The Mysterious Bell – Chapter 1101
और फिर वो चुप हो गई।
मैं छत पर बैठा रहा। ऊपर तारे। नीचे गली। और मेरे अंदर एक खाली दराज़।
मुझे नींद नहीं आई। सुबह पाँच बजे अज़ान की आवाज़ आई, दूर से, और फिर गली में किसी का नल खुला। मैंने मुँह धोया, चाय नहीं पी, और सीधा दुकान पर आ गया।
शटर उठाया तो वही आवाज़ आई जो हमेशा आती है — बीच में थोड़ा अटककर, फिर ऊपर। पीछे वाले कमरे में काला बक्सा पड़ा था। कल रात का बना हुआ, मुझ पर पेंट किया हुआ नाम लिए। मैंने उसे देखा और मन में कहा — अभी तेरी बारी नहीं।
घंटी जेब में ठंडी थी। पूरी रात ठंडी रही।
मैंने औज़ारों का ट्रंक खोला। पीतल का पेंच ढूँढा, जो कल रात घंटी में लगाया था — वो तो लगा हुआ था, पर उसकी जगह ट्रंक में एक और चीज़ मिली। एक छोटा पीतल का टुकड़ा, नाखून जितना, जिस पर कोई निशान नहीं था। मैंने उसे हथेली में रखा और ट्रंक बंद कर दिया।
छह बजे से पहले गुमटी पर शबनम आपा का चूल्हा जल चुका था। मैं वहाँ गया तो उन्होंने बिना पूछे एक कटोरी चाय मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
"रात को सब ठीक था?" उन्होंने पूछा। आवाज़ में वो कड़कपन नहीं था जो दिन में होता है। रात वाला नरमपन था।
"माँ को नींद नहीं आई," मैंने कहा।
"और तुझे?"
"मुझे तो हमेशा नहीं आती।"
उन्होंने सिर हिलाया। "काजल आई थी सुबह। कह रही थी ताले से आवाज़ आई।"
मैंने चाय पी। गरम थी और अच्छी थी और उस वक़्त मुझे उसकी ज़रूरत थी।
"आपा," मैंने कहा, "अगर कोई चीज़ माँ के मायके से आई हो और माँ उसके बारे में न बताए, तो मैं क्या करूँ?"
"तू उनसे पूछ," उन्होंने कहा। "मगर ऐसे पूछ जैसे तू उनका बेटा हो, वकील नहीं।"
मैं मुस्कुराया। "मैं वकील होता तो शायद ये सब होता ही नहीं।"
"हाँ। तेरी हर बात में मज़ाक होता है। कभी-कभी लगता है तू दुकान चला रहा है, कभी लगता है दुकान तुझे चला रही है।"
तभी सड़क के मोड़ से आवाज़ आई। एक पहिया। चरचराता हुआ। धातु का, लकड़ी पर।
मैंने मुड़कर देखा।
लक्ष्मी देवी आ रही थीं। एक हाथ में टिंकू का हाथ, और दूसरे हाथ में — एक पुरानी सिलाई मशीन।
नहीं, मशीन नहीं। मशीन का ढाँचा। काला लोहा, सुनहरे फूल, और ऊपर का चक्का — जो पूरा गोल नहीं था। उसका एक हिस्सा टूटा हुआ था, जैसे किसी ने पत्थर मारकर उसके दाँत तोड़ दिए हों। और मशीन एक तरफ़ झुकी हुई थी, क्योंकि उसके नीचे की लकड़ी की तख़्ती बीच से चटकी थी।
वो उसे उठाकर ला रही थीं, पूरे रास्ते। और उनका चेहरा लाल था, और साँस फूल रही थी, और वो किसी से मदद नहीं माँग रही थीं।
टिंकू उनके साथ चल रहा था। काले मोज़े, घुटने पर पट्टी, और आँखों में वो चीज़ जो मैं जानता हूँ। डर नहीं। उम्मीद। जो डर से भी ज़्यादा भारी होती है।
मैंने कटोरी रख दी और दौड़कर गया।
"दीदी, रुकिए — मुझे दीजिए —"
"नहीं," उन्होंने कहा। "मैं खुद लाई हूँ, खुद रखूँगी।"
और उन्होंने मशीन गुमटी के सामने, मेरी दुकान के आगे, ज़मीन पर रख दी।
फिर वो सीधी खड़ी हुईं, कमर पकड़ी, और मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "ये मशीन चल जाए, तो मैं शहर में रहूँगी। काम करूँगी। टिंकू को यहीं पढ़ाऊँगी।"
वो रुकीं। साँस ली।
"और अगर न चली, तो राँची वाले भाई का लड़का आएगा। वो टिंकू को ले जाएगा। अच्छे स्कूल में डाल देगा।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।
और उसकी आँखों में वो बात थी जो उसने मुँह से नहीं कही। उस्ताद, मना कर दो। उस्ताद, कह दो कि मशीन नहीं चलेगी। उस्ताद, कुछ करो।
मैंने मशीन देखी।
मशीन देखी, और मैं हँस पड़ा।
हँसी ज़ोर से नहीं आई। बस गले से निकल गई।
"दीदी," मैंने कहा, "ये पहिया नहीं है। ये तो बैलगाड़ी का चक्का लग रहा है।"
लक्ष्मी देवी का चेहरा कड़ा हुआ। "मैं मज़ाक नहीं कर रही, अंकुश।"
"मैं भी नहीं कर रहा, दीदी।" मैंने घुटने के बल बैठकर मशीन के पास। "मैं सच में कह रहा हूँ। देखिए इसे। एक तरफ़ से देखिए।"
उन्होंने देखा। फिर मेरी तरफ़। "क्या?"
"ये चक्का टूटा है, हाँ। पर टूटा हुआ चीज़ बेकार नहीं होता।" मैंने उँगली से उसका टूटा किनारा छुआ। "ये मशीन का चक्का है। इसे घुमाते हैं हाथ से, तो सुई चलती है। अगर इसके दाँत न हों, तो सुई कभी ऊपर-नीचे नहीं होगी।"
"तो?"
"तो इसे बदलना पड़ेगा।"
"नया मिलेगा?"
"नया नहीं मिलेगा, दीदी।" मैंने सिर हिलाया। "ये मशीन पुरानी है। इसके पुर्ज़े बाज़ार में नहीं मिलते।"
लक्ष्मी देवी की आँखें उतर गईं। उन्होंने टिंकू का हाथ छोड़ दिया। मेरे सामने, मेरी दुकान के आगे, वो एक ऐसी औरत लगीं जिसने सब कुछ आज़मा लिया हो और अब कुछ न बचा हो।
"तो मैं राँची वाले भाई को फोन कर दूँ?" उन्होंने कहा। आवाज़ सपाट थी। "वो कल आएगा।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।
और उसी वक़्त मेरी जेब में घंटी हिली। ठंडी थी — फिर हल्की गरम हुई। बहुत हल्की। बर्फ़ जैसी नहीं, गरम चाय जैसी नहीं। बस — अंगूठे के नीचे एक छोटी सी गरमाहट, जैसे कोई भीतर से उँगली लगाकर कह रहा हो, मैं यहाँ हूँ।
और फिर उसने कहा, बहुत धीमे से —
"इस जोड़ में तेरा भी हिस्सा है।"
मैंने आँखें बंद कीं। एक पल के लिए।
दीदी, रुकिए। एक मिनट।
मैं उठा। उनके सामने खड़ा हुआ।
"दीदी, एक बात साफ़ कर लें।" मैंने कहा। "अगर मैं ये मशीन चला दूँ, तो टिंकू यहीं रहेगा।"
"हाँ।"
"और आप शहर में काम करेंगी।"
"हाँ।"
"क्या काम?"
वो एक पल रुकीं। जैसे उम्मीद नहीं थी कि कोई ये भी पूछेगा।
"सिलाई," उन्होंने कहा। "जो कर सकती हूँ — सिलाई। पहले किया है।"
"कहीं जगह मिली है?"
"उस्ताद जी ने कहा है, शाम को उनकी दुकान पर बैठ जाऊँ। तीन-चार महीने। जब तक पैर जम जाए।"
मैंने सिर हिलाया। "तीन-चार महीने कम हैं, दीदी।" मैंने कहा। "आपको ज़्यादा चाहिए।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ बदला।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "तू मुझे उम्मीद मत दे। मैं डर गई हूँ।"
"मैं उम्मीद नहीं दे रहा, दीदी।" मैंने कहा। "मैं मशीन देख रहा हूँ।"
मैं फिर बैठ गया।
मैंने मशीन के पुर्ज़े गिने। चक्का — टूटा। नीचे की लकड़ी — चटकी। पैडल का चमड़े का पट्टा — टूटा, और बीच से ऐसा मुड़ा कि लगे किसी ने उसे दाँत से काटा हो। सुई की छड़ — झुकी हुई, एक तरफ़। शटल — वो नाव जैसी चीज़ जो अंदर धागा ले जाती है — अंदर फँसी हुई, खींची भी नहीं जा रही। और ऊपर जो लकड़ी की गोली होती है — गायब।
"सात चीज़ें," मैंने कहा। "सात चीज़ें ठीक करनी हैं।"
"सात?" टिंकू ने कहा। वो पहली बार बोला था।
"सात," मैंने कहा। "एक, चक्का। दो, नीचे की लकड़ी। तीन, पैडल का पट्टा। चार, सुई की छड़। पाँच, शटल। छह, ऊपर की गोली। और सात —" मैंने मशीन को हिलाया। "सात, मशीन का सबसे अंदर वाला एक हिस्सा जो मैं अभी जानता हूँ कि अटका है, पर नाम नहीं जानता।"
लक्ष्मी देवी ने धीरे से कहा, "सात चीज़ें एक दिन में नहीं होंगी।"
"नहीं होंगी," मैंने कहा।
"तो फिर —"
"तो फिर वो सात चीज़ें एक साथ करनी पड़ेंगी," मैंने कहा। "और मुझे अपने औज़ार लाने हैं।"
मैं उठा और दुकान में गया। ट्रंक से रिंच निकाली, हथौड़ी निकाली, रेती निकाली, और वो छोटी डिब्बी निकाली जिसमें बॉल बियरिंग, चेन के टुकड़े और पुराने पेंच पड़े थे। फिर मैं नीचे वाले डिब्बे से साइकिल ट्यूब का एक टुकड़ा ले आया।
"ये क्या है?" लक्ष्मी देवी ने पूछा, जब मैंने सामने फैला दिया।
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