मेरे पास आए हैं। पर मैं तुम्हारी गली का नाम उस सूची में अपने हाथ से जोड़कर आई हूँ।"
"क्यों?"
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रहीं। फिर बोलीं, "क्योंकि पाँच साल पहले इसी गली ने मेरा घर टूटते देखा, और पाँच साल तक एक भी आदमी मेरे दरवाज़े पर यह पूछने नहीं आया कि मैडम, आप ठीक हैं?"
मेरे गले में कुछ अटक गया।
उन्होंने आगे कहा, "इस गली ने मेरी कमीज़ सिली है, मेरी बेटी को पढ़ाया है, मेरे घर के सामने का पत्थर साफ़ रखा है। पर मेरे दुख के सामने एक भी आदमी नहीं खड़ा हुआ। तो मैंने सोचा — जो गली मेरे दुख के सामने नहीं खड़ी हुई, वो गली मेरे बच्चों के लिए खड़ी है। इसलिए मैं ये फ़ॉर्म तुम्हारे पास लाई हूँ।"
मैंने कहा, "मैडम, मुझे माफ़ कीजिएगा।"
"माफ़ी माँगने से बात नहीं बनती, अंकुश। माफ़ी तब बनती है जब उसके बाद कुछ बनता है।"
मैं चुप बैठा रहा।
तभी बाहर से मीरा आई। वो रमा मैडम को देखकर दरवाज़े पर ठिठक गई। मैंने उसे देखा, और मैंने उसके चेहरे पर वो सब देखा जो उसने पाँच साल से अपने अंदर दबा रखा था।
रमा मैडम ने भी उसे देखा।
कुछ पल कमरे में एक भी आवाज़ नहीं आई — सिर्फ़ मशीन की टिक-टिक।
फिर रमा मैडम ने कहा, "मीरा, तू आ।"
मीरा अंदर आई।
रमा मैडम ने कहा, "तूने मुझे पाँच साल पहले चिट्ठी लिखी थी। मैंने नहीं खोली। आज भी नहीं खोली। पर मैं ये जानती हूँ कि तूने लिखी है। और मैं ये भी जानती हूँ कि तूने उसे डाक में नहीं डाला, अपने थैले में रखा है।"
मीरा ने कुछ नहीं कहा।
"तो बात साफ़ कर लेते हैं। मैंने तुझे माफ़ नहीं किया। मैं शायद आज भी नहीं कर पाई हूँ। पर मैं इतना ज़रूर कहती हूँ कि जिस दिन तू उस चिट्ठी को खुद मेरे हाथ में देगी, उस दिन मैं उसे पढ़ूँगी — और शायद उस दिन के बाद कुछ बने।"
मीरा ने आँखें नीची कर लीं।
मैंने देखा — उसकी आँख में पानी था, पर वो रोई नहीं।
रमा मैडम ने फिर मेरी तरफ़ देखा और बोलीं, "अंकुश, ये फ़ॉर्म परसों सुबह दस बजे तक जमा करना है। नाम उसी का लिखा जाएगा जिसे तुम चुनो। मैं किसी का नाम नहीं लिखूँगी।"
मैंने पूछा, "मैडम, आपने कहा कि चार नाम सूची में हैं। कौन से?"
वो बोलीं, "एक तुम्हारी गली का है — टिंकू। एक है सुनीता का बेटा राहुल, जो तीन महीने से स्कूल नहीं गया। एक है पीछे की गली से, और चौथा बाहर के मोहल्ले से।"
मैंने कहा, "और चुनने का हिसाब क्या है?"
रमा मैडम ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे वो सब जानती हों जो मैं नहीं जानता।
"हिसाब सिर्फ़ एक है — जिस लड़के के जाने से सबसे ज़्यादा घर बनते हों, उसका नाम लिखो। और जिसके जाने से सबसे ज़्यादा रिश्ते टूटते हों, उसका नाम मत लिखो।"
मैंने कहा, "मैडम, ये दोनों एक ही लड़का हो सकता है।"
वो हँसीं — पहली बार उस शाम। "तभी तो मैंने तुम्हें चुनने को कहा। तुम्हें जोड़ना आता है, अंकुश। तो किसी का घर नहीं जोड़ना — किसी का बचपन जोड़ो।"
इतना कहकर वो उठ गईं।
दरवाज़े से लौटकर बोलीं, "और हाँ — मैंने सुना है तुमने गली में एक चिट्ठी की चर्चा शुरू की है, जिसमें सब अपना छिपा सच लिखेंगे? उसमें मेरा नाम भी जोड़ लेना। मेरा सच यही है — मैं अब भी माफ़ नहीं कर पाई, और मैं अब भी हर सुबह उसी दरवाज़े से बाहर निकलती हूँ। दोनों बातें सच हैं।"
वो चली गईं।
मीरा कुछ देर चुप खड़ी रही। फिर उसने कहा, "अंकुश, ये फ़ॉर्म… ये फ़ॉर्म टिंकू के लिए है।"
"मुझे पता है।"
"और अगर हम इस पर नाम लिख दें, तो टिंकू शहर से बाहर चला जाएगा। छात्रावास में रहेगा। महीने में एक बार आएगा। शायद दो महीने में।"
"मुझे पता है।"
"क्या तुझे पता है कि वो कल ही तेरे पास रुका है? कल ही उसकी माँ ने फैसला किया है कि वो यहीं रहेगा? क्या तुझे पता है कि तीन दिन पहले उसने राँची का टिकट खरीद लिया था, और अब वो सपने में भी नहीं सोचता कि उसे जाना पड़ेगा?"
मैंने कहा, "मीरा, मुझे पता है।"
"तो?"
मैंने फ़ॉर्म उठाया। उसे सामने रखा। नाम वाली जगह खाली थी — सफ़ेद, साफ़, इंतज़ार करती हुई।
और मेरा पेन उस जगह के ऊपर हवा में रुक गया।
मैं तुम्हें बताता हूँ कि उस वक़्त मेरे अंदर क्या चल रहा था, क्योंकि ये कहानी का सबसे ज़रूरी हिस्सा है, और इसे समझाने के लिए मुझे अपनी सबसे बड़ी कमज़ोरी तुम्हारे सामने खोलनी पड़ेगी।
अगर मैं उस जगह पर टिंकू का नाम लिखता हूँ, तो टिंकू को स्कूल मिलेगा। अच्छा स्कूल। साफ़ कमरा, पूरा खाना, किताबें, मास्टर जो उसे "मिस्त्री" नहीं कहेंगे। उसे वो सब मिलेगा जो उसके पापा चाहते थे और जो उसकी माँ कभी नहीं दे सकीं।
और अगर मैं उस जगह पर टिंकू का नाम नहीं लिखता, तो टिंकू यहाँ रहेगा। मेरी दुकान पर। चाय बनाएगा, घंटी पोंछेगा, और रोज़ सुबह आठ बजे स्कूल की गली से मुड़कर दुकान पर आ जाएगा, क्योंकि स्कूल उसके लिए वो जगह नहीं है जहाँ वो जाना चाहता है।
अब तुम बताओ, मैं कौन सा नाम लिखूँ?
पर रुको। मैं तुम्हें इस सवाल का जवाब नहीं देने जा रहा, क्योंकि उस शाम मैंने भी नहीं दिया।
उस शाम मैंने पेन नीचे रख दिया और मीरा से सिर्फ़ इतना कहा, "टिंकू को बताऊँगा। खुद बताऊँगा। और वो जो कहेगा, वही लिखूँगा।"
मीरा ने कहा, "और अगर वो ये कहे कि लिख दो, क्योंकि तू चाहता है कि मैं पढ़ूँ?"
मैं हँसा। "तो मैं उससे पूछूँगा कि तू क्या चाहता है। और वो जवाब देगा।"
मीरा कुछ देर मुझे देखती रही। फिर बोली, "तू बदल गया है।"
"कैसे?"
"पहले तू सवाल का जवाब देता था। अब तू सवाल को ज़िंदा रखता है।"
मैंने कहा, "ये मशीन की वजह से है। मशीन सीधा जवाब नहीं देती। वो सिर्फ़ टिक-टिक करती है, और आदमी को खुद सोचना पड़ता है।"
शाम को गली में वो नज़ारा था जो मैंने सालों में नहीं देखा था।
लक्ष्मी दीदी की मशीन दुकान के पीछे नहीं, गुमटी के पीछे वाले कमरे में जा चुकी थी। शबनम आपा ने खुद वो कमरा खाली करवाया, फ़र्श पर पानी डलवाया, और एक पुरानी चारपाई पर मशीन रखवाई।
मशीन के सामने एक लकड़ी का स्टूल था, और उस स्टूल पर बैठकर लक्ष्मी दीदी सिल रही थीं।
गुमटी के बाहर आठ-दस औरतें बैठी थीं।
एक के हाथ में फटा बच्चों का फ्रॉक, एक के पास पति की पैंट जिसका घुटना गया हुआ था, एक के पास अपनी ही साड़ी का पल्लू, जिसे उसने चाय के बर्तन से जलाया था।
और सबसे आगे, शबनम आपा की मेज़ पर, वो हरा दुपट्टा रखा था — अब साफ़, टाँका लगा हुआ, इस्त्री सा चिकना।
रज़िया आपा उसके पास बैठी थीं और उसे देख रही थीं, बिना छुए।
तुम सोच रहे होगे कि इतनी सारी औरतें, इतने कपड़े, और अंकुश कहाँ है?
अंकुश गुमटी के बाहर, पत्थर के पुल पर बैठा था, टिंकू के साथ, और दोनों चाय पी रहे थे — इस बार चीनी के साथ, टिंकू की शर्त पर, और टिंकू की शर्त थी कि चीनी उसके हिस्से से लेंगे, मेरे हिस्से से नहीं।
उस वक़्त मेरी जेब में काग़ज़ था — रमा मैडम का फ़ॉर्म।
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