The Mysterious Bell – Chapter 1098
उनके हाथ में एक फटा कपड़े का थैला था — टिंकू के कपड़ों का। उन्होंने साड़ी का पल्लू कंधे पर ठीक किया और अंदर आईं।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "मैंने फैसला सुना दिया था। टिंकू राँची नहीं जाएगा। आज रात वो मेरे साथ रहेगा।"
"अच्छा किया, बहन जी," शबनम आपा ने कहा।
"पर —" लक्ष्मी देवी ने रुककर मेरी तरफ़ देखा, "ये बक्सा क्या है? इस पर तेरा नाम क्यों है? गली में एक ही बात चल रही है कि साहब ने आख़िरी बाज़ी खेल दी।"
"यही है," मैंने कहा। "आख़िरी बाज़ी।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो सवाल था जो वो पूछना चाहता था पर पूछ नहीं रहा था — "तू मुझे छोड़ रहा है क्या?"
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"टिंकू, तू घर जा।"
"पर —"
"माँ के साथ जा। आज रात मेरी बात मत पूछ।" मैंने उसकी आँखों में देखा। "और सुबह छह बजे गुमटी पर आ जाना। मैं तेरे लिए एक चीज़ रख रहा हूँ।"
"क्या?"
"अभी नहीं बताऊँगा। वरना तू रात भर सो नहीं पाएगा, और मुझे तेरी माँ को जवाब देना पड़ेगा।"
टिंकू हँसा। हल्का, थोड़ा डरा हुआ, पर हँसा। उसने मेरा हाथ पकड़ा, दबाया और माँ के साथ चला गया।
लक्ष्मी देवी जाने से पहले रुकीं।
"अंकुश, एक बात कहूँ?"
"कहिए।"
"मैंने जब टिंकू के पापा को खोया था," उन्होंने धीमे से कहा, "तब मुझे लगा था कि मेरा सबसे पहला हँसना भी उनके साथ ही मर गया। बरसों बाद पता चला कि मेरा सबसे पहला हँसना टिंकू था, जब उसने पहली बार खड़े-खड़े गिरना सीखा। किसी चीज़ को भूलना पड़ता है, बेटा, तभी कुछ नई चीज़ याद आती है।"
वो चली गईं।
मैंने बक्से को देखा। अब वो अंदर से खाली था और बाहर से भारी लग रहा था।
"इसे उठाओ," मैंने भोला भाई से कहा। "मेरी दुकान के पीछे वाले कमरे में रखो। जो नाम वाला है, वो ले गया। अब साहब अपना वादा निभाएँ, मेरा नाम कहीं से उतारें।"
लोग हँसे। इस बार असली हँसी थी। और मैंने महसूस किया कि गली में हँसी अभी ज़िंदा है, और जब तक हँसी ज़िंदा है, घंटी भी ज़िंदा रहेगी।
बक्सा उठाकर अंदर रखा गया। भोला भाई ने अपने दोनों आदमियों से कहा कि रात भर दुकान के बाहर बैठेंगे नहीं, अंदर बैठेंगे। लोग एक-एक करके गए, पर कोई भी गली छोड़कर नहीं गया। आज सब वहीं सोए — किसी की चारपाई, किसी की छत, किसी की दुकान।
रात लगभग आठ बजे की थी। शबनम आपा ने चूल्हा जलाया और चाय बनाई। पहला कप मेरे आगे रखा।
"पी ले," उन्होंने कहा, "बतियाते हुए सोचेंगे।"
मैं बैठ गया। मीरा मेरे सामने बैठी और उसने ताला मेज़ पर रखकर उसे चारों तरफ़ से देखा।
"इस पर बाहर से कुछ नहीं लिखा," उसने कहा। "सिर्फ़ निशान।"
"ताले पर नाम नहीं लिखते," मैंने कहा। "नाम लिखो तो चोर को पता चल जाता है कि किसका ताला है।"
"अरे वाह," मीरा ने कहा, "तू आजकल दार्शनिक भी हो गया है।"
"भूख लगी है न, इसलिए।"
उसने ताला उठाया, हिलाया और कान के पास ले गई। फिर उसने उसे दूर कर दिया, जैसे चीज़ गरम हो।
"अंकुश —"
"क्या?"
"इसके अंदर से आवाज़ आती है।" उसकी आवाज़ धीमी थी। "जैसे कुछ खिसकता है। हल्का-हल्का।"
"ज़ंग होगी।"
"ज़ंग ऐसे नहीं खिसकती।"
मैंने ताला उससे लिया और कान लगाया।
पहले तो कुछ नहीं सुनाई दिया। सिर्फ़ अपनी ही नाड़ी सुनाई दी — कान में जब चीज़ दबाओ तो अपनी नाड़ी सुनाई देती है, यह सबको पता है। पर फिर, उस नाड़ी के पीछे, कुछ और था।
बहुत धीमी, बहुत सभ्य दस्तकें। जैसे कोई दरवाज़ा खटखटा रहा हो और जल्दी में न हो।
मैंने ताला मेज़ पर रख दिया।
"मीरा।"
"हाँ।"
"तूने पढ़ा था न, काग़ज़ पर? ताला खोलना है, तो पहले वही रिश्ता जोड़ो जो तुमने खुद तोड़ा था।"
"हाँ।"
"तो सवाल यह है," मैंने कहा, "मैंने कौन सा रिश्ता खुद तोड़ा?"
मीरा ने कॉपी खोली, पन्ना पलटा और उस पर पेंसिल से लिखा हुआ शब्द दिखाया।
भाई।
"ये किसने लिखा?" उसने पूछा।
"यही तो मैं सोच रहा हूँ। रात को कॉपी खुली थी, सुबह ये लिखा मिला, और फ़र्श पर एक पैर का निशान नहीं था।"
"यानी कोई ऐसा आया जिसके पैर नहीं छूटते।"
"या कोई ऐसा आया जो हमारे बीच से ही आया।"
मीरा ने मुझे देखा। उसके चेहरे पर वो भाव आया जो आता है जब कोई कुछ समझ जाता है और समझकर भी नहीं कहना चाहता।
"अंकुश, तेरे कोई भाई है?"
"मैंने कभी नहीं सोचा।" मैंने सच कहा। "माँ-पापा ने कभी नहीं कहा। काजल है, बस।"
"तो फिर बक्सा क्यों कहेगा कि भाई आ गया?"
मैं कुछ देर चुप बैठा रहा। शबनम आपा ने दूसरी चाय बनाई और मेरे आगे रखी।
"उस्ताद अली बक्श ने एक बात कही थी," मैंने धीमे से कहा। "जो कहे कि वो भाई है, उससे पूछना — तुमने माफ़ी कब माँगी थी, और किससे?"
"तो पूछना पड़ेगा।"
"पूछूँगा।" मैंने ताला जेब में रखा। "पर पहले एक चीज़ साफ़ करनी है।"
"क्या?"
"मैंने खुद किससे बोलना बंद किया था?"
और फिर मुझे याद आया। वो शाम। वो शाम जब पापा ने बताया था कि अंगूठा उन्होंने लगाया था, वो डर के मारे, माँ की दवा के लिए। मैंने उस दिन पापा से बोलना बंद कर दिया था। पूरे बारह दिन। घर में रहता था, खाता था, उनके सामने से गुज़रता था, और आँख नहीं मिलाता था। और जब बोला था, तो पहली बात यही कही थी — "आपने मुझे क्यों नहीं बताया?"
यही रिश्ता था। यही वो रिश्ता था जो मैंने खुद तोड़ा था।
और मुझे पता था कि वो अभी भी पूरा नहीं जुड़ा है। हम दोनों एक ही घर में रहते थे, एक ही चूल्हे का खाना खाते थे, पर बीच में एक काँच की दीवार थी, पतली, साफ़, जिस पर कुरेदने की इजाज़त नहीं थी।
"मीरा," मैंने कहा, "अगर ताले में मेरी पहली याद है, तो उसे याद रखने वाला कौन है?"
"तू।"
"नहीं।" मैंने सिर हिलाया। "याद हमेशा दो के बीच होती है। अकेले आदमी की कोई याद नहीं होती। वो बस हिसाब होता है। याद तब बनती है जब कोई दूसरा उसे याद रखे।"
मीरा ने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपनी कॉपी में कुछ लिखा और कॉपी बंद कर दी।
तभी घंटी बजी।
मैंने जेब से निकाली। वो बर्फ जैसी ठंडी नहीं थी। वो गरम थी, पर आवाज़ बहुत धीमी, बहुत दूर से आ रही थी, जैसे कोई बूढ़ा आदमी आख़िरी बात कह रहा हो और उसकी साँस कम पड़ रही हो।
"क्या कहा?" मीरा ने पूछा।
मैंने कान लगाया।
और मैंने सुना — "अब खेल पूरा होगा।"
सिर्फ़ चार शब्द।
न मज़ाक, न चेतावनी, न सलाह। बस इतना — अब खेल पूरा होगा। जैसे कोई पुराना हिसाब आख़िरी पन्ने पर पहुँच गया हो और वो पन्ना खुद पलट रहा हो।
"क्या कहा?" मीरा ने फिर पूछा।
"कहा कि अब खेल पूरा होगा।"
"ये अच्छी बात है या बुरी?"
"दोनों," मैंने कहा। "जब खेल पूरा होता है, तो हारने वाले को भी पता चल जाता है कि वो हारा है। और जीतने वाले को भी। बीच में लटकना सबसे बुरा होता है।"
मैंने जेब में हाथ डाला और ताला निकाला। उसे दोनों हाथों से पकड़ा। वो भारी था, और ठंडा नहीं था — वो गुनगुना था, जैसे किसी के हाथ से अभी रखा गया हो।
"सुन," मैंने ताले से कहा। मैं जानता हूँ, ताले से बात करना पागलपन है। पर मैंने बात की। "मुझे नहीं पता तू किसकी याद रख रहा है। मुझे यह भी नहीं पता कि वो याद मेरी है भी या नहीं। पर मैं तुझे बता दूँ — जिसने तुझे भेजा है, वो समझता है कि याद तालों में बंद होती है।"
मैंने ताला मेज़ पर रखा।
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