The Mysterious Bell – Chapter 1113
मैंने कहा, "दीदी, आँखें सबसे ईमानदार दरवाज़ा होती हैं। इन्हें खुलने में वक़्त लगता है, और बंद होने में उम्र।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और थोड़ी देर चुप रहीं। फिर बोलीं, "तू कहीं से भी बात करे, मशीन की तरह करता है।"
और तभी उस्ताद अली बक्श आए।
वो अपनी दुकान से एक पोटली लेकर आए थे — कपड़े में बँधी, भारी नहीं, पर सँभालकर रखी हुई। उन्होंने वो पोटली मेज़ पर रख दी और ऐसे बोले जैसे कोई फ़ैसला सुना रहे हों।
"पहला पक्का काम मेरी दुकान का होगा।"
लक्ष्मी दीदी ने सिर उठाया।
उस्ताद ने कहा, "मेरी दुकान का बोर्ड, यानी जो बोर्ड मैंने पचास साल पहले लगाया था और जिसे लोग पढ़ते-पढ़ते भूल गए, वो मैं सिलवाना चाहता हूँ। पर सिलाई उसके किनारे पर नहीं होगी।"
मैंने कहा, "तो कहाँ होगी?"
उस्ताद ने पोटली खोली। अंदर एक पुराना कपड़ा था, सफ़ेद, जिस पर काली स्याही में कुछ लिखा हुआ था — धुँधला, मिटा हुआ। और उस कपड़े के साथ एक छोटी पीतल की पट्टी थी।
उस्ताद ने कहा, "मेरी दुकान का पहला ग्राहक आज भी मेरे पास है। वो मर गया, पर उसका नाम इस पट्टी पर है। मैं चाहता हूँ कि ये पट्टी मेरे दुकान के सामने कपड़े पर सिली जाए। और उसके नीचे एक खाली लकीर छूटे — जहाँ हो सके, अगला नाम लिखा जाए।"
लक्ष्मी दीदी ने पट्टी उठाई। उनके हाथ काँप रहे थे।
वो बोलीं, "उस्ताद जी, मैंने पचास साल में ऐसा काम नहीं किया।"
"तो आज करो।"
उन्होंने पट्टी रख दी और अपना चश्मा साफ़ किया, और मैंने देखा — उस्ताद अली बक्श की आँखें भी भरी हुई थीं।
मैं वहाँ से खिसक गया।
क्योंकि कुछ पल ऐसे होते हैं जिनमें तीसरा आदमी होना बहुत बड़ी गुस्ताख़ी लगती है।
वो पूरा दिन — वो पूरा दिन जैसे गली का दिन नहीं, किसी और शहर का दिन था।
मैंने उस दिन सात साइकिलें ठीक कीं। सात। एक भी नई नहीं, सब पुरानी, सब टूटी, सब पर किसी का नाम लिखा हुआ — किसी की बीवी का, किसी के बेटे का, किसी के बाप का।
पहली साइकिल वो बूढ़े अंकल लाए जो रोज़ अपनी औरत को अस्पताल ले जाते हैं। उन्होंने साइकिल रखी और बोले, "अंकुश भाई, सीट की रॉड ढीली है। और सुनो — पिछली बार तुमने पैसे नहीं लिए थे।"
मैंने कहा, "अंकल, उस बात को छोड़िए।"
"नहीं छोड़ूँगा। मुझे शर्म आती है।"
"तो ये कीजिए — अगली बार जब आप आएँ, एक गिलास पानी मेरे लिए भी ले आइए। आपकी औरत की बीमारी का पानी, वो मुझे मेरे पैसों से ज़्यादा कीमती लगेगा।"
बूढ़े अंकल ने मेरी तरफ़ देखा। फिर वो मुस्कुराए, और मुझे लगा कि उन्होंने बहुत दिनों बाद मुस्कुराया है।
तीसरी साइकिल एक बच्ची की थी, जिसकी उम्र आठ साल थी और जो अपनी साइकिल पर बैठकर सिर्फ़ गली के मोड़ तक जाती थी, और फिर लौट आती थी। उसने साइकिल रखी और बोली, "भैया, ये बजती है।"
"कहाँ से?"
"पीछे से। जब मैं गड्ढे पर से जाती हूँ, तो बजती है।"
मैंने देखा। कोई खराबी नहीं थी। बस पीछे का मडगार्ड ढीला था, बोल्ट गया था। मैंने बोल्ट कसा, चेन में तेल डाला और सीट थोड़ी नीची कर दी।
फिर मैंने कहा, "अब नहीं बजेगी।"
उसने पूछा, "बजेगी नहीं, या कम बजेगी?"
मैं हँसा। "कम बजेगी। बिल्कुल बंद नहीं करूँगा, क्योंकि साइकिल का बजना बंद हो जाए तो लोगों को पता कैसे चलेगा कि तू आ रही है?"
वो खुश होकर गई।
और दिन भर के बीच, एक-एक करके, टिंकू दुकान का मालिक बनता गया।
उसने पहले घंटी पोंछी। फिर दोबारा पोंछी। फिर तीसरी बार पोंछी और मेरी तरफ़ देखकर बोला, "उस्ताद, ये हमेशा गंदी क्यों हो जाती है?"
मैंने कहा, "क्योंकि ये बजती है। जो बजता है, वो धूल पकड़ता है।"
"तो जो नहीं बजता, वो साफ़ रहता है?"
"हाँ। और बेकार भी।"
टिंकू ने सोचा। फिर उसने घंटी गले में लटका ली, और चाय बनाने लगा।
उसने चाय बनाई — मतलब, उसने चाय बनाने की कोशिश की। उसमें अदरक इतनी थी कि पहली घूँट में मेरी आँख से पानी आ गया और दूसरी में मेरी नाक खुल गई। चीनी नहीं थी, क्योंकि टिंकू का मानना था कि चीनी सेहत के लिए ठीक नहीं और उसने सबसे पहले मेरी सेहत सोची।
पर वो चाय पीकर जो आदमी गया, उसने टिंकू के सिर पर हाथ रखा और बोला, "बेटा, तू आज से इस दुकान का मालिक है।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा, और मैंने कहा, "हाँ, पर मालिक का काम सुबह छह बजे शुरू होता है।"
उसका चेहरा उतर गया। "छह बजे?"
"छह बजे।"
"और मालिक को चाय में चीनी डालने की इजाज़त है?"
"इजाज़त नहीं, हुक्म है।"
वो हँसा, और उस हँसी में कुछ ऐसा था कि मुझे लगा कि आज दुकान में सच में कुछ नया खुला है।
दोपहर में, जब गली सो रही थी और सिर्फ़ मशीन जाग रही थी, मैंने कॉपी निकाली।
मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगा। उस वक़्त मेरे हाथ काँप रहे थे। क्योंकि मुझे पता था कि आज जो जोड़ हुआ है — वो छोटा नहीं है।
एक बूढ़े दर्ज़ी की पचास साल पुरानी दुकान। एक औरत के हाथ को छह महीने बाद काम। एक बच्चे का पापा की सिली जेब में बतासा। एक दुपट्टा, जिसे एक बहन दूसरी बहन के लिए सिलवा रही है, बिना नाम लिए।
मैंने कॉपी खोली।
और पहले जो लिखा था, उसके नीचे एक नई लकीर उभरी थी — मेरी लिखाई में नहीं, मशीन की सुई जैसी।
उस लकीर के आगे अंक थे। बड़े अंक। उनतीस।
मैंने उँगली उस लकीर पर रखी और मेरे अंदर कुछ ठंडा सा फैल गया। क्योंकि मैंने कॉपी के पिछले पन्ने पलटकर देखा — जहाँ मैं अपना हिसाब रखता हूँ।
वहाँ उनतीस नहीं थे। वहाँ पंद्रह थे।
चौदह अंक गए। आधे से नहीं, आधे से भी ज़्यादा। उनतीस में से चौदह।
मैंने धीरे से घंटी उठाई, उसे हथेली पर रखा और बोला, "ये क्या है?"
घंटी गरम थी, पर उसने कुछ नहीं कहा।
मैंने कहा, "कल तूने कहा था — आधा उधार, तेरा नहीं। आज ये क्या है?"
तब घंटी बोली। दो शब्द, बहुत धीमे — "वो भी जोड़ रहा है।"
मेरे हाथ से घंटी फिसलने लगी।
मैंने कहा, "कौन?"
घंटी ने कहा, "जो बक्से में बैठा है।"
और फिर चुप।
मैं कुछ देर बैठा रहा। मशीन पीछे टिक-टिक कर रही थी। लक्ष्मी दीवार… लक्ष्मी दीदी किसी की कमीज़ के बटन टाँक रही थीं, और कभी-कभी अपने आप से कुछ गुनगुना रही थीं।
मैंने कॉपी में उस लकीर के नीचे लिखा — "आज का जोड़ चौदह आधे कटे। वजह: मेरा नहीं, उसका जोड़ भी चल रहा है।"
फिर मैंने एक और लाइन जोड़ी — "अगर वो जोड़ रहा है, तो उसके जोड़ कहाँ हो रहे हैं?"
और मैंने कलम रख दी, क्योंकि जवाब मेरे पास नहीं था।
दोपहर ढलने लगी थी जब गली के मोड़ पर कुछ हलचल हुई।
मैंने सुना कि कोई आ रहा है — पर वो किसी की चप्पल नहीं थी, किसी की साइकिल नहीं थी। वो औरत के जूतों की आवाज़ थी, धीरे, बराबर, जैसे कोई सोच-समझकर कदम रख रहा हो।
और फिर मेरी दुकान के सामने रमा मैडम खड़ी थीं।
मैं उन्हें पहचानता था। स्कूल की मैडम, जो नीम के पेड़ के नीचे बच्चों को पढ़ाती थीं, जिनके घर को पाँच साल पहले मीरा की एक आधी खबर ने बिखेर दिया था। जिनके पति चले गए, जिनकी बेटी ने स्कूल बदल लिया, और जो अब भी उसी गली में रहती थीं, उसी दरवाज़े पर, बिना किसी से शिकायत किए।
वो मेरी मेज़ के सामने आकर रुकीं। उनके हाथ में एक काग़ज़ था — मोटा, मुड़ा हुआ, ऊपर स्कूल की मुहर।
मैंने कहा, "मैडम, बैठिए। चाय?"
उन्होंने सिर हिलाया। "नहीं। मैं चाय के लिए नहीं आई हूँ।"
"तो?"
उन्होंने वो काग़ज़ मेज़ पर रखा।
"ये एक फ़ॉर्म है।"
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