The Mysterious Bell1105 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1105

7 min read November 5, 2026

मैंने बैग काउंटर पर उलट दिया।

गिरा — कपड़े का एक फटा टुकड़ा, जिसे उसने अपनी कमीज़ की मरम्मत के लिए रखा था। एक मोज़ा, जिसकी एड़ी से छेद था। आधी पेंसिल, जिसकी नोक बहुत बार छीली गई थी और अब लकड़ी ही बची थी। रस्सी का एक टुकड़ा। टूटे शीशे का वो टुकड़ा जिसे वो गुप्तचर का आईना कहता था।

और एक मुड़ा हुआ काग़ज़ — जो अभी मैंने जेब में रखा था, उसकी दूसरी कॉपी। एक से ज़्यादा टिकट? नहीं। एक ही टिकट था, पर पीछे कुछ लिखा था।

मैंने पलटकर देखा।

उसकी अपनी लिखाई में, टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था — "माँ को बताना नहीं।"

मैंने काग़ज़ उसकी तरफ़ सरका दिया।

"ये तूने लिखा?"

वो चुप।

"टिंकू।"

"हाँ।"

"क्यों?"

"क्योंकि अगर बता देता तो माँ रो देती।"

मैं कुछ देर खड़ा रहा। कमरे में सिर्फ़ बल्ब की गुनगुनाहट थी और बाहर से शबनम आपा की केतली की आवाज़ आ रही थी।

"बैग में दो कपड़े हैं," मैंने कहा। "एक मोज़ा। आधी पेंसिल। रस्सी। शीशा। और एक टिकट। तू कहीं जाने की तैयारी में था — और तेरी तैयारी में एक भी किताब नहीं है।"

तब वो रोया।

बिना आवाज़ के पहले। फिर आवाज़ आई, छोटी और टूटी, जैसे किसी पुराने नल से पहली बूँद गिरती है।

"मैं बोझ नहीं बनना चाहता," उसने कहा।

"क्या?"

"मैं बोझ नहीं बनना चाहता, उस्ताद।" उसने आँखें मलीं। "माँ रोज़ रात मेरा बस्ता देखती है। सोचती है मैं सो गया हूँ। मैं जागता हूँ। मैं देखता हूँ कि वो कमरे में बैठकर काग़ज़ गिनती है। कितना बचा, कितना गया। और मैं… मैं कुछ नहीं कर पाता। मैं सिर्फ़ सोने का नाटक करता हूँ।"

मेरा गला सूख गया।

"और टिकट?"

"मैं सुबह पाँच बजे उठकर बस अड्डे गया था। लाइन में लगा। पैसे…" उसने नीचे देखा। "पैसे लाल वाली कॉपी से लिए।"

मैंने आँखें बंद कर लीं।

लाल वाली कॉपी। उसके पापा के बचाए पैसे। जो माँ ने उसे दिए थे, यह कहकर कि अब तेरी ज़िम्मेदारी है।

"तूने उन पैसों से टिकट लिया?"

"मैं लौटा दूँगा," वो फौरन बोला। "मैं… मैं गुमटी पर काम करूँगा। शबनम आपा ने कहा था, दो घंटे का काम। मैं दस दिन में लौटा दूँगा।"

"बैठ।"

"उस्ताद—"

"बैठ जा, टिंकू।"

वो चारपाई के किनारे बैठ गया, हाथ घुटनों पर रखकर, जैसे किसी स्कूल में सज़ा का इंतज़ार कर रहा हो।

मैंने बैग की चीज़ें वापस अंदर रखीं — कपड़ा, मोज़ा, पेंसिल, रस्सी, शीशा। टिकट मैंने अपनी जेब में रखा।

"अब चल," मैंने कहा। "माँ के पास।"

"नहीं!"

"टिंकू।"

"नहीं, उस्ताद, प्लीज़!" वो उठ खड़ा हुआ। "वो रोएगी। वो पहले से रोती है। मैंने उसे रोते हुए देखा है, रात में, जब वो सोचती है कि मैं सो गया हूँ। उसका मुँह ऐसा हो जाता है जैसे किसी ने उसकी आवाज़ निकाल ली हो।"

मैंने उसका कंधा पकड़ा।

"मैं जानता हूँ," मैंने कहा। "मेरी माँ का भी वही मुँह है। चल।"

बाहर गुमटी पर धूप तिरछी हो चुकी थी। शबनम आपा चूल्हे पर कुछ उलट-पलट रही थीं, पर उनकी नज़र हम दोनों पर थी। लक्ष्मी दीदी मेज़ के पास बैठी थीं, हाथ में मशीन का हिस्सा — वो टूटा पीतल का दाँता — और उसे उँगलियों से घुमा रही थीं, जैसे कोई माला घुमाता है।

मैंने टिकट उनके सामने रख दिया।

"ये टिंकू ने आज सुबह बस अड्डे से लिया है," मैंने कहा। "लाइन में लगकर। अपने पैसों से।"

लक्ष्मी दीदी ने टिकट देखा। उनका हाथ रुका। पीतल का दाँता मेज़ पर रखा, ठीक उसके बगल में, जहाँ उससे पहले वो मशीन का हिस्सा रखती थीं, जैसे एक ही जगह पर दो चीज़ें रखकर वो सोच रही हों कि कौन सी पहले उठाएँ।

और फिर उन्होंने वो कहा, जो मुझे उम्मीद नहीं थी।

"अरे, इसमें रोने की क्या बात है?"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

वो हँसी। एक छोटी, सूखी हँसी। वो हँसी नहीं थी, वो ऐसी आवाज़ थी जो हँसी की जगह पहन ली गई हो।

"बच्चा है," उन्होंने कहा। "मन लगा तो टिकट ले लिया। इसे तो दुकान प्यारी है, अंकुश। यहाँ वो खुश रहता है। यहाँ कोई इसे कुछ नहीं कहता। घर पर मैं हूँ, हिसाब है, दवा है। यहाँ मशीन है, तेल है, चाय है। इसे दुकान प्यारी है, इसलिए तो जाना चाहता है।"

टिंकू का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

"माँ," वो धीरे से बोला।

"क्या?" लक्ष्मी दीदी ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो कड़वाहट आ गई जो सिर्फ़ डरे हुए लोगों की आवाज़ में आती है। "सच ही तो कह रही हूँ। मैंने कब मना किया जाने से? मैंने तो कहा था, शाम तक मशीन पूरी कर दे, फिर जो ठीक लगे करना। मैं कहाँ रोक रही हूँ? जाए। जाए राँची। मेरा भाई का लड़का ले जाएगा। मैं अकेली रह जाऊँगी, चलेगा। मुझे आदत है।"

शबनम आपा ने चूल्हे की आँच धीमी कर दी। मैंने सुना, क्योंकि उनका हाथ चिमटी पर रुक गया।

और टिंकू, जो अब तक रो रहा था — उसका रोना एकदम बंद हो गया।

वो खड़ा रहा। दो पल। फिर उसने अपना हाथ मेरे हाथ से छुड़ाया, मेज़ के पास गया, और अपनी माँ के सामने खड़ा हो गया।

"हाँ," उसने कहा।

लक्ष्मी दीदी ने उसकी तरफ़ देखा।

"हाँ, मुझे दुकान प्यारी है," टिंकू ने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर वो रुका नहीं। "मुझे दुकान इसलिए प्यारी है क्योंकि यहाँ उस्ताद मुझे 'टिंकू' कहता है। यहाँ कोई मुझे 'मिस्त्री का चेला' नहीं कहता। यहाँ कोई मेरी क्लास नहीं पूछता।"

लक्ष्मी दीदी का हाथ मेज़ पर रखा रह गया।

"स्कूल में," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ एकदम छोटी हो गई, "बच्चे मुझे मिस्त्री कहकर बुलाते हैं। और मैं जब हाथ धोकर जाता हूँ, तब भी कहते हैं — अरे, तेरे नाखूनों में ग्रीस है। वो मेरे नाखून नहीं देखते। वो मेरा पापा देखते हैं।"

मैंने देखा कि उसकी मुट्ठी बंध गई।

"और मास्टर जी ने दो बार मुझे बाहर बुलाया," वो बोला। "पहली बार कहा कि तेरा नाम पिछली क्लास में जाएगा। दूसरी बार कहा कि तू यहीं बैठा रह जाएगा। मैं पूछना चाहता था — कितने साल? पर मैंने पूछा नहीं। क्योंकि मुझे लगा कि अगर मैंने पूछा, तो वो हँसेंगे।"

शबनम आपा ने कुछ कहना चाहा, फिर रुक गईं। वो मेज़ पर एक कप रख गईं और हमारे बीच से हट गईं — नहीं, हटीं नहीं, वो पीछे खड़ी रहीं, हाथ बाँधकर, जैसे कोई दरवाज़े पर पहरा दे रहा हो।

"और मुझे डर लगता है," टिंकू ने कहा।

"किससे?" लक्ष्मी दीदी ने पूछा।

"इससे कि अगर मैंने पढ़ाई में मन लगाया, तो उस्ताद मुझे भूल जाएगा।"

मेरे अंदर कुछ टूटा।

बिना आवाज़ के टूटा, पर इतनी ज़ोर से कि मुझे अपनी साँस सुनाई दी।

"वो मुझे कहेगा — अब तू पढ़ने वाला है, दुकान में क्यों आता है। और फिर मैं यहाँ आना बंद कर दूँगा। और फिर एक दिन वो मेरा नाम भूल जाएगा। और फिर एक दिन कोई और आएगा, जो चाय लाएगा, जो पेंच पकड़ाएगा, और उस्ताद उसे 'टिंकू' कहेगा। और मैं…" उसकी आवाज़ फँस गई। "और मैं वहीं रह जाऊँगा, जहाँ पापा रह गए।"

लक्ष्मी दीदी ने मुँह पर हाथ रख लिया।

और फिर वो रोईं। इस बार छिपाकर नहीं। इस बार वो रोईं जैसे कोई बहुत दिनों से एक ताला बंद कमरे में बैठा हो और दरवाज़ा अचानक खुल जाए।

"तू मुझे क्या समझता है?" उन्होंने कहा, हाथ हटाकर। "तू समझता है मैं तुझे इसलिए भेज रही हूँ कि मुझे तेरी आदत नहीं? टिंकू, मैं रोज़ रात तेरे स्कूल के काग़ज़ देखती हूँ। तेरी कॉपी में जो सफ़ेद पन्ने हैं, वो मुझे रातों को जगाते हैं। मैं सोचती हूँ — लोग क्या कहेंगे। तेरे पापा के जाने के बाद मैं हर आदमी से डरती हूँ जो मुझे रास्ते में रोकता है, हर काग़ज़ से डरती हूँ जिस पर हस्ताक्षर की जगह है, हर उस चीज़ से डरती हूँ जो मेरे हाथ से जाती है।"

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