The Mysterious Bell1103 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1103

6 min read November 5, 2026

फिर लक्ष्मी दीदी ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और इतना ही कहा — "आज शाम तक मशीन पूरी कर दे। मशीन पूरी होगी, तो बात भी पूरी होगी।"

और मेरी जेब में घंटी का गरमापन उतर गया। बर्फ़ जैसा ठंडा भी नहीं हुआ। बस सामान्य हो गया, जैसे किसी ने सिर हिलाकर कहा हो — ठीक है, चल।

टिंकू ने धीरे से कहा, "उस्ताद।"

"हूँ।"

"मैं तो रहूँगा ना?"

"मशीन का पहिया पहले," मैंने कहा। "बाकी बातें पहिये के बाद।"

वो हँसा। दाँत दिखा गया। और मैंने अपने अंदर कुछ ऐसा महसूस किया, जिसका नाम मैं नहीं रखना चाहता था।

सुबह नौ बजे हमने मशीन को फिर खोला।

धूप गुमटी के छज्जे से सरककर दुकान के फ़र्श तक आ गई थी, और उसी पीली रोशनी में मैंने लोहे के पुर्ज़े एक-एक करके सामने रखे।

"देख," मैंने टिंकू से कहा, "ये चक्का है। ये चरखी है। ये सुई की छड़। ये शटल का घर, इसे पाना भी कहते हैं। ये पैडल की पट्टी। और ये वो तख़्ती है जो पैडल को नीचे खींचती है।"

"उस्ताद," टिंकू ने कहा, "इनके नाम किसने रखे?"

"जिन्होंने इन्हें पहली बार तोड़ा होगा," मैंने कहा। "नाम वही रखता है जिसे औज़ार से मतलब हो, किताब से नहीं।"

उसने हथौड़ी उठाई। फिर रिंच उठाई। फिर पेचकस उठाया और उल्टा पकड़ लिया।

"उल्टा है," मैंने कहा।

"पता है," उसने कहा। "जान-बूझकर।"

"क्यों?"

"ताकि आप डाँटें, और मुझे लगे कि आप मेरी तरफ़ देख रहे हैं।"

मैं हँस पड़ा। ये लड़का कभी-कभी ऐसी बात कह देता है जो मेरे अंदर के बूढ़े आदमी को चुप करा देती है।

फिर काम शुरू हुआ। चक्के की धुरी पर ज़ंग थी; मैंने सरसों के तेल की शीशी से दो बूँद डाली और हथौड़ी के हत्थे से हल्का ठोका। चक्का घूमा। धीरे। फिर रुक गया।

"क्यों रुका?" टिंकू ने पूछा।

"क्योंकि उसके अंदर का दाँता टूटा है," मैंने कहा। "और टूटा दाँता नीचे वाले चक्के के दाँते में फँस जाता है। मशीन को ज़बरदस्ती घुमाओ, तो दाँता टूटकर उड़ जाता है और किसी की आँख में जा सकता है।"

टिंकू ने तुरंत हाथ पीछे किया।

"डर गया?" मैंने पूछा।

"अच्छा है ना डरना," उसने कहा। "डरता हूँ तो हाथ पीछे करता हूँ। जो नहीं डरता, वो अँगुली खो देता है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। मैंने कुछ नहीं कहा। कभी-कभी कुछ न कहना ही सबसे बड़ी तारीफ़ होती है।

दस बजे तक हमने पैडल की पट्टी जोड़ दी थी, तख़्ती को सीधा किया था, और सुई की छड़ में नई सुई लगा दी थी। मशीन का ऊपरी हिस्सा अब गुनगुनाने लगा था — कच्ची गुनगुन, जैसे बच्चा सोते-सोते गाता है।

पर पहिया अभी भी भारी था।

"टिंकू," मैंने कहा, "पाना दे।"

"पाना?"

"वो जो छोटा सा कटोरा जैसा है। शटल के अंदर जो बैठता है।"

उसने चारों तरफ़ देखा, फिर मेज़ के कोने से उठाया, और — मुझे आज तक समझ नहीं आया कि उसके दिमाग़ में क्या चला — उसने उसे सीधे अपने सिर पर रख लिया।

"ये क्या कर रहा है?" मैंने कहा।

"टोपी," उसने कहा, बिल्कुल गंभीर चेहरा बनाकर। "उस्ताद, इसमें बाल भी नहीं बिखरेंगे।"

उसी वक़्त शबनम आपा चाय का ट्रे लेकर आईं। उन्होंने एक पल टिंकू को देखा, फिर ट्रे मेज़ पर रखा और इतना हँसीं कि गुमटी का पर्दा हिल गया।

"अरे," उन्होंने कहा, "ये तो नया फ़ैशन आ गया गली में। सिर पर पाना और मुँह में पूरा घमंड।"

"आपा," टिंकू ने कहा, "ये टोपी है।"

"हट," शबनम आपा ने उसके सिर से पाना उतारा, "ये मशीन का दिल है। इसे सिर पर रखते हैं, तो मशीन रूठ जाती है।"

उन्होंने पाना मेरी तरफ़ बढ़ाया, और फिर समोसे की काग़ज़ी पुड़िया मेरे सामने रख दी।

"खा," उन्होंने कहा। "तेरा चेहरा सुबह से ऐसा है जैसे तूने रात भर कोई हिसाब जोड़ा हो और वो गलत निकला हो।"

मैंने गरम समोसा उठाया, और पहला कौर खाते ही शबनम आपा ने वो बात कही जो मेरे अंदर तक चली गई।

"सुन," उन्होंने कहा, "मशीन से पहले इस गली का कोई एक टूटा रिश्ता ठीक कर दे। फिर देख, ये मशीन नहीं, पूरी गली चल पड़ेगी।"

मैंने चबाना रोक दिया।

"कौन सा रिश्ता?" मैंने पूछा।

"जो सबसे ऊपर है," उन्होंने कहा। "जो तू रोज़ देखता है और नहीं देखता।"

"आपा, साफ़ बोलिए।"

"मैं साफ़ ही बोल रही हूँ।" उन्होंने अपनी चिमटी उठाई और मेज़ पर हल्की टिक-टिक की। "कल की सूची ने इस गली को दो हिस्सों में बाँट दिया। जिनके नाम उस सूची में थे, और जिनके नहीं थे। जिन्होंने अंगूठा लगा दिया था, वो अब आँख चुरा रहे हैं। जिन्होंने नहीं लगाया था, वो उन्हें ऐसे देख रहे हैं जैसे वो गद्दार हों। ये रिश्ता टूटा है, अंकुश। ये तेरे ताले से भी पुराना है।"

मैंने समोसा रख दिया।

वो सच था। मैंने उसे देखा ही नहीं था। मैं इतना बड़ा जोड़ ढूँढ रहा था — माँ, पापा, दादा, ताला, रणवीर — कि आँख के सामने टूटी हुई गली दिख ही नहीं रही थी।

"आपा," मैंने कहा, "आपने अपनी बहन का नाम सबसे ऊपर लिखवाया था।"

"हाँ," उन्होंने कहा। "और तूने नहीं लिखा, क्योंकि तू समझता है कि मेरा रिश्ता मेरे हाथ में है। बता, है क्या?"

मैं चुप रहा।

"देख," उन्होंने कहा, "मैं तुझे अपनी बात नहीं थोप रही। बस ये कह रही हूँ कि मशीन का पहिया घूमे या न घूमे, गली का पहिया घूमना चाहिए। वरना कल को जब सब सामने खड़े होंगे, कोई किसी का हाथ नहीं पकड़ेगा।"

वो चली गईं। ट्रे उठाकर। और उनकी चप्पल की आवाज़ दूर तक सुनाई दी।

तभी दुकान के दरवाज़े पर उस्ताद अली बक्श आए।

आज उनके हाथ में कैंची नहीं थी। नापने का फीता भी नहीं था। बस एक छोटा पीतल का कटोरा था, जिसमें कुछ काग़ज़ के टुकड़े रखे थे।

उन्होंने बिना कुछ कहे मशीन के पास खड़े होकर पहिया देखा। फिर उँगली से चक्का घुमाया। फिर उन्होंने चक्के के भीतर झुककर देखा।

"अधूरा जोड़ा है," उन्होंने कहा।

"हाँ," मैंने कहा। "दाँता टूटा है, बदलना पड़ेगा।"

"दाँता बाद की बात है," उस्ताद ने कहा। "पहले ये बता, पहिया भारी क्यों है?"

"क्योंकि धुरी में ज़ंग है।"

"नहीं।" उन्होंने सिर हिलाया। "ज़ंग तो मैंने भी देखी। तेल डालकर वो छूट जाती है। पर भारीपन ज़ंग का नहीं है।"

उन्होंने अपनी उँगली चक्के के बीच टिकाई।

"पहिया सिर्फ़ लोहे का नहीं होता, अंकुश," उन्होंने कहा। "वो दिल के पेंच से बँधा होता है। जिस रिश्ते के लिए मशीन लाई गई, अगर वो रिश्ता कसा हुआ नहीं है, तो पहिया घूमेगा पर सिलाई नहीं टिकेगी। एक दिन चलेगी, दूसरे दिन पेंच ढीला।"

"उस्ताद," मैंने कहा, "मशीन मशीन है। रिश्ता रिश्ता है।"

"तू ये दुकान चला रहा है," उन्होंने कहा, "और ये बात नहीं जानता?" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखों में वो पुरानी चीज़ थी जो पचास साल से दबी है। "पचास साल पहले मैंने भी यही सोचा था। मैंने कहा, मशीन मशीन है। और मेरा भाई इलियास मेरे पास से उठकर चला गया। आज भी उसकी मशीन की सुई धागे के बिना काग़ज़ पर लकीरें खींचती है।"

"क्यों?"

"क्योंकि वो मशीन उसके किसी अपने के लिए लाई गई थी," उस्ताद ने कहा। "और वो अपना साथ छोड़कर चली आई।"

मुझे लगा मेरे हाथ सुन्न हो रहे हैं।

"अच्छा," मैंने कहा, "मैं इसका पहिया घुमाकर देखता हूँ। अगर घूम गया, तो सब ठीक।"

"अंकुश।"

"एक बार।"

"अंकुश, ज़बरदस्ती मत कर।"

मैंने सुना नहीं।

मैंने दोनों हाथों से पहिया पकड़ा और ज़ोर लगाया। पहले धीरे। फिर तेज़। फिर पूरी ताक़त से, जैसे पचास साल का ज़ंग मेरे हाथ में हो और मुझे उसे तोड़कर ही मानना हो।

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