The Mysterious Bell – Chapter 1107
लक्ष्मी दीदी कुछ नहीं बोलीं। उनका चेहरा नहीं बदला, पर उनकी उँगलियाँ टिंकू के कंधे पर कस गईं।
"मैंने यह नहीं सोचा कि टिंकू क्या चाहता है," मैंने कहा। "मैंने यह सोचा कि टिंकू के लिए क्या अच्छा है। और यही सबसे बड़ी गलती थी। क्योंकि जब कोई किसी के लिए सोचता है, तो वो सच में अपने लिए सोच रहा होता है।"
मैंने उसकी तरफ़ नहीं देखा। मैंने दीवार पर टँगी रिंच देखी, और उस पर जमी धूल की पतली लकीर देखी।
"मुझे डर है, दीदी।"
यह कहते वक़्त मेरी आवाज़ बदल गई। मैंने खुद को सँभालना चाहा, पर सँभल नहीं पाया।
"मुझे डर है कि सब पढ़-लिखकर चले जाते हैं। सब बड़े होते हैं और चले जाते हैं। मेरी दुकान पर जो भी आता है — कोई चार महीने, कोई छह महीने — और फिर वो कहता है कि भाई, अब मुझे आगे जाना है। और मैं हँसकर कह देता हूँ — जा भाई, आगे बढ़। मैं हँसता हूँ, दीदी। हँसता हूँ, क्योंकि अगर मैं न हँसूँ तो मेरा चेहरा सबको दिख जाएगा।"
मैंने हाथ में पकड़ी घंटी को एड़ी से एड़ी पर बदला। वो गरम थी, हल्की-सी गरम, जैसे किसी ने अभी-अभी उसे हाथ में लेकर छोड़ा हो।
"और मुझे यह भी डर है," मैंने कहा, "कि मैं सबको बचाने निकलूँगा और सबको खो दूँगा। यही मेरा सबसे बड़ा डर है। मैंने ये बात किसी को नहीं बताई। आज सुबह टिंकू से बताई, और अब आपसे बता रहा हूँ।"
टिंकू ने अपना सिर उठाया।
उसकी आँखें लाल थीं, और उसके होठ काँप रहे थे, पर वो रो नहीं रहा था। वो रोक रहा था — जैसे वो भी मुझसे ही सीखा हुआ करता हो कि रोना आए तो छिपा लो।
"उस्ताद," उसने कहा।
"हाँ।"
"मैंने टिकट इसलिए लिया था कि मुझे डर था कि आप मुझे भूल जाओगे।"
मैं रुक गया।
"मैंने सोचा," उसने कहा, आवाज़ भर्रा कर, "कि मैंने कभी स्कूल में नाम नहीं कराया, कभी किताब नहीं खोली, कभी मास्टर की बात नहीं मानी। आप मुझे कब तक रखेंगे? जब मैं बड़ा हो जाऊँगा और आप देखेंगे कि ये कुछ बना ही नहीं, तो आप कहेंगे — टिंकू, तू अब अपना रास्ता देख। और मैंने सोचा, अगर वो दिन आना ही है, तो मैं खुद चला जाऊँ। फिर आपको कहना ही न पड़े।"
"टिंकू," लक्ष्मी दीदी ने कहा। उनकी आवाज़ टूटी।
"माँ, मैं सच बोल रहा हूँ," टिंकू ने कहा। "और ये सच मैंने आज तक किसी को नहीं बताया। आपको भी नहीं।"
और फिर वो रो पड़ा।
धीरे-धीरे, पहले कंधे के साथ, फिर आवाज़ के साथ। वो अपना चेहरा दोनों हाथों में नहीं छिपा पाया, क्योंकि एक हाथ से वो नीचे फ़र्श पर पड़ी मशीन का पहिया पकड़े बैठा था, और दूसरी तरफ़ उसकी माँ थीं।
लक्ष्मी दीदी ने उसे अपनी गोद में खींच लिया। गुमटी की चाय की भाप अब भी उनके आँचल पर लगी थी, और टिंकू का चेहरा उसी आँचल में छिप गया।
मैं वहीं खड़ा रहा। मुझे उनके बीच से हट जाना चाहिए था, पर मेरे पैर नहीं हिले। ट्रंक का कोना मेरी पिंडली में लगा रहा, और मैं उसे सहता रहा, जैसे वो मेरी सज़ा हो।
कुछ देर बाद लक्ष्मी दीदी ने अपना आँचल उठाकर पहले टिंकू का चेहरा पोंछा, फिर अपनी आँखें पोंछीं। उनकी आँखों में पानी था, पर चेहरे पर गुस्सा नहीं था। कुछ और था, जिसका नाम मुझे नहीं पता।
"अंकुश जी," उन्होंने कहा।
"हाँ दीदी।"
"आपको शर्म आनी चाहिए या नहीं, ये आप बाद में तय कीजिए। मुझे अपनी बात कहनी है।"
"कहिए।"
"मुझे टिंकू पर शर्म नहीं आती," उन्होंने कहा। "मुझे अपने डर पर शर्म आती है।"
मैं चुप रहा।
"मैंने भी कभी उससे पूछा ही नहीं," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो बरसों की थकी हुई होती है। "मैंने कभी सीधे नहीं पूछा — टिंकू, तू क्या चाहता है। मैंने हमेशा सोचा कि मुझे पता है। मैंने उसकी जगह फैसले लिए। सुबह बस्ता थमा दिया, शाम को देखा कि बस्ता खुला ही है, और मैंने यह भी नहीं पूछा कि क्यों। मैं डर गई थी। अपने पति के जाने के बाद मैं इतना डर गई थी कि मैंने टिंकू को उस डर से बाँध दिया और उसे कोई नाम ही नहीं दिया।"
"माँ," टिंकू ने कहा, "ऐसा मत बोलो।"
"क्यों नहीं बोलूँ," उन्होंने कहा, और इस बार उनकी आवाज़ में वही कड़क थी जो गुमटी वाली औरतों में होती है। "जो हुआ, वो हुआ। अगर मैं न बोलूँ तो फिर वही होगा जो रणवीर चाहता है — सब चुप, सब अपनी-अपनी तरफ़, और बीच में ज़मीन।"
रणवीर का नाम आते ही कमरे की हवा थोड़ी भारी हो गई। मुझे लगा जैसे दीवार पर टँगी रिंचें एक इंच और नीचे लटक गईं।
"तो अब क्या?" टिंकू ने पूछा। उसने अपनी माँ की गोद से सिर उठाया और मेरी तरफ़ देखा। "अब मैं रुकूँ? या जाऊँ?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तू रुकेगा या जाएगा," मैंने कहा, "ये मेरा फैसला नहीं है।"
"पर आप चाहते हैं कि मैं रुकूँ?"
"हाँ," मैंने कहा। "ये सच है। मैं चाहता हूँ कि तू रुके। पर यह मेरी चाहत है, तेरा हक़ नहीं। तेरा रुकना मेरी खुशी से तय नहीं होगा, टिंकू। तेरे रुकने का मतलब होगा कि तू यहाँ खुश है, और वो खुशी तू अपने हाथ से बनेगा, मेरे पास बैठकर नहीं।"
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखता रहा।
"मैं रुकना चाहता हूँ," उसने धीरे से कहा। "पर मैं ये भी चाहता हूँ कि आप मुझे मिस्त्री न कहें। मुझे नाम से बुलाएँ। जैसे उस्ताद बुलाते हैं।"
"मैं नाम से ही बुलाता हूँ," मैंने कहा।
"पर स्कूल में सब मिस्त्री कहते हैं," उसने कहा। "और आप जब दुकान पर दिन भर मेरी तरफ़ नहीं देखते, तो मुझे लगता है कि आप भी अंदर से वही सोचते हैं।"
मुझे कुछ कहना चाहिए था। मुझे कहना चाहिए था कि वो गलत है। पर मैं चुप रहा, और उस चुप्पी में मैंने खुद को पहचाना — जब कोई पूरा दिन काम में डूबा रहता है, तो सामने बैठे आदमी को लगता है कि उसे भुला दिया गया है। पूरी गली में यही बीमारी फैली है। कोई किसी को नहीं भूला। सब बस मुँह नहीं खोलते।
"टिंकू," मैंने कहा। "मैंने एक बार तेरा नाम अपनी नई कॉपी में लिखा था। पहला नाम माँ का था, दूसरा तेरा। यही सच है। और अगर कभी मैंने तुझे भुलाया, तो वो दिन मेरे हिसाब में आएगा। पर आज तक नहीं आया।"
लक्ष्मी दीदी ने कुछ कहना चाहा, पर रुक गईं। उन्होंने टिंकू के बाल सहलाए और फिर मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश जी, एक बात और," उन्होंने कहा। "आपने मशीन को अपने फ़ायदे के लिए ठीक किया, ये आपने खुद कबूल किया। अब मैं ये नहीं कहूँगी कि मशीन मत बनाओ। मैं ये कहूँगी — मशीन बनाओ, पर उस पर टिंकू का नाम न लिखो। उस पर उसका हक़ लिखो।"
"मतलब?"
"मतलब ये कि मशीन चलने के बाद भी अगर टिंकू को जाना हो, तो वो जाएगा। और ये बात आपको पहले से माननी होगी। मशीन उसका रास्ता नहीं बंद करेगी, मशीन उसके हाथ सिखाएगी। बोलिए।"
मेरे मुँह से निकला, "मानता हूँ।"
और उसी वक़्त, हमारे बीच खड़ी उस टूटी सिलाई मशीन का पहिया धीरे-से घूमा।
बिना किसी हाथ के।
पहिया आधा इंच घूमा, फिर रुक गया, जैसे किसी ने साँस लेकर छोड़ी हो। मशीन के शटल से बहुत धीमी, सिलाई जैसी टक-टक आई — दो बार। फिर चुप।
तीनों ने देखा।
टिंकू ने घुटनों के बल उठकर पहिये को छुआ, और वो पहिया उसके हाथ में उतना भारी नहीं था जितना सुबह था।
"अंकुश भाई," उसने कहा, आवाज़ में धीमी-सी हँसी, "ये तो आधा घूमा।"
"हाँ," मैंने कहा। "आधा।"
और मेरी जेब में घंटी ने आवाज़ दी।
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