The Mysterious Bell1102 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1102

7 min read November 5, 2026

"पैडल का पट्टा," मैंने कहा। "चमड़ा नहीं है, पर चमड़े से ज़्यादा चलेगा। और यहाँ पर बस ज़रा कस देंगे।"

मैंने पट्टा बदला। टूटी लकड़ी के नीचे साइकिल का एक छोटा लोहे का टुकड़ा लगाकर उसे कस दिया — जैसे पैर में पट्टी लगाते हैं। सुई की छड़ को रेती से सहलाया, और उसे धीरे से सीधा किया, ज़ोर से नहीं — अगर ज़ोर से मोड़ते, तो वो चटक जाती।

फिर मैंने चक्का पकड़ा।

"अब ये," मैंने कहा। "ये सबसे मुश्किल है।"

उस टूटे चक्के के अंदर एक और चीज़ थी। मशीन का वो हिस्सा जो चक्के से जुड़ा होता है — उँगली से पकड़कर घुमाने वाली जगह। उसका पीतल का एक छोटा दाँता टूटा हुआ था। यही वो दाँता था जिसने मशीन को रोक रखा था, चाहे बाहर से सब ठीक लगे।

मैंने ट्रंक में से एक छोटा पीतल का टुकड़ा निकाला — जो आज सुबह मुझे मिला था, नाखून जितना, बिना निशान वाला। मैंने उसे बीच में रखा। थोड़ा सा मोड़ा। उसके साइज़ से मिलाया।

"ये फिट हो रहा है," मैंने धीरे से कहा। मुझे यक़ीन नहीं हो रहा था।

"क्या?" टिंकू ने पूछा।

"कुछ नहीं," मैंने कहा। "मिल गया जो कुछ नहीं था।"

मैंने उसे फँसाया और हथौड़ी से हल्की चोट एक तरफ़ से, फिर दूसरी तरफ़ से। फिर चक्का घुमाया।

घूम गया।

मशीन ने आवाज़ की — "टिक।"

मेरा हाथ वहीं रुक गया।

टिंकू खिसककर पास आ गया। "उस्ताद?"

"टिक बोली," मैंने कहा। "सुनाई दिया तुझे?"

"हाँ।"

मैंने चक्का फिर घुमाया। "टिक।"

सुई ऊपर गई। नीचे आई। और अंदर से वो आवाज़ आई, जो सिलाई मशीन की साँस होती है — धीमी, लगातार, खट-खट-खट।

लक्ष्मी देवी ने हाथ लगाया। मशीन के पास खड़ी हो गईं।

"चल रही है," उन्होंने कहा। आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी और की आवाज़ हो।

"अभी पूरी नहीं," मैंने कहा।

"फिर भी — चल रही है।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

और उनकी आँखें भर आईं।

मैंने कुछ नहीं कहा। मैं मशीन के पास बैठा रहा, और टिंकू मेरे बराबर में बैठ गया, और हम दोनों ने देखा कि सुई ऊपर-नीचे हो रही है। लक्ष्मी देवी ने पल्लू से आँखें पोंछीं और तुरंत हाथ नीचे कर दिया, जैसे किसी ने देख लिया हो। शबनम आपा ने देखा था — गुमटी के पीछे से। और उन्होंने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस चूल्हे की आग तेज़ कर दी।

"दीदी," मैंने कहा। "एक बात पूछूँ?"

"पूछ।"

"राँची वाले भाई का लड़का — कौन है?"

"मेरा भाई है, अंकुश," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ सख़्त हो गई। "सगा नहीं। पहले का।"

"कहाँ का?"

"राँची का। वहीं से आया था, मेरी शादी के वक़्त।"

"और उससे बात होती है?"

"महीने में एक।"

"टिंकू से?"

लक्ष्मी देवी ने टिंकू की तरफ़ देखा।

"उसने एक बार आकर टिंकू को एक कापी दी थी," उन्होंने कहा। "दो साल पहले। कहा था, बड़ा आदमी बनेगा। उसके बाद से बस फोन पर पूछता है — कब भेज रही है।"

मेरे हाथ मशीन पर रुक गए।

"दीदी," मैंने कहा, "वो तो पहले से ही टिंकू को बुला रहा है। मशीन से क्या फ़र्क़ पड़ेगा?"

लक्ष्मी देवी ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में जो चीज़ थी, वो मुझे पहली बार समझ आई — शर्म।

"फ़र्क़ ये पड़ेगा," उन्होंने कहा, "कि मैं खुद जानूँगी कि मैं इसे अपने पास रख सकती हूँ या नहीं।" उन्होंने रुककर साँस ली। "मेरे आदमी के जाने के बाद मैंने कोई फ़ैसला खुद नहीं लिया, अंकुश। हर फ़ैसला किसी और ने लिया। रिश्तेदार ने। पड़ोसी ने। भूख ने। अब मैं एक फ़ैसला खुद लेना चाहती हूँ। और मैं चाहती हूँ वो फ़ैसला मेरे हाथ के काम से निकले, किसी की दया से नहीं।"

मैंने सिर हिलाया।

"अच्छी बात है," मैंने कहा।

टिंकू ने धीरे से कहा, "उस्ताद।"

"हूँ।"

"मशीन चल गई। तो मैं रहूँगा?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

वो मेरी तरफ़ देख रहा था, और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मुझे बचपन में पापा की आँखों में दिखती थी — वो उम्मीद जो अपने ही मुँह से नहीं निकलती, क्योंकि डर लगता है कि कह दिया तो टूट जाएगी।

"मशीन चल गई," मैंने कहा, "पर ये शर्त पर है कि तुझे मशीन सीखनी पड़ेगी।"

"क्या?"

"अगर तेरी माँ मशीन से रोटी कमाएगी, तो तू मशीन सीखेगा।" मैंने हथौड़ी उठाई और उसके हाथ में दी। "ताकि कल को अगर इसमें कुछ टूटे, तो तुझे पता हो क्या करना है।"

टिंकू ने हथौड़ी पकड़ी और देखा, जैसे उसने ज़िंदगी में पहली बार कुछ असली पकड़ा हो।

लक्ष्मी देवी हँसीं। बहुत कम हँसीं। एक छोटी सी हँसी, और फिर संभल गईं।

"अंकुश," उन्होंने कहा।

"हाँ।"

"तू मुझे बता दे।" वो सीधी खड़ी हुईं, और उनका चेहरा गुमटी के पीछे जलती आग जैसा लाल था। "तू बता दे कि टिंकू जाए या रहे। तू जो कहेगा, मैं मानूँगी।"

मेरे हाथ रुक गए।

"मैं?" मैंने कहा। "दीदी, ये आपका बेटा है।"

"हाँ," उन्होंने कहा। "और तू वो आदमी है जो मेरे बेटे को उस वक़्त खड़ा करता है जब मैं नहीं कर पाती।" उनकी आवाज़ नहीं काँपी। "तू मुझे बता। टिंकू जाए या रहे?"

मैंने मुँह खोला।

और उसी पल, मेरी जेब में, घंटी गरम हुई। अचानक। पूरी। जैसे किसी ने उसे अंगारे पर रख दिया हो। और उसने कहा, बहुत धीमे से, सिर्फ़ मेरे कान के लिए —

"जवाब देने से पहले याद कर। तू इसे अपने पास क्यों रखना चाहता है?"

मेरी जीभ तालू से चिपक गई।

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। वो हथौड़ी पकड़े खड़ा था। उसके काले मोज़े धूल भरे थे। घुटने पर पट्टी थी। और उसकी आँखों में वो भरोसा था, जो मुझे सबसे ज़्यादा डराता है।

मैंने सोचा — मैं इसे अपने पास क्यों रखना चाहता हूँ?

क्योंकि ये मेरा शागिर्द है?

क्योंकि मैंने इसकी माँ को वचन दिया है?

क्योंकि इसके बिना दुकान सूनी लगती है?

या क्योंकि — और ये सोचते ही मेरे अंदर की वो खाली दराज़ ज़ोर से हिली — क्योंकि अगर ये चला गया, तो मुझे ये बताना पड़ेगा कि मैं इससे क्या चाहता हूँ, और मुझे ये कभी नहीं बताया गया कि किसी से क्या चाहना चाहिए।

मैंने आँखें झुका लीं।

और घंटी ने, मेरी जेब में, बहुत धीमे से एक और बात कही, जिसे मैंने पहले सुना ही नहीं था —

"अब बोल। पर अगर तूने अपने फ़ायदे की बात कही, तो याद जाएगी।"

॥

मैंने टिंकू की तरफ़ नहीं देखा। मैंने लक्ष्मी दीदी की तरफ़ देखा, और मेरी जेब में घंटी अब भी गरम थी, जैसे किसी ने उसे मुट्ठी में दबा रखा हो।

"दीदी," मैंने कहा, "मैं आपको जवाब नहीं दूँगा।"

वो चुप खड़ी रहीं।

"मुझे पता है आप क्या चाहती हैं," मैंने कहा। "आप चाहती हैं कोई आपके सिर से ये बोझ हटा दे। कोई कह दे—रहे या जाए। ताकि कल को अगर कुछ गड़बड़ हो, तो आप कह सकें कि मैंने नहीं कहा था, अंकुश ने कहा था।"

उनका चेहरा सख़्त हो गया।

"सुनो," मैंने आवाज़ धीमी की, "अगर मैं ये जवाब अभी देता, तो मैं झूठ बोलता। क्योंकि मैं चाहता हूँ टिंकू रहे। पर मैं ये क्यों चाहता हूँ, ये साफ़ नहीं है। दुकान सूनी न लगे, इसलिए चाहता हूँ। मेरे पास कोई हो जो औज़ार पकड़ा दे, इसलिए चाहता हूँ। मैं सच बोल रहा हूँ, दीदी। ये मेरी ज़रूरत है, आपके बेटे का हक़ नहीं।"

लक्ष्मी दीदी ने होठ दबाए।

"तो फिर जवाब कौन देगा?" उन्होंने कहा।

"जो सवाल उठाए, वही," मैंने कहा। "टिंकू ने खुद पूछा था—मशीन चल गई, तो मैं रहूँगा? जो बच्चा खुद ये पूछे, उसका जवाब उस्ताद का नहीं होता, माँ का होता है। और अगर माँ भी न दे पाए, तो जवाब उसके अंदर होता है, हम दोनों के अंदर नहीं।"

कुछ देर तक बस गुमटी की आग चटकती रही।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho