The Mysterious Bell109 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 109

7 min read November 5, 2026

मैंने कहा, "मैं आप दोनों से यह नहीं कहूँगा कि ग़लती किसकी है। मैं सिर्फ़ इतना कहूँगा कि चबूतरी के इस कोने से उस कोने तक जो फ़ासला है, वो दो हाथ का है। और आप दोनों उस फ़ासले को बारह साल से नाप रहे हैं। वो फ़ासला आज भी दो हाथ का ही है। बढ़ा नहीं। घटा भी नहीं। यानी वो फ़ासला कभी था ही नहीं।"

मक़बूल चाचा की आँखें भर आईं।

उन्होंने कहा, "भूरा…" और फिर रुक गए। नाम पूरा करने में उन्हें डर लग रहा था, जैसे नाम लेने से चीज़ वापस आ जाएगी और फिर से चली जाएगी।

"भूरा हमारा कुत्ता नहीं था।" उन्होंने धीरे से कहा। "गली का था। किसी का नहीं। पर सुबह चार बजे मेरे दरवाज़े पर आ जाता था, क्योंकि चार बजे मैं रोटी खाता हूँ और उसे पता था कि मेरी रोटी का आधा हिस्सा उसका है। मैं उसका इंतज़ार करता था। कभी-कभी जल्दी खा लेता था ताकि यह न लगे कि मैं उसके लिए बैठा हूँ।"

रामस्वरूप काका ने कहा, "और सुबह वो मेरे घर के बाहर दूध पीता था।"

दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।

मक़बूल चाचा ने कहा, "तुझे पता था कि वो मेरे यहाँ भी आता है?"

"पता था।" काका ने कहा। "पूरी गली को पता था। बस हम दोनों को नहीं पता था कि दूसरे को पता है।"

मैं हँसा। हल्का सा। "यही तो।"

काका ने आगे कहा, "वो गली में आने वाले हर टेम्पो के पीछे भागता था। भौंकता हुआ। हम सब हँसते थे। बच्चे उसे 'टेम्पो इंस्पेक्टर' कहते थे।"

सानिया ने धीरे से कहा, "हमें किसी ने नहीं बताया।"

मैंने कहा, "क्योंकि इन दोनों ने उसका नाम ही बंद कर दिया था।"

फिर आया वो लम्हा जिसके लिए मैं बैठा था।

रामस्वरूप काका ने लाठी दोनों हाथों से पकड़ी, जैसे उससे अपना वज़न सँभाल रहे हों, और कहा, "वो दिन… वो दिन सावन का था। दोपहर। मैं नीम के पत्ते झाड़ने के लिए लाठी लेकर निकला था। तभी गली के मुहाने से एक टेम्पो आया। तेज़। पीली पट्टी वाला। भूरा उसके पीछे भागा, जैसे रोज़ भागता था। मैंने लाठी उठाई। मैंने सोचा, इस बार मैं ड्राइवर को चेताने के लिए लाठी टेम्पो की लोहे की बॉडी पर मारूँगा। आवाज़ होगी, वो रुकेगा।"

वो रुके। उनका गला सूख रहा था। मैंने पीछे वाले कमरे से एक स्टील का गिलास पानी लाकर उनके हाथ में रखा। उन्होंने पूरा पी लिया।

फिर कहा, "लाठी टेम्पो पर नहीं पड़ी। भूरा अचानक पलटा। मेरी ही लाठी उस पर पड़ी। पीछे से। वो चीखा और सड़क पर गिरा। और उसी वक़्त टेम्पो का पहिया —"

काका ने हाथ से अपना मुँह ढक लिया। "मैंने आँखें बंद कर लीं। बस एक पल के लिए। जब खोलीं, तो सब ख़त्म था। और मेरे हाथ में लाठी थी, ऊपर उठी हुई, हवा में।"

चबूतरी पर सन्नाटा। एक बच्चा भी नहीं हिला। चिंटू के होंठ काँप रहे थे और वो किसी को नहीं बता रहा था।

मक़बूल चाचा ने धीरे से कहा, "और मैं उसी वक़्त दरवाज़े पर आ गया था। मैंने तुझे उसी हालत में देखा। लाठी उठी हुई। मैंने सोच लिया।"

"तूने कभी पूछा नहीं।" रामस्वरूप काका ने कहा।

"तूने कभी बताया नहीं।"

दोनों में से कोई नहीं बोला। यही तो दिक्कत है। एक ने पूछना छोड़ दिया, दूसरे ने बताना छोड़ दिया, और बीच में बारह साल बैठ गए।

मैंने कहा, "काका, अब आगे।"

काका ने मेरी तरफ़ देखा। "आगे क्या?"

"आपने रात को क्या किया।"

काका की आँखों से पानी बह रहा था और वो उसे पोंछ भी नहीं रहे थे। "रात को मैं वापस आया। अपनी बीवी की चादर लेकर, ताकि कोई देख न ले। मैंने उसे अपने हाथों से उठाया। पीपल के नीचे गड्ढा खोदा। खुद। और उसे उसी कटोरे के साथ दफ़ना दिया जिसमें मैं उसे दूध देता था। फिर लकीर खरोंची। नाम लिखा। और मैं उसी रात से यहाँ बैठता हूँ। उसी जगह पर। उसके सिरहाने।"

मक़बूल चाचा ने बीच में कहा, "फिर तूने मुझे बताया क्यों नहीं?"

"क्योंकि मैं डर गया था।" काका ने सीधा कहा, बिना लाग-लपेट। "मैंने सोचा, अगर मैं बताऊँगा कि मेरी लाठी भी उस पर पड़ी थी, तो तू कहेगा कि मैंने मारा। और मैं वो सुनने को तैयार नहीं था। मैं तेरे ग़म से नहीं डरा। मैं अपने पर लगे इल्ज़ाम से डरा। और यह डर तेरे ग़म से बड़ा निकला। यह मेरी ग़लती है, मक़बूल। सिर्फ़ मेरी।"

मक़बूल चाचा ने तस्बीह हाथ से रखी और काका का हाथ पकड़ा। "नहीं।"

"क्या नहीं?"

"ग़लती सिर्फ़ तेरी नहीं है। मैंने एक बार भी नहीं पूछा। मैंने देखा और मान लिया। बारह साल मैंने तुझे सज़ा दी, बिना एक बार तेरी ज़ुबान सुने। मैं तुझसे रोज़ मिलता हूँ। तेरे घर के सामने से गुज़रता हूँ। तेरे बच्चे की शादी में गया। तेरी बीवी के जाने पर मैं तेरे दरवाज़े पर खड़ा रहा और एक शब्द नहीं बोला। और मैं अंदर से जलता रहा कि तूने मेरा कुत्ता मारा।" उनकी आवाज़ टूटी। "मेरा कुत्ता। जो तेरा भी था। जिसे मैंने कभी तेरा हिस्सा नहीं माना।"

फिर वो दोनों उठे। और चबूतरी पर, पीपल के नीचे, उस छोटी सी क़ब्र के पास, जिस पर चबूतरी बनी थी और जिस पर बारह साल से कोई नहीं बोला था, दो आदमी एक-दूसरे से लिपट गए। दोनों रो रहे थे, बच्चों की तरह, बिना कोई शब्द, बस कंधे हिल रहे थे।

रामस्वरूप काका ने कहा, "मुझे माफ़ कर दे।"

मक़बूल चाचा ने कहा, "तेरे बिना यह गली मुझे अधूरी लगती थी, भाई। माफ़ी की बात ही क्या। तू बैठ जा।"

और सच में, उन्होंने एक-दूसरे से माफ़ी नहीं माँगी। उन्होंने एक-दूसरे को चबूतरी पर बैठने की जगह दी। माफ़ी तो बस साथ में आ गई।

उसी पल मेरी जेब में घंटी बजी।

इतनी तेज़ कि चिंटू उछल पड़ा। "अरे, कुछ बजा!"

घंटी ने कहा, "बयालीस।"

और फिर इतना ही। "दो बेज़ुबान बैठे थे। एक ज़ुबान मिली।"

मैंने होंठ दबाकर मुस्कुराया। बच्चों ने मेरी जेब की तरफ़ देखा, यहाँ तक कि चबूतरी पर बैठे दोनों भी देखने लगे।

मक़बूल चाचा ने कहा, "यह क्या था?"

मैंने कहा, "चाचा, यह मेरी साइकिल की घंटी है। कभी-कभी बूढ़ी च…ीज़ें अपनी मर्ज़ी से बोल देती हैं। ज़ंग लगी हो तो ज़ुबान भी ज़ंग खा जाती है।"

मक़बूल चाचा ने माथा खुजाया, कुछ कहना चाहा, फिर चुप कर गए। रामस्वरूप काका ने मेरी जेब की तरफ़ देखा, ऐसे जैसे किसी बच्चे की जेब में चिड़िया बैठी हो और वो उड़ न जाए।

तभी चिंटू बोला, "अंकुश भाई, चाय की गुमटी पर आपकी मीरा दीदी खड़ी हैं और उनका कैमरा चालू है।"

मेरा पेट एक झटके में ठंडा हो गया।

मैंने चबूतरी से उठते हुए कहा, "चिंटू, वो मेरी नहीं है। और कैमरा चालू है तो और भी अच्छा, मुझे भी अपनी शक्ल देख लेने दो।"

बच्चे हँसे। मक़बूल चाचा ने कहा, "बेटा, मैं और रामस्वरूप अब रोज़ यहीं बैठेंगे। जब भी बुलाना, हम दोनों एक साथ आएँगे।"

"एक साथ आना ही तो सब कुछ है, चाचा।"

मैं पीपल से निकला और सामने देखा।

मीरा शबनम आपा की गुमटी के सामने खड़ी थी। तिपाई पर कैमरा, लाल बत्ती जल रही थी, और वो अपने फटे बैग से माइक निकाल रही थी। आपा उसके सामने हाथ में लोहे की चिमटी पकड़े खड़ी थीं, ऐसे जैसे कोई कैमरा नहीं, कोई तमाशा रोक रही हों।

मैं वहाँ पहुँचा तो मीरा ने माइक सीधा मेरे मुँह के सामने कर दिया।

"अंकुश यादव, गली के लोगों को बताइए, आप आज किस नाटक की तैयारी में हैं?"

मैंने माइक को हल्के से नीचे किया। "मीरा, कम से कम चाय तो पी लेतीं। आपा की चाय ठंडी नहीं होती, पर आपकी बातें ज़रूर ठंडी कर देती हैं।"

आपा ने तुरंत कहा, "सही कहा भाई। मैं इसे दो बार चाय दे चुकी हूँ, यह पीती नहीं, सिर्फ़ पूछती है।"

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