The Mysterious Bell – Chapter 1095
"क्योंकि कल तुमने रणवीर की बात सुनी। कि कल तुम्हारे पास कुछ आएगा। और जब आएगा, तुम उसे नकार दोगे।"
"आपको कैसे पता?"
"मुझे पता है कि तुम मुझे क्या बताओगे," उन्होंने कहा। "तुम कहोगे — मैं उसे पहचान लूँगा। और मैं तुम्हें बताने आया हूँ कि पहचानना ही सब कुछ नहीं होता। पहचानने के बाद तुम क्या करते हो — वो ज़रूरी है।"
मैंने घंटी को देखा। वो मेज़ पर पड़ी थी, ठंडी।
"तो हल क्या है?" मैंने पूछा। "मैं जोड़ना बंद कर दूँ?"
"नहीं।"
"तो जोड़ता रहूँ, और वो बड़ा होता रहे? उसका बक्सा भरता रहे, और मेरा हिसाब खाली होता रहे?"
"नहीं।" उस्ताद ने मेज़ पर झुकते हुए कहा, "अंधा जोड़ना भी हल नहीं है। और डरकर जोड़ना तो बिलकुल नहीं।"
"तो फिर क्या?"
उन्होंने सीधे मेरी आँखों में देखा।
"जोड़ ऐसा हो कि ऊर्जा चुराने वाला डर जाए।"
मैंने साँस रोक ली।
"मतलब?"
"मतलब यह —" उन्होंने उँगली मेज़ पर रखी, जैसे कोई नाप ले रहे हों। "वो चोरी करता है, और चोरी उसे ताक़त देती है। पर उसे चोरी छुपकर करनी पड़ती है। क्यों? क्योंकि जिस दिन वो खुले में आ जाएगी, उस दिन वो चोरी नहीं रहेगी। वो मज़ाक बन जाएगी। और जिस चीज़ का लोग मज़ाक बना दें, वो किसी को डरा नहीं सकती।"
मैं कुर्सी पर पीछे झुका। मेरे पेट में कुछ हिला — जैसे कोई पुराना ताला अंदर से घूम गया हो।
"आप कह रहे हैं कि मुझे चोरी छुपाने के बजाय उसे दिखाना चाहिए," मैंने कहा। "हर जगह। हर सभा में। हर काग़ज़ में। हर नोटिस में।"
"हाँ।"
"पर वो और गुस्सा होगा। वो और टूटेगा। वो —"
"वो और मज़बूत होगा," उस्ताद ने कहा। "पर जिस दिन पूरी गली उसकी चोरी को जान जाएगी, तब वो जोड़ने के बजाय बचाने में लगेगी। और जब लोग बचाने में लगेंगे, तब चोरी छुपाने की जगह नहीं रहेगी।"
"पर यह तो रास्ता लंबा है।"
"हाँ।" उन्होंने सिर हिलाया। "यह रास्ता लंबा है। और यही रास्ता है।"
मैंने कुछ देर सोचा। मेरे अंदर एक आवाज़ कह रही थी कि उस्ताद का रास्ता सही है, पर उसमें एक कमज़ोरी है — वो चोरी छुपाने वाले को खुद बता रहे थे कि मैं तुझे उघाड़ने जा रहा हूँ। और जो आदमी रणवीर है, वो इतना सीधा खड़ा नहीं रहेगा।
"उस्ताद," मैंने कहा, "आपने अपनी बात पूरी नहीं कही।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"आपने कहा — जोड़ ऐसा हो कि चुराने वाला डरे। पर आपने यह नहीं बताया कि उसे डरना चाहिए वो चोरी। क्योंकि जो चोरी छुपकर होती है, वो कहीं से भी आ सकती है। और जो खुले में हो जाए, वो और जगह छुपाने लगती है।"
उस्ताद कुछ देर मेरी तरफ़ देखते रहे। फिर उन्होंने धीमे से कहा — "अब तुम पचास साल पहले वाले मुझसे बात नहीं कर रहे। तुम अपने आज से बात कर रहे हो।"
"मैं बात कर रहा हूँ उस चीज़ से," मैंने कहा, "जो मेरे जोड़ का आधा हिस्सा खा रही है।"
वो खामोश हुए।
फिर मैंने घंटी उठाई और उसे अपनी हथेली में रखा। वो ठंडी थी। बर्फ़ जैसी नहीं, पर ठंडी।
"मुझे अब समझ आ रहा है," मैंने कहा। "मैं जोड़ बंद कर दूँ — तब भी वो खाएगा, क्योंकि टूटे रिश्ते भी उसे खिलाते हैं। और मैं जोड़ता रहूँ, तब भी वो खाएगा। दोनों में मैं हार रहा हूँ।"
"हाँ।"
"तो फिर मुझे जोड़ के अंदर ही कुछ बदलना होगा," मैंने कहा। "मुझे ऐसा जोड़ बनाना होगा जिसमें वो हिस्सा ले ही न सके।"
उस्ताद ने सिर हिलाया।
"और वो कैसे होगा?" मैंने पूछा।
"अगर मुझे पता होता," उन्होंने कहा, "तो मैं पचास साल यहाँ नहीं बैठा होता।"
मैं मुस्कुराया। पहली बार उस रात।
"तो मैं क्या करूँ?"
"तुम वो करो जो मैं नहीं कर सका," उन्होंने कहा। "तुम अपने जोड़ में उसे खुद बताओ कि तुम जानते हो वो हिस्सा लेता है। और तुम उसी वक़्त यह भी कहो कि तुम उसे उस हिस्से से ज़्यादा कुछ दे रहे हो — जो उसके पास नहीं है।"
"क्या?"
"याद," उस्ताद ने कहा। "जो चीज़ मैंने दी है। जो चीज़ तुम देते हो — माफ़ी, भरोसा, दो लोगों का जुड़ना। उसका कोई रूप नहीं है। उसे कोई पकड़ नहीं सकता। उसे कोई बेच नहीं सकता। और उसे खाया नहीं जा सकता, अंकुश। पर उसका असर — वो रणवीर के बक्से में नहीं जाता। वो उस दो आदमियों के बीच रहता है, जिन्होंने माफ़ी माँगी। और वो उस घर की दीवार में उतर जाता है। और वो उनके बच्चों के हाथ में चला जाता है।"
उन्होंने मेज़ पर हाथ रखा।
"तुम्हारे जोड़ से जो आधा जाता है, वो जाता है। पर तुम जो जोड़ते हो, उसका असली फल तुम्हारे ही लोगों के अंदर रह जाता है। और वो फल — वो कभी नहीं चोरी हो सकता।"
मैंने घंटी को हथेली में दबाया।
"तो मैं उसे चोरी पर थोड़ा कम रखूँ," मैंने कहा, "और जोड़ पर थोड़ा ज़्यादा।"
"नहीं।" उन्होंने सिर हिलाया। "तुम उसे कम नहीं कर सकते। तुम उसे यह दिखा सकते हो कि वो जो चुरा रहा है, वो कभी उसका नहीं होगा। और जो चीज़ कभी उसकी हो नहीं सकती — वो क्यों चुराएगा? एक बार, दो बार, सौ बार। पर एक दिन वो रुक जाएगा, क्योंकि चोरी का मज़ा तब है जब चुराई हुई चीज़ काम आए। जो चीज़ काम न आए, उसे चुराने में क्या मज़ा?"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"तो हल यह है," मैंने कहा, "कि मैं उसे चोरी करने दूँ, पर चुराई हुई चीज़ उसके काम की न रहने दूँ।"
"हाँ।" उस्ताद ने धीरे से कहा, "यह हल है।"
वो उठने को हुए। फिर रुक गए।
"अंकुश।"
"हाँ?"
"आज रात मैंने तुमसे जो कहा, वो मैंने इलियास के बाद पहली बार किसी से कहा है।" उन्होंने चश्मा उठाया। "पचास साल में।"
मैंने कुछ नहीं कहा। क्योंकि कुछ कहना छोटा लगता।
उन्होंने चश्मा पहना। फिर मेज़ पर पड़ी कॉपी की तरफ़ देखा, और उनकी आँखें उस अधूरी लाइन पर रुक गईं।
"भाई," उन्होंने पढ़ा। फिर मुझसे पूछा, "तुमने लिखा?"
"नहीं।"
"और तुम इसे देखकर पूछ रहे थे कि कौन।"
"हाँ।"
उस्ताद ने कुछ देर सोचा।
"भाई," उन्होंने दोहराया। "अगर यह कोई बाहर वाला लिख गया होता, तो वो कहता — तेरा भाई। पर उसने सिर्फ़ भाई लिखा। बिना तेरा के। बिना मेरा के।"
मैंने कॉपी की तरफ़ देखा।
"मतलब वो कह रहा है — भाई," मैंने कहा। "किसका भाई? मेरा? उसका? किसी और का?"
"मतलब वो यह कह रहा है," उस्ताद ने कहा, "कि भाई जैसा कोई है। और वो कहीं है। और वो तुम्हें बता रहा है कि वो आ रहा है।"
मेरी हथेली में घंटी हल्की गरम हुई।
बहुत हल्की। जैसे किसी ने मेरे कान में बहुत धीरे से कहा हो और मैंने सुना न हो, सिर्फ़ महसूस किया हो।
"उस्ताद," मैंने कहा, "कल जो आएगा — वो अगर सच में मेरा कोई है, तो क्या मैं उसे पहचान पाऊँगा?"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था जो आज पहली बार साफ़ था — डर नहीं। बहुत पुराना दर्द, जो अब सिर्फ़ याद बन गया है।
"तुम पहचान लोगे," उन्होंने कहा। "पर असली सवाल यह है —
क्या वो तुम्हें पहचानेगा?"
वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़े। शटर उठाया। बाहर पीली रोशनी थी। उन्होंने एक क़दम बाहर रखा, फिर पलटे।
"एक बात और, अंकुश।"
"हाँ।"
"जब तुम इलियास से मिलो —" वो रुके। मेरी तरफ़ नहीं देखा। बाहर देखा। "जब तुम किसी से मिलो जो कहे कि वो तुम्हारा भाई है, तो उससे एक ही सवाल पूछना।"
"क्या?"
"पूछना — तुमने माफ़ी कब माँगी थी, और किससे?"
वो चले गए।
शटर मैंने धीरे से नीचे किया। आधा। क्योंकि पूरा बंद करने का मन नहीं था।
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