The Mysterious Bell – Chapter 1099
"याद तालों में नहीं बंद होती। याद उनमें बंद होती है जो उसे याद रखते हैं। और मेरी गली के लोग मुझे याद रखते हैं। इसलिए तेरा मालिक जो भी खेल खेल रहा है, वो एक चीज़ भूल रहा है —"
शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखा।
"— वो बहुत सारे लोगों से लड़ रहा है और मुझे सिर्फ़ एक आदमी से लड़ना है। खुद से।"
शबनम आपा ने कप मेज़ पर रखा और बोलीं — "बहाने मत बना। ताला हमारे सामने खोल।"
"आपा —"
"मैं जानती हूँ तुझे चाबी नहीं है।" उन्होंने आँखें सिकोड़ीं। "पर तेरे पास वही घंटी है जो सब बातें जानती है। उससे पूछ, चाबी कहाँ है।"
मैंने घंटी उठाई और उसे हथेली में रखकर हल्का हिलाया।
"सुन," मैंने कहा, "चाबी है कहीं?"
घंटी ने बहुत देर बाद जवाब दिया। इतनी देर बाद कि मुझे लगा कि वो बोलेगी ही नहीं।
"चाबी नहीं," उसने कहा। "खुद भी है।"
"मतलब?"
"खुद खुलेगा," घंटी ने कहा। "जब रिश्ता जुड़ेगा।"
"कौन सा रिश्ता?"
पर घंटी चुप हो गई। और उस चुप्पी में एक बात थी जो मुझे अंदर तक चुभी — जैसे घंटी जानती थी और नहीं बताना चाहती थी। जैसे वो भी उस ताले के अंदर बंद याद के बारे में सोच रही हो।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश, कल सुबह दस बजे चंद्रेश का दफ़्तार।"
"पता है।"
"और कल शाम पाँच बजे भवन।"
"पता है।"
"और आज रात बारह बजे अस्पताल की सीढ़ी।"
"पता है।"
"और कल सुबह सात बजे प्लॉट पर मशीन।"
"मीरा," मैंने कहा, "ये सब पता है। इसीलिए तो मैं ताले को जेब में रखकर सोने की सोच रहा हूँ।"
"और पीपल के जोड़ केंद्र पर तीन दिन?"
"वो भी पता है।"
"और गुमटी पर बीस दिन?"
"वो भी।"
मीरा ने कॉपी बंद की और अपनी तरफ़ से कहा —
"अंकुश, मुझे एक बात कहनी है और तू बुरा मत मानना।"
"मानूँगा।"
"मानना नहीं, सुनना।" उसने मेज़ पर झुककर कहा। "तू पिछले कुछ दिनों से हर चीज़ अकेले सँभाल रहा है। अस्पताल, स्कूल, दुकान, पीपल, बक्सा, ताला — सब। और जब कोई मदद देने आता है, तू कहता है — मैं देख लूँगा।"
"क्योंकि मैं देख लेता हूँ।"
"नहीं देखता।" उसकी आवाज़ सख़्त हो गई। "तू सिर्फ़ अपने ऊपर और बोझ डालता है, और फिर रात में बैठकर हिसाब लगाता है कि कितना बचा।"
मैं कुछ कहने ही वाला था कि गुमटी के बाहर से आवाज़ आई — कोई दौड़ रहा था। शटर उठा और काजल अंदर घुसी, उसके हाथ में दवा की प्लास्टिक थैली थी।
"अंकुश," वो हाँफ रही थी, "माँ ने तुझे बुलाया है।"
मैं खड़ा हो गया।
"क्या हुआ? तबीयत —"
"नहीं, तबीयत ठीक है।" उसने थैली मेज़ पर रखी। "उन्होंने ताला देखा है।"
"कैसे?"
"शबनम आपा की गुमटी से कोई खबर ले गया।" काजल ने मेरी तरफ़ देखा। "माँ कह रही हैं कि वो ताला उनके मायके से आया है।"
मैं रुक गया।
"क्या?"
"माँ कह रही हैं," काजल ने धीमे से कहा, "कि वो ताला नाना के घर से आया था। और उसकी चाबी उन्होंने बाईस साल अपने पास रखी थी।"
मेरा हाथ अपने आप जेब की तरफ़ गया, जहाँ गले की पुरानी चाबी लटक रही थी — वो चाबी जो पापा ने मुझे पंद्रह-सोलह साल की उम्र में दी थी और कभी नहीं बताया कि किस चीज़ की है।
मैंने उसे निकाला। हथेली में रखा। और उस पुराने काले ताले की तरफ़ देखा।
"मीरा," मैंने कहा, "मुझे एक काम करना है।"
"क्या?"
"माँ से पूछना है।"
"अभी?"
"अभी।" मैंने ताला जेब में रखा, घंटी दूसरी जेब में। "क्योंकि अगर ये चाबी इस ताले की है, तो मुझे यह जानना है कि माँ ने ये चाबी मुझे क्यों नहीं दी। और अगर ये चाबी इसकी नहीं है, तो मुझे यह जानना है कि माँ ने ये कहानी क्यों बनाई।"
शबनम आपा ने मेरा रास्ता रोका।
"अंकुश।"
"आपा, मुझे जाना है।"
"जाना है, तो सुनकर जा।" उन्होंने मेरी कमीज़ पकड़ी। "वो काग़ज़ — उस पर लिखा था कि ताला खोलना है तो पहले वही रिश्ता जोड़ो जो तुमने खुद तोड़ा था।"
"पता है।"
"तूने खुद किससे बोलना बंद किया था?"
मैंने उनकी आँखों में देखा।
"पापा से," मैंने कहा।
"और?"
मैं चुप रहा।
"और?" उन्होंने फिर कहा। उनकी आवाज़ अब धीमी थी। "सोच। बारह दिन पापा से नहीं बोला। उससे पहले?"
मैंने सोचा।
और मुझे याद आया — वो रात जब मैंने कहा था कि अब मैं सब अकेले सँभालूँगा। वो रात जब माँ ने कहा था कि बेटा, मुझे भी थोड़ा हिस्सा दे। और मैंने कहा था — नहीं, तुम आराम करो। वो रात जब मैंने हर किसी से कहा था कि तुम लोग पीछे रहो, मैं देख लूँगा।
मैंने अपनों से बोलना नहीं छोड़ा था। मैंने उनसे मदद लेना छोड़ दिया था। और मदद लेना छोड़ना भी एक रिश्ता तोड़ना है।
"आपा," मैंने धीरे से कहा, "मैं समझ गया।"
"क्या समझा?"
"जो रिश्ता मैंने खुद तोड़ा था, वो किसी एक आदमी से नहीं था।" मैंने जेब से ताला निकालकर हथेली पर रखा। "वो मेरे और मेरे अपनों के बीच का भरोसा था कि मैं उन पर भार नहीं, उनका साथी हूँ। मैंने वो तोड़ा था, आपा। जब मैंने हर बात अपने ऊपर ले ली और किसी को कुछ बताया नहीं।"
शबनम आपा ने मेरा कंधा छोड़ दिया। उनकी आँखें भर आई थीं और उन्होंने छुपाया नहीं।
"तो अब?" उन्होंने कहा।
"अब जोड़ूँगा।" मैंने ताला जेब में रखा। "पर एक बात है, आपा। ये जोड़ मुझे अकेले नहीं करना है। ये जोड़ पूरी गली को करना है। क्योंकि मैं अकेले जोड़ूँगा तो वो फिर वही होगा — मैंने सब अपने ऊपर ले लिया।"
मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा।
और बाहर, शटर के नीचे, धूल में, एक पैर का निशान था। ताज़ा। अकेला। सीधा आता हुआ, आधा, और फिर गायब।
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने बस घंटी निकाली और एक बार बजाई — ज़ोर से, साफ़, जैसे गली को बता रहा हो कि मैं अभी ज़िंदा हूँ।
घंटी ने पहले तो कुछ नहीं कहा। फिर बहुत धीमे से, बहुत थके हुए से कहा —
"घर जा। वहीं से शुरू होगा।"
मैंने सिर हिलाया।
"चल काजल," मैंने कहा, "माँ के पास।"
हम निकले। गली सूनी थी, पर सूनी नहीं थी — हर दरवाज़े के पीछे कोई जाग रहा था। सफ़ेद गाड़ी गली के मुँह पर नहीं थी। बिजलीघर के फाटक पर कोई नहीं था।
घर पहुँचे तो दरवाज़ा खुला था और भीतर से पीली रोशनी आ रही थी। माँ चारपाई पर बैठी थीं, साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ, हाथ में हिसाब की कॉपी। पापा कोने में बैठे थे, उनके सामने पुराना पंखा खुला पड़ा था और वो उसे ठीक करने के बहाने उसकी तारें देख रहे थे।
मैंने ताला माँ के सामने चारपाई पर रखा।
माँ ने उसे देखा। देखा और उनका हाथ कॉपी पर जम गया।
"ये —" उन्होंने धीमे से कहा।
"ये वही है, माँ," मैंने कहा। "और आपने कहा कि ये नाना के घर से आया था। अब बताइए सच।"
माँ ने पापा की तरफ़ देखा।
पापा ने पंखा रख दिया।
"मैं बताता हूँ," उन्होंने कहा।
और तभी — उसी पल — ताले के भीतर से आवाज़ आई।
धीमी, सभ्य, बिना जल्दी। जैसे कोई पुरानी याद दरवाज़ा खटखटा रही हो। एक दस्तक। फिर दूसरी। फिर तीसरी।
कमरे में चारों तरफ़ सन्नाटा हो गया। पापा का मुँह खुला रह गया और माँ की कॉपी उनके हाथ से फिसलकर गोद में गिर गई।
मैंने ताला उठाया। कान लगाया।
और उसके भीतर से, बहुत दूर से, मुझे एक आवाज़ सुनाई दी — बूढ़ी, थकी हुई, और फिर भी पहचानी हुई —
"अंकुश।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
"अंदर वाली," मैंने धीरे से कहा, "सब्र रख। मैं तुझे याद करके लाने आ रहा हूँ।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno