The Mysterious Bell – Chapter 1112
रात उस दिन मैं जल्दी सो गया। जूट की पोटली सिरहाने रखी, घंटी उसके ऊपर, और कॉपी सीने पर। जैसे कोई बच्चा अपनी सबसे प्यारी चीज़ों को चारों तरफ़ बिछाकर सोता है।
नींद में मुझे कुछ नहीं दिखा। कोई सपना नहीं, कोई आवाज़ नहीं, कोई दरवाज़ा नहीं। बस सुबह जब आँख खुली, तो लगा कि रात भर कोई मेरा नाम लेता रहा।
और सुबह — सुबह मुझे उस लाइन का जवाब मशीन से मिला, आदमी से नहीं।
मैंने शटर उठाया और मेरे कानों में जो आवाज़ आई, वो पहले दिन वाली नहीं थी।
पहले दिन वो टिक-टिक थी — सूखी, टूटी, किसी पुराने लोहे की खाँसी जैसी। पर आज सुबह वो आवाज़ गली में गूँज रही थी। जैसे कोई दिल धड़क रहा हो, धीरे-धीरे, पर साफ़ सुनाई देते हुए।
मैं पीछे के कमरे में गया तो लक्ष्मी दीवार… माफ़ करना, लक्ष्मी दीदी पहले से बैठी थीं। मशीन के सामने, पीठ सीधी, चश्मा नाक पर, और हाथ में मेरी पुरानी कमीज़।
वो कमीज़ जिसका कॉलर बरसों से फटा हुआ था। जिसे मैंने कभी ठीक नहीं करवाया, क्योंकि मुझे लगता था कि कॉलर से क्या होता है। काम तो हाथ करते हैं, गला नहीं।
लक्ष्मी दीदी ने सुई रोकी और बिना ऊपर देखे कहा — "आ गए? हाथ धो लो, और ये देखो।"
मैंने देखा। कॉलर सिला हुआ था। इतना साफ़, इतना बराबर कि लगा कि कमीज़ ने खुद अपनी मरम्मत कर ली हो।
मैंने कहा, "दीदी, ये तो… ये तो नई लग रही है।"
"नई नहीं है। तेरी ही है। बस अब इसमें हवा रुकेगी, और हवा रुकेगी तो आदमी को ठंड नहीं लगेगी।" उन्होंने कमीज़ मोड़कर मेज़ पर रखी। "अब बताओ, आज क्या करना है?"
मैंने कहा, "आज आप वही करना जो आप करती आई हैं। और मैं वही करूँगा जो मैं करता आया हूँ।"
वो हँसीं। "ये तेरी हँसी में भी साइकिल की चरचराहट आ गई है।"
और तभी — तभी गली का दरवाज़ा खुल गया।
मतलब, गली का नहीं। गली के लोगों का।
पहले गुड्डू आया। दौड़ता हुआ, हाँफता हुआ, हाथ में कुछ लपेटे हुए। सामने आकर उसने वो चीज़ मेज़ पर पटक दी और बोला, "भैया, ये सिल जाएगी?"
वो उसकी निकर थी। घुटने पर इतना बड़ा छेद कि लगा कि निकर ने खुद फैसला कर लिया है कि अब वो निकर नहीं रहना चाहती।
मैंने कहा, "गुड्डू, ये तो पूरी निकर की हालत खराब है।"
"पता है। पर माँ कह रही है कि नई लाने के पैसे नहीं हैं, और टाँका लगा दो तो चल जाएगी।"
लक्ष्मी दीदी ने निकर उठाई, उलटी की, देखी। फिर बोलीं, "टाँका नहीं लगेगा, बेटा। इसमें तो पैबंद लगेगा। पैबंद अच्छा लगेगा — जैसे निकर पर कोई झंडा सा।"
गुड्डू की आँखें चमक गईं। "झंडा वाला? सच में?"
"सच में। दो घंटे बाद आ जा।"
गुड्डू भागा। दरवाज़े से लौटकर फिर आया, "और भैया, उस्ताद जी को बोलना, आज मैंने देखा — सफ़ेद गाड़ी वाला आदमी गली के मुँह पर खड़ा था, पर अंदर नहीं आया।"
मैंने पूछा, "कब?"
"अभी। जब मैं आ रहा था। वो खड़ा था, और मुझे देखकर मुड़ गया।"
मेरे हाथ में पकड़ी रिंच रुक गई। फिर मैंने वो रिंच मेज़ पर रखी और मुस्कुराया। "ठीक है। तू जा, निकर का झंडा तैयार होगा।"
गुड्डू गया।
उसके बाद जो हुआ, वो मैं तुम्हें ठीक से बताना चाहता हूँ, क्योंकि वो दिन मेरी ज़िंदगी का सबसे अजीब और सबसे सुंदर दिन था।
गुड्डू के जाने के बाद, अगले आधे घंटे में, गली की आधी औरतें मेरी दुकान पर थीं।
कोई गठरी लेकर आई, कोई थैला, कोई सिर्फ़ एक कपड़ा हाथ में दबाए। किसी के पास कहने को कुछ नहीं था, बस आकर खड़ी हो गईं, और मेज़ पर कपड़ा रख दिया। जैसे कोई मंदिर में प्रसाद रखता है — बिना बोले।
चिंटू सबसे आख़िर में आया। धीरे-धीरे, दीवार से सटकर, जैसे जेब में चोरी का आम लिए हो।
उसके हाथ में एक कुर्ता था। पीला, फीका, पुराना। उसने कुर्ता मेज़ पर रखा और झट से हाथ पीछे कर लिए।
लक्ष्मी दीदी ने कुर्ता उठाया और बोलीं, "ये तो बड़े आदमी का है। तेरे पापा का?"
चिंटू ने गला साफ़ किया। "हाँ। पर बताना मत।"
"क्यों?"
"क्योंकि… क्योंकि ये मैंने माँ को बताए बिना लिया है।"
मैंने पूछा, "और इसमें सिलना क्या है? ये तो ठीक लग रहा है।"
चिंटू ने कुर्ता पलटा। जेब सिली हुई थी। पूरी, बंद, ऊपर से नीचे तक, मोटे धागे से, कई बार।
मैं हँसने लगा। "चिंटू, जेब तो सिली है, पहले से।"
पर चिंटू हँसा नहीं।
वो बोला, "भैया, ये जेब मेरे पापा ने खुद सिली है। पिछले साल इनकी जेब फटी थी, और मज़दूरी के पैसे निकलकर सड़क पर गिर गए थे। किसी ने उठाकर नहीं दिए। पापा ने उस रात आकर जेब सिल दी और बोले — अब इस जेब में कुछ नहीं रहेगा, तो कुछ गिरेगा भी नहीं।"
कमरे में चुप्पी आ गई।
चिंटू ने आगे कहा, "तो भैया, मैं ये नहीं कह रहा कि इसे खोल दो। मैं तो यही कह रहा हूँ कि… इसके बाहर एक और जेब सी दो ना। जो पापा की नज़रों के सामने हो, और जिसमें मैं उनके लिए कुछ रख सकूँ।"
लक्ष्मी दीदी ने सुई उठाई और बोलीं, "आ जा, बैठ। और बता, तेरे पापा को क्या पसंद है?"
चिंटू ने कहा, "बतासे।"
"तो बाहर वाली जेब में बतासे का पैकेट रहेगा। और उसका ऊपर का कोना ज़रा मोटा रहेगा, ताकि पता चले कि जेब खाली नहीं है।"
चिंटू ने कहा, "ये हो सकता है?"
लक्ष्मी दीदी हँसीं। "बेटा, ये मशीन चालीस साल से सिल रही है। इसने फ़ौज की वर्दी सिली है, दुल्हन के जोड़े सिले हैं, और स्कूल के बच्चों के बस्ते सिले हैं। अब ये तेरे पापा की जेब नहीं सी सकती?"
चिंटू वहीं बैठ गया, फ़र्श पर, और पूरे समय मशीन की सुई को देखता रहा, जैसे कोई जादू हो रहा हो।
शबनम आपा तब आईं जब चिंटू जा रहा था। वो एक दुपट्टा लेकर आई थीं — हल्का हरा, फूलों वाला, किनारों से थोड़ा पीला पड़ा हुआ।
उन्होंने वो दुपट्टा लक्ष्मी दीदी की तरफ़ बढ़ाया और बोलीं, "ये किसी और का है। किसी और का है, तो ज़रा ठीक कर देना।"
मैंने सुना और मेरे अंदर कुछ हिल गया।
क्योंकि मैं जानता था कि वो दुपट्टा किसका है।
वही हरा दुपट्टा जो रज़िया आपा — शबनम आपा की बहन — लेकर आई थी, जो उन्होंने संदूक में सबसे ऊपर रखा था, जो उनके मायके से आया था, जो पंद्रह साल उस बंद कमरे में रहा था। और मैंने उसे उनके ही हाथ में देखा था, एक बार, जब वो उसे सीने से लगाए बैठी थीं।
मैंने कुछ नहीं कहा।
पर लक्ष्मी दीदी ने दुपट्टा थामा और बहुत धीरे से कहा, "किसी और का है, या किसी के पास रखा हुआ है?"
शबनम आपा एक पल रुकीं। फिर बोलीं, "दोनों एक ही बात है, दीदी।"
और चली गईं।
लक्ष्मी दीदी ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने कंधे उठाए।
उन्होंने दुपट्टा सामने रखा और कहा, "ये सींच नहीं आएगा। इसमें कढ़ाई का काम है। ये आज नहीं, कल करूँगी। पर एक बात बताओ — शबनम के पास कोई बहन है?"
"है, दीदी।"
"और वो कहाँ है?"
"घर पर। पंद्रह साल बाद लौटी है।"
लक्ष्मी दीदी ने दुपट्टे को हाथ में लिया, और उनकी आँखें भर आईं। मैंने पहले सोचा कि दुपट्टे की वजह से। फिर समझ आया कि वजह दुपट्टा नहीं था।
वो बोलीं, "तेरे हाथ में सुई है, मेरे पास मशीन है, और बीच में एक औरत है जो कहे बिना अपनी बहन का कपड़ा सिलने दे रही है। अंकुश, ये दुपट्टा मैं आज ही करूँगी।"
फिर उन्होंने अपनी आँखें पोंछीं और हँसकर कहा, "और मुझे ये भी बताओ — मुझे रोना कब से आ गया? छह महीने से मेरे हाथों को काम नहीं मिला, और अब पहला काम मिला तो आँखें खुद बहने लगीं।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno