The Mysterious Bell – Chapter 1096
मैं कुर्सी पर बैठ गया। मेज़ पर घंटी, चाबी, सील आदेश की नकल, मंसूर की चाबी की नक़ल, कॉपी। और उस सबके ऊपर वो एक शब्द — भाई।
मैंने घंटी उठाई। गरम नहीं थी। ठंडी भी नहीं। जैसे चुप।
"तू जानती है," मैंने कहा। "तूने वो शब्द देखा। तूने कुछ कहा क्यों नहीं?"
कोई जवाब नहीं।
"मैं अब तेरी आवाज़ नहीं पूछूँगा," मैंने कहा। "मैं एक बात कहूँगा। अगर मैंने सही कहा, तो एक बार बज जाना।"
मैंने घंटी को मेज़ पर रखा और बोला — "मैं जोड़ बंद नहीं करूँगा। और मैं अंधा जोड़ भी नहीं करूँगा। मैं अब हर जोड़ में वो चीज़ डालूँगा जो चोरी नहीं हो सकती।"
घंटी नहीं बजी।
मैंने उसे और ध्यान से देखा। मेरी ग़लती नहीं थी — मैंने कुछ कम कहा था।
मैंने गहरी साँस ली और कहा — "और मैं उसे दिखाऊँगा कि उसका हिस्सा उसी का नहीं है। मैं उसका हिसाब खुद बोलूँगा।"
घंटी बजी।
एक बार। हल्की। और फिर उसकी सतह पर, पुराने दो लकीर-बिंदु वाले निशान के नीचे, एक नई रेखा उभरी — बहुत पतली, जैसे कुछ गरम चीज़ ठंडी होकर जम गई हो।
मैंने उसे देखा, पर नाम नहीं पूछा।
नाम पूछने का वक़्त नहीं था। काम का वक़्त था।
मैंने कॉपी खोली और एक नया पन्ना लिया। उस पर सिर्फ़ तीन लाइनें लिखीं। पहली — हर जोड़ में वो चीज़ डालें जो चोरी न हो सके। दूसरी — हर जोड़ के बाद उसका हिसाब खुले में लिखें, सबके सामने। और तीसरी, सबसे नीचे, छोटे अक्षरों में, मैंने उसी शब्द को दोबारा लिखा, पर इस बार मैंने उसके आगे कुछ जोड़ दिया —
भाई — वो सवाल जो मैं पूछूँगा।
मैंने कलम रखी और कुर्सी पीछे सरका दी।
बाहर गली में शबनम आपा की गुमटी की लालटेन अभी जल रही थी। पीपल की छाया लंबी थी। किसी ने रात की चाय की आवाज़ दूर से आई — कुल्हड़ की खनक। मेरा शरीर पहली बार दिन भर बाद हल्का लगा।
और तभी।
बाहर से दौड़ते हुए पैरों की आवाज़ आई।
नंगे पैर नहीं। चप्पल थी। पर चप्पल की आवाज़ बहुत तेज़ थी, और उसके साथ साँस फूलने की आवाज़। मैंने शटर की तरफ़ देखा।
एक हाथ शटर पर पड़ा और ज़ोर से ऊपर उठाया। मैंने कभी नहीं सोचा था कि शबनम आपा शटर उठा सकती हैं।
वो अंदर आईं। उनका मुँह खुला था, साँस लेने की जगह नहीं मिल रही थी, माथे पर चंदन पसीने से बह गया था और साड़ी का पल्लू कंधे से गिरा था।
"आपा —" मैंने उठते हुए कहा, "क्या हुआ? आप क्यों —"
"काजल —" उन्होंने हाँफते हुए कहा, "काजल — वो अस्पताल से आई थी। वो —"
"काजल ठीक है?"
"ठीक है। ठीक है। पर —" उन्होंने एक हाथ सीने पर रखा और दीवार पकड़कर खड़ी रहीं।
"आपा, बैठिए —"
"नहीं!" उनकी आवाज़ तेज़ हो गई, फिर अगले ही पल धीमी। "अंकुश, सुन।"
वो मेरी तरफ़ उठीं। उनकी आँखों में आँसू नहीं थे, पर उस तरह चमक रही थीं जैसे पुरानी लालटेन में तेल खत्म होने से पहले चमकती है।
"गुमटी पर चार बजे वाला टेम्पो नहीं आया," उन्होंने कहा। "का तो नहीं आया। पर — भारद्वाज भवन से एक नीला टेम्पो आया। और उस पर एक काला बक्सा था।"
मैं रुक गया।
"काला बक्सा?"
"हाँ। मोटा। लोहे जैसा। ऊपर से कपड़ा। दो आदमी थे।" उन्होंने साँस ली। "और वो बक्सा उन्होंने मेरी गुमटी के सामने उतार दिया। रास्ते में नहीं। मेरी गुमटी के सामने। और उस पर —"
वो रुकीं।
"उस पर क्या?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और मुझे लगा कि वो जो कहने जा रही हैं, वो वो खुद भी नहीं कहना चाहतीं।
"उस पर तेरा नाम है।" उनकी आवाज़ फूटी। "अंकुश यादव। पूरा नाम। मेरे गुमटी के सामने। सबके सामने।"
मेरी हथेली में घंटी अचानक गरम हुई, इतनी गरम कि मैंने इसे मेज़ पर गिरा दिया।
वो टन-टन बजी। और जब बजी, तो मुझे साफ़ सुना — बहुत धीमा, बहुत दूर से —
"वो नाम माँगता है।"
शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखा। उन्हें नहीं सुनाई दिया था। वो बस खड़ी थीं, दीवार पकड़े, साँस ले रही थीं।
मैंने घंटी उठाई, जेब में डाली, और शटर की तरफ़ बढ़ा।
"अंकुश —" शबनम आपा ने कहा, "वो कह रहे थे —"
"क्या कह रहे थे?"
उन्होंने होंठ कसे।
"वो कह रहे थे — जिसका नाम है, वो ले जाए। और जो नहीं ले जाएगा, उसका नाम वो खुद उतार देगा।"
मैं शटर के नीचे से बाहर निकला। गली में हवा थी। पीपल की छाया में चबूतरी खाली थी। और गुमटी के सामने — पीली लालटेन की रोशनी में — बड़ा, मोटा, काला बक्सा खड़ा था।
उस पर सफ़ेद पेंट से मेरा पूरा नाम लिखा था।
और उसके बगल में, बक्से से थोड़ी दूर, एक आवाज़ आई। किसी ने कहा — "अंकुश भैया।"
मैंने घूमकर देखा।
टिंकू था। उसके हाथ में रोटी का टिफ़िन था। उसने मेरी आवाज़ सुनकर रास्ते से ही पुकार दिया था। और मुझे लगा कि उसने अभी कुछ और देखा है, क्योंकि उसके हाथ का टिफ़िन काँप रहा था।
"क्या हुआ?" मैंने कहा।
"वो —" टिंकू ने उँगली उठाई — "वो बक्सा अभी बोला।"
"क्या बोला?"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।
"उसने तुम्हारा नाम लिया," उसने कहा, "और फिर कहा — भाई आ गया।"
मैंने घंटी निकाली। वो गरम थी, और बज रही थी, बिना रुके, बहुत धीमी, बहुत दूर से — जैसे कोई पुराना दरवाज़ा अंदर से खुल रहा हो।
॥
गुमटी के सामने वो बक्सा खड़ा था। काले लोहे जैसा मोटा, ऊपर से कपड़ा लिपटा हुआ, नीचे लकड़ी के दो फट्टे, और उस पर सफ़ेद पेंट से मेरा नाम।
अंकुश यादव।
पूरा नाम। जैसे स्कूल की हाज़िरी वाली कॉपी पर लिखते हैं। कोई मुहर नहीं, कोई तारीख़ नहीं, कोई पता नहीं। सिर्फ़ नाम। जैसे किसी ने कहा हो — बाकी बातें तू खुद समझ ले, तू तो समझता ही है।
टिंकू मेरे पास आ गया था और उसके हाथ में रोटी का टिफ़िन था। उसने टिफ़िन मेरे हाथ में दे दिया, जैसे अब उसके पास पकड़ने को कुछ और रह गया हो।
"अंकुश भैया, मैंने सच सुना।" उसकी आवाज़ छोटी हो गई थी। "बक्सा बोला था। धीरे से नहीं, साफ़ बोला था।"
"क्या बोला?"
"पहले तुम्हारा नाम लिया। फिर कहा — भाई आ गया।"
मैंने घंटी जेब से निकाली। वो गरम थी, पर आवाज़ नहीं कर रही थी। बस हल्की-हल्की काँप रही थी, जैसे बूढ़े हाथ काँपते हैं।
शबनम आपा गुमटी के दरवाज़े पर खड़ी थीं, दोनों हाथ से चौखट पकड़े। उनके माथे से चंदन पसीने के साथ बह गया था और चिमटी उनके हाथ में थी, पर उस वक़्त चिमटी हथियार नहीं लग रही थी। लकड़ी का एक टुकड़ा लग रही थी।
गली से लोग आने लगे। भोला भाई चप्पल घसीटते आए, नसीमा बाई साड़ी का पल्लू सँभालती आईं, किशनलाल काका की दुकान का ताला अधूरा लगा रह गया था। कोई भी बक्से के करीब नहीं आ रहा था। सब दूर से देख रहे थे। जैसे बक्सा नहीं, कोई बीमार आदमी बैठा हो।
"अंकुश," भोला भाई ने कहा, "इसे यहाँ से हटा। ये मेरी दुकान के सामने है।"
"भोला भाई, आपकी दुकान वहाँ है।" मैंने उँगली से इशारा किया। "ये गुमटी के सामने है।"
"तो गुमटी से हटवा।"
शबनम आपा ने कुछ नहीं कहा। वो बस मेरी तरफ़ देख रही थीं।
मैंने बक्से के चारों तरफ़ एक चक्कर लगाया। उस पर कहीं कोई मोहर नहीं थी। कोई भारद्वाज कंस्ट्रक्शन का निशान नहीं। कोई नंबर नहीं। सिर्फ़ मेरा नाम, और उस नाम के नीचे एक छोटा सा गोल निशान जो अधूरा था — जैसे कोई मोहर लगाई गई हो और फिर उसे पोंछ दिया गया हो।
मैंने हाथ लगाया। बक्सा ठंडा था। इतना ठंडा कि हथेली चिपक गई।
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