The Mysterious Bell – Chapter 1104
पहिया चरचराया।
और फिर, चटाक से घूम गया।
पर उसके साथ कुछ और हुआ जो मुझे समझ नहीं आया — सुई की छड़ ऊपर उठी, ऊपर से नीचे आई, और ज़ोर से नीचे चली गई, बिना धागे, बिना कपड़े, सिर्फ़ हवा में। और मेरी उँगली उसी वक़्त सुई के नीचे थी।
मुझे दर्द नहीं हुआ। फिर भी खून निकला।
एक बूँद। छोटी सी। मशीन के चाँदी जैसे हिस्से पर गिरी और फिर रेंगकर लोहे की सतह पर फैल गई।
"उस्ताद!" टिंकू चीखा।
वो पीछे हटा। दो कदम। फिर तीन। और उसका हाथ मुँह पर चला गया।
"अरे, कुछ नहीं हुआ," मैंने कहा। "उँगली है, कटी नहीं।"
"लहू —"
"लहू निकलता है, इंसान का शरीर है।"
पर वो नहीं रुका। वो दीवार की तरफ़ सरक गया और उसकी साँस तेज़ हो गई। और मैंने देखा — ये डर खून का नहीं था। खून से कोई इतना नहीं डरता। इसमें कुछ और था।
लक्ष्मी दीदी दौड़कर आईं। उनके हाथ में चाय का गिलास था, वो मेज़ पर रखा और टिंकू की तरफ़ पलटीं।
"तू पीछे क्यों हटा?" उन्होंने कहा, आवाज़ तेज़। "बड़ा आदमी बनता है, और एक बूँद लहू देखकर भागता है?"
"मैं नहीं —"
"मुँह बंद कर।" उन्होंने उसका हाथ पकड़ा और खींचकर आगे लाया। "यहाँ खड़े रहना सीख। जो औज़ार से डरता है, वो औज़ार का नहीं, अपने आप का डरता है।"
टिंकू ने सिर झुका लिया।
और मैंने देखा — लक्ष्मी दीदी का हाथ भी काँप रहा था। उन्होंने टिंकू को डाँटा, पर उनकी अपनी साँस भी तेज़ थी। जैसे उन्होंने अपना डर छिपाने के लिए गुस्सा चुना हो। ये गली का सबसे पुराना हथियार है — जब डर लगे, तो डाँट दो।
वो मेरी उँगली की तरफ़ देखकर बोलीं, "मरहम है?"
"है," मैंने कहा। "और ये कुछ नहीं है।"
"जब भी कोई कहे कि कुछ नहीं है," उन्होंने कहा, "तब समझ लेना कि कुछ है।"
और फिर वो दोनों चुप हो गए। माँ बेटा। दोनों अपना-अपना डर सीने में दबाकर मेरी मरम्मत देखने लगे।
मैंने उँगली पर कपड़ा लपेटा और फिर मशीन के पास बैठ गया।
अब यहाँ एक अजीब बात हुई।
जब सुई उतरी थी, तब उसके नीचे मशीन की प्लेट पर एक काग़ज़ पड़ा था — उस्ताद का लाया हुआ काग़ज़, जो उन्होंने मेज़ से उठाकर वहाँ रख दिया था, ये कहकर कि देखता हूँ, सुई की चोंच सीधी है या नहीं।
अब मैंने उस काग़ज़ को उठाया।
उस पर कुछ लिखा नहीं था। पर सुई ने अपना काम कर दिया था।
काग़ज़ के बीच में दो सीधी लकीरें थीं — एक ऊपर, एक नीचे। और उनके बीच, बिल्कुल बीच में, एक छोटा सा बिंदु, जैसे सुई ने एक जगह रुककर दबाव बनाया हो।
मेरे हाथ से काग़ज़ फिसलने लगा।
यही निशान था।
यही। दो लकीरें और बीच में बिंदु। चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर। घंटी के छल्ले पर। बिजलीघर के बक्से पर। मंसूर चाचा के पीले काग़ज़ पर। दीवार पर, धूल पर, काग़ज़ पर, हर जगह।
"उस्ताद," मैंने कहा, "ये आपने देखा?"
उस्ताद ने काग़ज़ हाथ में लिया। उन्होंने उसे दूर रखकर देखा, फिर पास लाकर।
और मैंने पहली बार देखा कि उस्ताद का चेहरा रंग खोने लगा।
"बंद कर," उन्होंने कहा।
"क्या?"
"मशीन बंद कर। अभी।"
मैंने मशीन बंद कर दी।
उस्ताद ने काग़ज़ मेज़ पर रखा और उसे उँगली से ऐसे दबाया जैसे वो काग़ज़ नहीं, कोई ज़िंदा चीज़ हो जो भाग सकती है।
"ये निशान सुई ने नहीं बनाया," उन्होंने कहा।
"तो?"
"ये सुई ने बनाया है," उन्होंने कहा, "पर सुई को किसी ने बोला है।"
मेरी जेब में घंटी ठंडी पड़ गई।
ठंडी, उस तरह ठंडी जैसे सुबह की धातु। जैसे किसी ने उसमें साँस नहीं छोड़ी हो।
"घंटी," मैंने धीरे से कहा। "कुछ बोल।"
कुछ देर कुछ नहीं हुआ।
फिर घंटी बोली, इतने धीमे से कि मुझे लगा मैंने खुद ही सोचा है —
"जोड़ तब नहीं होगा जब तक दोनों अपना छिपा सच न बोलेंगे।"
"कौन दोनों?" मैंने कहा।
घंटी चुप।
"अंकुश," लक्ष्मी दीदी ने कहा। उनकी आवाज़ में वो बात थी जो डर को छिपाती है। "ये सब क्या है?"
"दीदी," मैंने कहा, "अभी मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ कि आपका बेटा किसी चीज़ से डर रहा है, और वो चीज़ खून नहीं है। और आप भी किसी चीज़ से डर रही हैं, और वो भी खून नहीं है।"
दोनों एक साथ बोले, "कुछ नहीं है।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
बस उन दोनों को देखा।
और उस वक़्त मुझे समझ आया — शबनम आपा ठीक कह रही थीं। मशीन का पहिया नहीं घूम रहा था। गली का पहिया घूम रहा था, पर उल्टा।
मैंने उस्ताद से कहा, "आपने कहा था, पहिया दिल के पेंच से बँधा होता है।"
"हाँ।"
"तो इस मशीन के दिल का पेंच कौन है?"
उस्ताद ने टिंकू की तरफ़ देखा।
फिर लक्ष्मी दीदी की तरफ़।
और फिर उन्होंने अपना पीतल का कटोरा उठाया और कहा, "तेरे पास हैं दो पेंच। एक बेटा, एक माँ। दोनों कसे हुए नहीं हैं, अंकुश। दोनों लटके हुए हैं।"
फिर वो उठे और कुछ कहे बिना चले गए।
मैंने काग़ज़ उठाया और उसे मोड़कर जेब में रखने लगा, तभी मेरी नज़र काउंटर के नीचे गई।
वहाँ कुछ पड़ा था।
एक छोटा बैग। कपड़े का। फटा हुआ। जिसके पट्टे में गाँठ बँधी थी।
टिंकू का बैग।
वो बैग हमेशा उसके कंधे पर रहता था। आज कंधे पर नहीं था। आज वो काउंटर के नीचे था — छिपाया हुआ, दबाया हुआ, जैसे किसी ने उसे जान-बूझकर वहाँ रखा हो।
मैंने उसे निकाला।
अंदर एक टूटा शीशा, दो पेंसिल, रस्सी का एक टुकड़ा और एक मुड़ा हुआ काग़ज़।
मैंने काग़ज़ खोला।
और मेरे हाथ रुक गए।
वो राँची की गाड़ी की पर्ची थी।
उस पर सीट का नंबर लिखा था। नाम लिखा था। और तारीख़ — आज की।
आज।
"टिंकू," मैंने कहा।
वो पलटा।
और उसकी आँखों में, एक पल के लिए, वो चीज़ दिखी जो बच्चे छिपाते हैं, पर छिपा नहीं पाते।
मैंने पर्ची हवा में उठाई।
"ये क्या है?"
टिंकू ने मुँह खोला।
लक्ष्मी दीदी ने पर्ची देखी, और उनका चेहरा वैसा हो गया जैसा सुबह हुआ था, जब वो अनजान फोन आया था।
और मेरी जेब में घंटी, अब भी ठंडी, बहुत धीमे से बोली —
"अब पूछ। पर सच पूछ।"
॥
मैंने पर्ची हवा में उठाई।
"ये क्या है?"
टिंकू ने मुँह खोला, फिर बंद कर दिया। उसकी गर्दन पर एक नस उभर आई, जैसे किसी ने अंदर से धक्का दिया हो।
"कुछ नहीं," वो बोला। "बैग… बैग साफ कर रहा था।"
"बैग साफ कर रहा था," मैंने दोहराया। "तो पर्ची भी साफ कर रहा था?"
"वो… वो पुरानी है।"
"पुरानी है?" मैंने पर्ची को करीब लाकर देखा। "आज की तारीख़ है, टिंकू। आज की। बैग साफ करने के लिए कोई आज की गाड़ी की पर्ची जेब में नहीं रखता।"
लक्ष्मी दीदी ने पर्ची देखी और उनका चेहरा वैसा हो गया जैसा सुबह उस अनजान फोन के बाद हुआ था — जैसे किसी ने उनके सामने से ज़मीन खींच ली हो।
"टिंकू," उन्होंने कहा। आवाज़ बहुत धीमी। "ये क्या है?"
टिंकू ने एक कदम पीछे हटकर मेरी तरफ़ देखा, फिर अपनी माँ की तरफ़। फिर ज़मीन की तरफ़।
"मैं… मैंने टिकट ले लिया था," वो बोला।
"क्यों?"
"बस ऐसे ही।"
"बस ऐसे ही क्यों?"
"क्योंकि मुझे जाना है!"
वो चिल्लाया। और चिल्लाते ही उसका चेहरा लाल हो गया, आँखें भर आईं, और वो अपना ही शोर सुनकर डर गया।
मैंने पर्ची जेब में रखी और उसका बैग उठाया। "अंदर आ।"
"कहाँ?"
"पीछे।"
मैं उसे दुकान के पीछे वाले कमरे में ले गया। वहाँ पुराना बल्ब गुनगुना रहा था, जैसे वो भी थक गया हो। औज़ारों का ट्रंक खुला था। मशीन के जुड़े हुए हिस्से वहीं पड़े थे — चक्का, पैडल पट्टी, तख़्ती, सुई की छड़, शटल। और उनके बीच, मेज़ पर, वो काग़ज़ पड़ा था जिस पर सुई ने दो लकीरें और बीच में एक बिंदु बना दिया था।
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