The Mysterious Bell108 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 108

7 min read November 5, 2026

"कौन दोनों?"

सानिया दरवाज़े पर आई, हाथ में लाल कवर वाली कॉपी। उसने कहा, "मक़बूल चाचा और रामस्वरूप काका। दोनों सुबह-सुबह आ गए। एक इस कोने पर बैठे हैं, दूसरा उस कोने पर। पीपल के नीचे। और भाई, आज कुछ अलग हुआ।"

मैंने कहा, "क्या हुआ?"

चिंटू ने कहा, "काका ने दो गिलास पानी लाया। एक खुद पिया, दूसरा चुपचाप चाचा के पास रख दिया।"

रफ़ीक़ ने कहा, "और चाचा ने कुछ नहीं कहा। बस पी लिया।"

सानिया ने कहा, "मैंने लिख लिया है। तीन दिन से यही हो रहा है। सोमवार, मंगल, बुध।"

मैंने कहा, "तुम चारों डिटेक्टिव हो या चुगलखोर?"

चिंटू ने बिना झिझक कहाचिंटू ने बिना झिझक कहा, "भाई, हम चुगलखोर नहीं हैं। हम गली के कान हैं। कान में दिमाग़ नहीं होता, इसलिए हम सुनते ज़्यादा हैं, बोलते कम।"

मैं हँस पड़ा। "यह ज्ञान तुझे कहाँ से आया?"

"रफ़ीक़ के भाई की किताब से।"

रफ़ीक़ ने तुरंत कहा, "वो किताब लौटानी है, चिंटू। अभी तक मेरे घर की अलमारी में रखी है, और मेरे भाई को पता भी नहीं।"

"लौटा देंगे।" चिंटू ने हाथ हिलाया। "पहले भाई को बता दें।"

सानिया ने लाल कवर वाली कॉपी खोली और कंधे तक ऊपर उठाकर मेरे सामने रख दी। पन्ने पर उसकी साफ़-साफ़ लिखाई थी। तारीख़, वक़्त, कौन किस कोने पर बैठा, कितनी देर बैठा।

मैंने कहा, "तुम यह सब रोज़ लिखती हो?"

"जो दिखे, वो लिखती हूँ। जो न दिखे, वो बाद में पूछती हूँ।"

"और मैं सोच रहा था कि तुम चारों सिर्फ़ ट्रक गिनने का काम करते हो।"

रफ़ीक़ ने गर्व से कहा, "ट्रक गिनना हमारा पहला काम है, भाई। यह दूसरा है।"

सानिया ने उँगली रखी। "देखो, चार दिन से यही हो रहा है। मक़बूल चाचा सुबह सात बजे आते हैं, पीपल के इस कोने पर चबूतरी पर बैठते हैं। रामस्वरूप काका सात बजकर दस मिनट पर आते हैं, और उस कोने पर बैठते हैं। दोनों के बीच पूरी चबूतरी खाली रहती है। कोई नहीं बैठता।"

मैंने कहा, "कोई नहीं बैठता या कोई बैठने नहीं देता?"

चिंटू ने कहा, "बच्चे बैठते हैं भाई। पर जैसे ही कोई बीच में बैठता है, दोनों की नज़रें ऐसी हो जाती हैं जैसे उस बच्चे ने कुछ बहुत बड़ी ग़लती कर दी हो। इसलिए अब कोई नहीं बैठता।"

सानिया ने कहा, "पर कल कुछ नया हुआ। रामस्वरूप काका उठे, चाचा की लाठी उठाई जो गिर गई थी, और चुपचाप उनके पास रख दी। चाचा ने देखा। कुछ नहीं बोले। पर मैंने देखा, चाचा ने आँखें बंद कर लीं। जैसे कोई दुआ पढ़ रहे हों।"

मेरे अंदर कुछ हिला।

मैंने कहा, "कितने साल से ऐसा है?"

सानिया ने कॉपी बंद की। "मैंने पूछा तो चाचा ने कहा, बारह साल। और फिर वो उठकर चले गए। मुझसे ऐसे जैसे मैंने कुछ ग़लत पूछ लिया हो।"

जेब में घंटी गरम हुई। एक झटका, फिर ठंडी।

मैंने चुपचाप हाथ जेब में डाला और पीछे वाले कमरे की तरफ़ बढ़ा। दरवाज़ा बंद किया, बल्ब जलाया। गुनगुनाता पुराना बल्ब, जैसे हर रात अपनी ही धुन में हो।

मैंने घंटी निकाली। हथेली पर रखी।

मैंने धीरे से कहा, "बारह साल। क्या है यह?"

घंटी ने कहा, "क़ब्र पर बैठे हैं दोनों।"

मेरा हाथ रुक गया।

"क़ब्र? गली में क़ब्र?"

"पीपल के नीचे। जड़ के पास। पत्थर उठा।"

और फिर चुप।

मैंने कहा, "और कुछ?"

"जब पत्थर उठे, तब पूछना। तब मैं बोलूँगी, अभी नहीं।"

मैंने घंटी जेब में रखी और बाहर आया। सुबह काजल माँ को जाँच के लिए अस्पताल ले गई थी। घर में पापा अकेले थे, और वो भी पुराने पंखे के सामने बैठे थे जिसका तार टूटा हुआ था और जिसे वो तीन दिन से ठीक करने के बहाने छू भी नहीं रहे थे। घर आज सच में चुप था। और मैं जानता था कि यह चुप्पी बीमारी की नहीं है, यह उस चीज़ की है जो हम सब मिलकर ढो रहे हैं।

मैं गली में निकला।

मैंने बच्चों से कहा, "तुम चारों पीपल के नीचे जाओ। जड़ के पास एक पत्थर है, जो बाकी ज़मीन से थोड़ा ऊपर है और जिस पर काई जमी है। उसे उठाओ। पर ज़ोर से नहीं। जैसे कोई बुज़ुर्ग का हाथ उठा रहे हो।"

चिंटू ने कहा, "अंदर क्या है?"

"मुझे भी नहीं पता। इसीलिए तुम भेज रहा हूँ।"

वे चारों भागे। मैं धीरे-धीरे उनके पीछे गया।

पीपल की छाँव सुबह भी ठंडी होती है। पक्षी ऊपर शोर कर रहे थे और नीचे चबूतरी पर सिर्फ़ दो आदमियों की साँसें थीं।

मक़बूल चाचा इस कोने पर। सत्तर के आसपास, सफ़ेद दाढ़ी, सिर पर हल्की टोपी, हाथ में पीली तस्बीह जो उनकी उँगलियों में घूम रही थी, पर होंठ नहीं हिल रहे थे। कमर थोड़ी झुकी हुई, जैसे सालों से किसी चीज़ के नीचे दबी हो।

रामस्वरूप काका उस कोने पर। दुबले, गमछा कंधे पर, घुटने पर हाथ रखे हुए, और उनका घुटना सूजा हुआ था जो वो छुपाने की कोशिश कर रहे थे। लाठी उनके बगल में खड़ी थी, बिल्कुल सीधी, इस तरह जैसे कोई सिपाही खड़ा हो।

दोनों के बीच चबूतरी खाली थी। न सिर्फ़ जगह खाली थी, बात भी खाली थी। और जिस चबूतरी पर हर शाम पूरी गली बैठती है, वहाँ सिर्फ़ दो लोगों की चुप्पी बैठी थी और वो चुप्पी बारह साल की थी।

मैंने कहा, "चाचा, सलाम।"

मक़बूल चाचा ने सिर हिलाया। "बेटा, तू आज वक़्त से पहले आ गया।"

"आज मेरा वक़्त किसी और का है।"

काका ने मेरी तरफ़ देखा। "किसका?"

"आप दोनों का। पर आप दोनों में से कोई बोलता नहीं। इसलिए मैं सोच रहा हूँ, आज मैं उस चीज़ से पूछूँ जो बोलती है।"

तभी चिंटू की आवाज़ आई। छोटे हाथ पत्थर उठा रहे थे और रफ़ीक़ कंधा लगा रहा था।

पत्थर हटा।

नीचे मिट्टी थी, और मिट्टी में एक चीज़ गड़ी हुई थी। मिट्टी का टूटा कटोरा। आधा पत्थर के नीचे दबा, आधा बाहर। और कटोरे के बगल में एक पतली सी लकीर थी, जिसे किसी ने पत्थर के कोने पर खरोंचकर बनाया था। पाँच अक्षर।

भूरा।

मैंने कटोरा उठाया। भीतर सूखी रोटी के टुकड़े थे, जो कई साल पुराने थे और मिट्टी बन चुके थे।

मक़बूल चाचा उठ खड़े हुए। एक झटके में, जैसे कमर का दर्द कहीं भूल गए।

उनकी आवाज़ काँपी। "यह मत छेड़ो।"

रामस्वरूप काका भी खड़े हो गए। उनके हाथ लाठी पर कस गए।

उन्होंने कहा, "चाचा, बच्चों ने किया है। इन्हें मालूम नहीं।"

मक़बूल चाचा ने कहा, "मुझे मालूम है इन्हें मालूम नहीं। पर तू तो जानता है।"

और यही वो वाक्य था। बारह साल की चुप्पी में पहली दरार।

मैंने देखा, रामस्वरूप काका का चेहरा बदल गया। वो कुछ कहने को हुए, फिर रुक गए, फिर मुड़कर जाने लगे।

मैंने कहा, "काका, एक मिनट।"

वो रुके, पर पलटे नहीं।

मैंने कहा, "आज मैं आपसे कुछ पूछने नहीं आया। आज मैं आपको कुछ बताने आया हूँ।"

काका चुप रहे।

"मैंने आज सुबह अपने पापा से पूछा कि घर इतना चुप क्यों है। पापा ने कुछ नहीं कहा। पर उनका हाथ काँप रहा था। और मैं सोच रहा था, पूरी गली में हर बुज़ुर्ग के पास एक ऐसा सच है जिसे उसने अकेले ढोया है, और उस सच का वज़न उसने अपनी चुप्पी से नापा है। चाचा, आपका सच किस वज़न का है?"

मक़बूल चाचा फिर बैठ गए। धीरे से। जैसे किसी ने उनके कंधों से कोई बोझ नहीं उतारा, बल्कि और रख दिया हो।

रामस्वरूप काका भी बैठ गए। एक कदम पीछे, पर बैठ गए।

मैं बीच में बैठ गया। आज पहली बार उस चबूतरी के बीच में कोई बैठा और किसी ने नज़रें नहीं तानीं।

मैंने कहा, "चाचा, भूरा कौन था?"

बारह साल की चुप्पी उस लम्हे में इतनी भारी हो गई कि पीपल के पत्ते भी रुक गए।

मक़बूल चाचा ने होंठ हिलाए, फिर बंद कर लिए।

रामस्वरूप काका ने पहली बार उनकी तरफ़ सीधा देखा। उनकी आँखों में कुछ था जो डर नहीं था। शर्म थी।

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