The Mysterious Bell – Chapter 1097
"जिसका नाम है, वो ले जाए।" बबलू के आदमियों ने यही कहा था। "और जो नहीं ले जाएगा, उसका नाम खुद उतार दिया जाएगा।"
मैं हँसा। सच में हँसा। और मेरी हँसी सुनकर सब चौंक गए, जैसे किसी ने मरघट में बाजा बजा दिया हो।
"देखो," मैंने कहा, "ये तो अच्छी बात है। मेरा नाम मिटाने का ज़िम्मा उन्होंने अपने ऊपर लिया है। मैं तो डर रहा था कि मुझे खुद करना पड़ेगा।"
कोई नहीं हँसा।
"अंकुश," मीरा ने कहा। वो मेरे पीछे खड़ी थी, कैमरा बंद, हाथ में सिर्फ़ कॉपी। "अंदर देखना है?"
"देखना है।"
"तो दुकान में ले चल। यहाँ सबके सामने नहीं।"
"नहीं।" मैंने कहा। "यहीं। अगर मैं इसे अकेले ले जाकर खोलूँगा, तो कल सब कहेंगे कि अंदर क्या था, पता नहीं। सबके सामने खुलेगा।"
शबनम आपा ने पहली बार कुछ कहा।
"मेज़ लाओ," उन्होंने कहा। "मेरी गुमटी की मेज़। बड़ी है।"
भोला भाई और रमेश भाई ने मिलकर मेज़ उठाई और बक्से के आगे रख दी। मैंने टिंकू से कहा कि वो अपनी माँ को बुला लाए, क्योंकि जो भी होने वाला था, वो अकेले नहीं देखना चाहता था।
और तभी पापा आए।
वो धीरे आए, सीधे नहीं। पीपल की छाया से निकलकर, दीवार के साथ-साथ, जैसे किसी की नज़र से बचकर आ रहे हों। उनके हाथ में कुछ नहीं था। यही सबसे डरावनी बात थी। पापा के हाथ में हमेशा कोई औज़ार होता है। उस दिन खाली थे।
उन्होंने बक्से को देखा। फिर नाम को देखा। फिर मेरी तरफ़ देखा।
"यह ताला —" उन्होंने धीमे से कहा, और रुक गए।
"कौन सा ताला, पापा? बक्सा अभी बंद है।"
वो नहीं बोले। उन्होंने होंठ कसे और वहीं खड़े रहे, बक्से से तीन कदम दूर, जैसे उन्हें भी अंदर जाने की इजाज़त नहीं थी।
मैंने बक्से का ढक्कन उठाया।
भारी था। मुझे लगा कि अंदर ईंटें भरी होंगी। पर अंदर ईंटें नहीं थीं। अंदर कुछ और था, और वो कुछ ऐसा था कि गली की सारी हवा एक झटके में रुक गई।
अंदर, एक मैले पीले कपड़े पर, एक ताला रखा था।
मोटा, काला, ज़ंग लगा हुआ। उसका कुंडा मोटा था, बीच में एक जगह चपटा, और उस चपटी जगह पर खुरचकर बनाया गया वही निशान — दो लकीरें और बीच में एक बिंदु।
मैंने ताला उठाया।
हाथ में लिया, तो वो मेरी हथेली में बैठ गया, जैसे उसे वहाँ बैठने की आदत हो।
मैं उसे पहचानता था।
मैं उसे बहुत अच्छी तरह पहचानता था।
यह वही ताला था जो पापा के पुराने संदूक पर लगा था। वो संदूक, जिसकी रस्सी कटी मिली थी, जिसका ताला खुला पड़ा था और जिसके अंदर की चीज़ें बिखरी हुई थीं। और फिर एक दिन वो ताला गायब हो गया था। पापा ने उसके बारे में कभी एक शब्द नहीं कहा। मैंने पूछा भी नहीं। मुझे लगा कि टूट गया होगा, कहीं गिर गया होगा।
मेरी आँखें भर आईं।
मैं झूठ नहीं बोलूँगा। मेरी आँखें भर आईं, बहुत भर आईं। गला भर गया, और एक पल के लिए मुझे अपना ही चेहरा नहीं सूझा। मैंने सोचा कि अगर मैंने एक बार पलक झपकाई, तो सब बह जाएगा, और सब देख रहे हैं।
तो मैंने बक्से की तरफ़ देखा और कहा —
"अरे वाह। ताला भेज दिया, चाबी भूल गए। बड़े लोग भी न, इतने बड़े कारोबार में, और इतनी छोटी भूल। मुझे तो उनसे यही उम्मीद थी कि चाबी भेजेंगे चाबी के साथ, और साथ में एक पर्ची — बेटा, चलो माफ़ करो।"
भोला भाई ने होंठ दबाकर हँसी रोकी। नसीमा बाई ने हँसा भी और तुरंत मुँह फेर लिया।
पर मेरे हाथ काँप रहे थे और मेरा दिल एक अजीब सी बात कह रहा था — "पहली याद।"
अंदर कपड़े के नीचे एक और चीज़ थी। एक मोटा काग़ज़, चार तह किया हुआ, ऊपर से मोहर की तरह दबा हुआ। मैंने उसे उठाया और पीली लालटेन की रोशनी में खोला।
काग़ज़ पर लिखाई मोटी थी, गहरी नीली स्याही, साफ़-सुथरी। जैसे किसी अच्छे स्कूल में पढ़े हुए आदमी की लिखाई हो, जिसने बहुत सारी किताबें पढ़ी हों और बहुत सारे लोगों के दस्तख़त लिए हों।
मैंने ज़ोर से पढ़ा, ताकि सब सुनें।
"अंकुश यादव, अब तक तुमने मुझे आधा समझा, और आधी ताक़त से शिकस्त दी। अब वैसा नहीं होगा। अब मैं पूरी ताक़त से खेलूँगा। मुझे तुम्हारी मरम्मतों की ज़रूरत उतनी ही है जितनी तुम्हें मेरे टूटने की। तुम्हारी पहली याद, जो तुम्हें सबसे प्यारी है, इस ताले के अंदर रहेगी। तुम उसे महसूस करोगे, पर देख नहीं पाओगे।"
मैं रुक गया। काग़ज़ के नीचे कुछ और लिखा था, पर वो पंक्ति अधूरी थी — जैसे लिखने वाले का हाथ बीच में ऊपर उठ गया हो।
गली में सन्नाटा था। एक आवाज़ आई — किसी बूढ़े की खाँसी। और फिर शबनम आपा बोलीं।
"पढ़ आगे।"
"आगे कुछ नहीं है।" मैंने कहा।
"अच्छे से पलट।" मीरा ने कहा।
मैंने काग़ज़ पलटा। पीठ खाली थी। सिर्फ़ एक जगह मोहर का हल्का नीला धब्बा था और उसके ऊपर कोई अक्षर नहीं। मैंने काग़ज़ मीरा को दिया। उसने उसे लालटेन के नीचे लिया, कोने सीधे किए, और फिर उसने मुझे देखा।
"अंकुश, नीचे किनारे पर कुछ है। बहुत छोटा।"
"क्या है?"
"पढ़ रही हूँ।" मीरा ने आँखें सिकोड़ीं। "लिखा है — ताला खोलना है, तो पहले वही रिश्ता जोड़ो जो तुमने खुद तोड़ा था।"
मैंने घंटी जेब में महसूस की। वो ठंडी हो गई थी।
"मैंने कौन सा रिश्ता तोड़ा था?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ मुझे ही अजीब लगी। "मैं तो सब जोड़ता फिरता हूँ। यही तो मेरा रोज़ का काम है।"
"तूने सब जोड़े हैं," मीरा ने कहा। "सबके। हमारे।" उसने उँगली उठाई। "अपना कौन सा जोड़ा?"
पापा ने वहीं, उसी जगह पर, धीरे से साँस ली। मैंने उनकी तरफ़ देखा। वो मेरी तरफ़ नहीं देख रहे थे। वो ताले को देख रहे थे।
"पापा," मैंने कहा, "ये ताला आपके संदूक का है।"
"हाँ।"
"आपने मुझे बताया नहीं कि ये गायब हुआ।"
"तूने भी तो बहुत बातें नहीं बताईं।" उन्होंने धीमे से कहा।
मैं चुप हो गया।
"ये ताला मेरे बाप का था," पापा ने कहा। "दादा जगदीश यादव का। उनका हाथ इतना बड़ा था कि ये ताला उनकी हथेली में छिप जाता था।"
"और अब ये रणवीर के पास से निकला है।" मैंने कहा।
"निकला नहीं," पापा ने कहा। "भेजा है। वो चीज़ें लौटाता है जो उसने ली हों, अंकुश। यह उसकी सबसे बड़ी आदत है। वो लौटाकर अपनी बड़ाई दिखाता है।"
मैंने ताला उठाया, आँख के करीब लाया और उसका निशान देखा — दो लकीरें, बीच में बिंदु। वही निशान जो चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर था, जो घंटी के छल्ले पर था, जो बिजलीघर के बक्से पर खुरचा मिला था।
"मेरी पहली याद," मैंने धीरे से कहा। "मेरी पहली याद कौन सी है?"
किसी ने जवाब नहीं दिया।
"मैं सच में नहीं जानता," मैंने कहा। मैं हँसा, पर इस बार हँसी में कुछ नहीं था। "ये तो मज़ेदार बात है। आदमी अपनी पहली याद नहीं जानता। उसे पता है कि उसने पहली बार कब साइकिल चलाई, पता है कि उसने पहली बार कब झूठ बोला, पता है कि उसके पापा ने पहली बार कब उसके सिर पर हाथ रखा — पर सबसे पहली याद? वो कहाँ गई?"
"वो पहली याद सबसे ज़्यादा छुपी होती है," शबनम आपा ने कहा। उनकी आवाज़ भारी थी। "और सबसे ज़्यादा छुपी चीज़ सबसे ज़्यादा क़ीमती होती है।"
मैंने ताला जेब में डालने के लिए हाथ बढ़ाया, फिर रुक गया, और फिर उसे सीने से लगाकर जेब में रखा। जेब में घंटी भी थी। दोनों एक साथ छुए, तो अजीब सी गरमाहट हुई — जैसे दो पुराने दुश्मन एक ही बस में बैठ गए हों।
तभी दरवाज़े पर लक्ष्मी देवी खड़ी दिखीं।
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