The Mysterious Bell – Chapter 110
मीरा ने आपा की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। उसके माथे पर पसीना था, और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो सिर्फ़ सच से डरने वाले लोगों की आँखों में होती है — अपने ही हाथों से कुछ टूट जाने का डर।
"अंकुश, आपने कल रात अपने घर में एक सभा की। पापा ने सबके सामने कुछ कबूला। मुझे वो पूरा सुनना है, शब्द-दर-शब्द। लोगों को लगता है यह सब बुज़ुर्गों की सुलह है। मुझे लगता है यह सब आपकी दुकान बचाने की चाल है।"
मैंने कहा, "आपकी बात में एक बात सही है।"
वो चौंकी। "कौन सी?"
"दुकान बचाने की बात। मुझे यह दुकान बचानी है। यह मेरे पापा की है। और यह गली मेरी है।"
"और जो लोग आपके पास आते हैं, जो बुज़ुर्ग रोते हैं — वो सब?"
"वो सब मेरे पास नहीं आते, मीरा। वो अपने पास आते हैं। बारह साल, चालीस साल, पचास साल से जो बोझ किसी ने उतारा नहीं, वो आज उतरा है। इसमें मेरा काम सिर्फ़ इतना है कि मैंने उन्हें बैठने की जगह दी।"
"कैसे दी?"
मैंने जेब से हाथ निकाला। "चाय पीजिए, फिर बताता हूँ।"
उसने माइक नीचे नहीं किया। "मैं आपकी चाय में आपके अंगूठे नहीं लगवाना चाहती।"
शबनम आपा की चिमटी हवा में उठी। "मीरा! बात का भी एक हद होती है। मेरे यहाँ दाल में पानी नहीं, बात में भी नहीं। यह लड़का सुबह से खड़ा है और तू…"
"आपा, रहने दीजिए।" मैंने आपा का हाथ धीरे से नीचे किया। "मीरा जी जो पूछ रही हैं, उनका हक़ है पूछने का। मैं आपको वही बताता हूँ जो कल रात मेरे घर में हुआ। बात बनाने की नहीं, सच कहने की।"
उसने कैमरे की तरफ़ देखा, लाल बत्ती अभी भी जल रही थी। फिर मेरी तरफ़। "बोलिए।"
"मेरे पापा ने पच्चीस साल पहले एक काग़ज़ पर अंगूठा लगाया था। मेरे दादा को बुखार था। दवा के पैसे नहीं थे। सफ़ेद कुर्ते वाला एक आदमी उस काग़ज़ को लेकर आया था। नाम विजय भारद्वाज। शर्त थी — तीस दिन के अंदर। तीस दिन के अंदर दवा आ जाती तो दादा बच जाते। दवा देर से आई।"
मीरा का चेहरा बदला। "आप कह रहे हैं कि काग़ज़…"
"मैं कुछ नहीं कह रहा हूँ। मेरे पापा ने कहा। मेरे सामने। मेरी माँ के सामने। काजल के सामने। आपके सामने।"
"वो काग़ज़ कहाँ है?"
"मेरे पास।"
"दिखाइए।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। उसकी आँखें माइक पर थीं, पर उसके हाथ काँप रहे थे।
"मीरा, आप कल रात मेरे घर आई थीं। कैमरा बंद करके आई थीं। आपने पापा की पूरी बात सुनी। आपने माना कि सिर्फ़ पापा की ग़लती नहीं है। आपने वो पुरानी फोटो दिखाई, जिसमें चेन पर घंटी जैसी चीज़ लटकी है। और आज सुबह आप वही सब भूलकर मेरे दरवाज़े पर माइक लेकर खड़ी हैं। ऐसा क्यों?"
उसका हाथ थोड़ा ढीला पड़ा। उसने कैमरे की तरफ़ देखा, फिर उसे बंद कर दिया।
शबनम आपा ने कहा, "अच्छा किया बेटी। मेरी गुमटी तमाशागाह नहीं है।"
मीरा ने माइक बैग में रखा। उसकी आवाज़ धीमी हुई। "अंकुश, अगर तुम्हारे पास सच है, तो मुझे सिर्फ़ एक चीज़ चाहिए। वो सच काग़ज़ पर हो, तारीख़ के साथ, गवाह के साथ। मेरी खबर के लिए नहीं। मेरे अपने लिए। क्योंकि मैं एक बार आधा सच छाप चुकी हूँ और उसे रमा मैडम का घर टूट गया था। मैं अब दोबारा वो नहीं करूँगी।"
मैंने कहा, "तो फिर साथ चलिए, मीरा। मैं आपको काग़ज़ दिखाता हूँ। मेरे पास रखा है।"
हम पैदल उसकी गुमटी से मेरी दुकान की तरफ़ चले। रास्ते में बच्चे दौड़कर आए।
सानिया ने कहा, "अंकुश भाई, अंकुश भाई, सुबह से एक सफ़ेद कुर्ते वाला आपको दो बार ढूँढ चुका है।"
गुड्डू ने कहा, "वो कह रहा था — बोलो इस लड़के से कि दुकान का हिसाब साफ़ करे।"
रफ़ीक़ ने कहा, "मैंने उसे पीछे का रास्ता लेते देखा। उसके हाथ में फ़ाइल थी।"
चिंटू ने कहा, "और उस्ताद काका की दुकान का दरवाज़ा खुला है। उस्ताद काका अंदर बैठे हैं। पर वो बोल नहीं रहे। सिर्फ़ सिलाई मशीन घुमा रहे हैं। बिना धागे के!"
मैं रुक गया।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "उस्ताद अली बक़्श कल से गायब थे।"
"पता है।"
"आपको लगता है वो…"
"मीरा, आप चार बच्चों के साथ गुमटी पर रुकिए। मैं उस्ताद से मिलकर आता हूँ।"
सानिया ने कहा, "हम साथ चलें?"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। "तुम चारों आज मेरा सबसे ज़रूरी काम करो। गुमटी पर बैठो। जब भी कोई सफ़ेद कुर्ते वाला दिखे, चाय का पतीला गिरा देना। मुझे खबर मिल जाएगी।"
चिंटू ने कहा, "पतीला गिराना गलत बात है, अंकुश भाई। हम पतीला नहीं गिराएँगे। हम चिल्ला देंगे कि कोई चोर आया है। इससे भी तो काम चल जाएगा।"
मैं हँस पड़ा। "ठीक है। चिल्ला देना।"
मैं उस्ताद की दुकान की तरफ़ चला।
दुकान का दरवाज़ा खुला था, पर अंदर अंधेरा था। सिलाई मशीन की टिक-टिक आ रही थी, पर उसमें कोई धागा नहीं था। उस्ताद अपनी लकड़ी की कुर्सी पर झुके बैठे थे, चश्मा नाक पर, और उनके हाथ मशीन के पहिये पर रुके हुए थे।
मैंने दरवाज़े पर दस्तक दी। "उस्ताद।"
वो उठे नहीं। सिर्फ़ इतना कहा, "आ जा।"
मैं अंदर गया। दुकान में कपड़ों के बंडल रखे थे, कुछ अधूरी शर्ट, कुछ बचे हुए बटन, और कान पर पेंसिल यूँ ही फँसी थी।
मैंने कहा, "उस्ताद, कल रात आपकी दुकान बंद थी। मैंने चाबी निकाली। पीछे का कमरा खोला। ट्रंक खोला।"
वो चुप रहे।
"ट्रंक में सबसे ऊपर काग़ज़ रखा था। पापा का अंगूठा था उस पर। गवाह की जगह आपका नाम। और नीचे नाम था — विजय भारद्वाज।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनका हाथ मशीन के पहिये पर कस गया।
"उस्ताद, आपने मुझे कल कहा था कि आपका नाम उस काग़ज़ पर है। आप नहीं आए। आप चले गए। दुकान बंद कर दी। मुझे सिर्फ़ एक काग़ज़ मिला — जिसमें आपने लिखा था कि तेरा घर का तीसरा सच तू है। और चौथा सच भी तू है, वो सच पापा के हाथ में।"
वो मशीन से उठे। धीरे से कुर्सी से खड़े हुए, दीवार पर टँगा एक हल्का बैग उठाया, उसमें से एक चीज़ निकाली, और मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
वो एक पुरानी घंटी थी।
मेरी घंटी नहीं थी। इसका रंग थोड़ा अलग था, ज़्यादा गहरा, और उस पर एक छोटा सा फूल खुदा हुआ था।
"यह किसकी है?" मैंने पूछा।
"यह मेरी है। और यह तेरी तरह बोलती नहीं। यह सिर्फ़ सुनती है।"
उन्होंने घंटी मेरी हथेली पर रख दी। उनका हाथ काँप रहा था।
"उस्ताद, यह तो…"
"पचास साल पहले, मेरे पास दो घंटी थीं। दो। यह छोटी और तेरी वाली बड़ी। मेरे भाई इलियास के पास यह जोड़ी थी। हमने यह तंत्र साथ चलाया था।"
उनकी आवाज़ धीमी थी, जैसे कोई बहुत पुरानी डायरी पढ़ रहा हो।
"और फिर?" मैंने पूछा।
"और फिर झगड़ा हुआ। घंटी ने एक सच कहा और हम दोनों की उम्मीदें अलग-अलग हो गईं। मैंने अपनी घंटी ली, उन्होंने अपनी। और हम अलग हो गए। यह घंटी पिछले पचास साल से यही धूल में बंद है।"
मैंने उस घंटी को गौर से देखा। दरवाज़े की तरफ़ से आती हुई सुनहरी लाइट एक आख़िरी पल के लिए मेरी आँखों में गई।
"उस्ताद, अगर ये घंटी भी मिरासी है, तो ये बोलती क्यों नहीं?"
"क्योंकि मिरासी खुद नहीं बोलती। उसे दो ज़ुबानें चाहिए — एक जो देती है, एक जो लेती है। हम दोनों एक-दूसरे से नहीं बोले, तो घंटी क्या बोलेगी?"
वो कुर्सी पर लौटकर बैठे। उनकी आँखें भरी थीं, पर आँसू नहीं आ रहे थे। उनकी आवाज़ सूखी थी, जैसे कोई रेत को पानी समझकर पीता रहा हो।
"अंकुश, अब मैं तुझे बताता हूँ कि कल रात मैं क्यों भागा। तेरे काग़ज़ पर मेरा नाम देखा मैंने। पचास साल बाद।"
उन्होंने अपनी जेब से एक काग़ज़ निकाला, मोड़ा हुआ, किनारों से फटा हुआ।
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