The Mysterious Bell – Chapter 1093
वो आवाज़ मैं पहचानता हूँ। गली में गाड़ियाँ नहीं आतीं। जो गाड़ियाँ आती हैं, वो या तो खाँसती हैं — जैसे भैरों काका का पुराना टेम्पो — या बिलकुल चुपचाप आती हैं, जैसे कई बीमारियाँ आती हैं।
सफ़ेद गाड़ी दुकान के बाहर रुकी।
उसने हॉर्न नहीं बजाया। उसने धूल नहीं उड़ाई। वो बस आई और रुक गई, जैसे उसे पता हो कि मैं उसका इंतज़ार कर रहा था।
मैं कुर्सी से उठा नहीं।
मैंने पेन रख दी।
गाड़ी का शीशा धीरे से नीचे होने लगा। मुझे वो आवाज़ सुनाई दी — खिसकने की हल्की, चिकनी आवाज़, और मुझे पीछे से एक बार फिर चबूतरी दिखी जहाँ बबलू पान चबाकर बैठता था, और उसका पान का गीला दाग़ — जो एपिसोड के अंत में धूप में सूख रहा था, पर सूखा नहीं था। कुछ दाग़ ऐसे ही होते हैं। सूखते भी नहीं, और मिटते भी नहीं।
खिड़की के भीतर से आवाज़ आई।
वो आवाज़ मीठी थी। और उस मिठास में वो बात थी जो शहद में भी नहीं होती — यह पता होने का एहसास कि सामने वाला तुम्हारे बारे में कुछ जानता है जो तुम खुद नहीं जानते।
"अंकुश यादव।"
मैं खिड़की के पास गया। बाहर सड़क पर गाड़ी, और उसके भीतर बैठा आदमी। मैंने उसका चेहरा पूरा नहीं देखा। मैंने सिर्फ़ उसकी आस्तीन देखी, सफ़ेद। और उसकी उँगली, जिस पर पुरानी काली अंगूठी नहीं थी — उसकी जगह एक पतला चमकता धागा था, जैसे किसी ने अंगूठी उतारकर धागा बाँध लिया हो।
"कल तेरे पास एक तोहफ़ा आएगा," उसने कहा।
मैंने कुछ नहीं कहा।
"और तू नहीं समझेगा कि वो तेरा ही है," उसने कहा। "तू उसे सौदा समझेगा। या धमकी। या चाल। तू उसे खोलेगा, देखेगा, और अपने लोगों से कहेगा — यह हमारे काम का नहीं।"
"तो तुम क्यों बता रहे हो?"
वो हँसा। हँसी हल्की थी, और उस हँसी में मुझे रात की वो आवाज़ सुनाई दी — तीन टन की आवाज़, दीवार के पीछे से, बंद मुट्ठी में पकड़ी घंटी जैसी।
"क्योंकि मुझे तेरे सामने यह कहने में मज़ा आता है," उसने कहा। "कि तू जो सबसे ज़्यादा ढूँढ रहा है, वो तेरे पास आ रहा है। और जब वो आएगा, तू उसे पहचान नहीं पाएगा।"
"अगर नहीं पहचानूँगा," मैंने कहा, "तो मुझे क्या करना है?"
"कुछ भी नहीं," उसने कहा। "बस इतना कि उसे नकार मत देना। और मुझे लगता है, तू नकार देगा। क्योंकि तू अब भी सोचता है कि तू वो सब अपने हाथ से ठीक कर सकता है।"
मैंने जेब में घंटी को महसूस किया। वो गरम हो रही थी।
"मेरे पास घंटी है," मैंने कहा। "और मेरे पास गली है। और मेरे पास एक लड़का है जिसने आज सुबह कहा कि वो शहर चला जाएगा, क्योंकि एक ठेकेदार को उसका नाम सूची में नहीं चाहिए। इससे बता देता हूँ — तुम्हारे पास जो कुछ भी है, वो मेरे हिस्से का है। और मैं उसे लेने आऊँगा। तोहफ़े की तरह नहीं। हिसाब की तरह।"
वो फिर हँसा।
"तभी तो," उसने कहा, "मैं उसे तोहफ़ा कहकर भेज रहा हूँ।"
खिड़की चढ़ने लगी।
और उसके बंद होने से पहले, बहुत धीरे, मैंने उसकी आख़िरी बात सुनी। वो मुझसे नहीं कही गई थी। वो शायद उसके भीतर किसी से कही गई थी, या ख़ुद से, या उस चीज़ से जो उसके साथ बैठी थी और जिसे मैं नहीं देख सका।
"जो तेरा है," उसने कहा, "वो तेरे पास ही रहे, तो किसका फ़ायदा?"
गाड़ी चली गई।
धूल उसके पीछे उठी और फिर बैठ गई, और गली वैसी ही हो गई जैसी थी — सिवाय इसके कि अब मैं जानता था कि अगली सुबह तक कुछ आने वाला है, और वो कुछ नया नहीं होगा।
मैं दुकान के अंदर गया और कुर्सी पर बैठ गया।
कुछ देर बाद मीरा आई। उसने कुछ नहीं पूछा। वो सिर्फ़ मेरे सामने बैठ गई और अपनी कॉपी खोली, और मेरी तरफ़ देखा, जैसे कहे — बोल।
"कल कोई चीज़ आएगी," मैंने कहा।
"क्या?"
"वो नहीं बताया। बस कहा कि वो मेरी ही है और मैं उसे पहचान नहीं पाऊँगा।"
मीरा ने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उसने कहा, "अगर वो तेरी ही है, तो तेरी होगी। और अगर तेरी है, तो तू उसे पहचान लेगा। चाहे वो कुछ भी हो। चाहे वो किसी मरे हुए आदमी की आवाज़ हो, या कोई काग़ज़ हो, या —"
"या क्या?"
"या कोई आदमी हो," उसने कहा। "जो आए और कहे कि मैं तेरा भाई हूँ।"
मैं कुछ नहीं बोला।
क्योंकि उस दिन, शाम को, मुझे वो बात समझ नहीं आई थी, पर मेरी हथेली जल रही थी। और जब मैंने घंटी को जेब से निकाला, तो वो सिर्फ़ एक बार बजी और बहुत धीमे, जैसे दूर से, वैसे ही जैसे कोई बंद कमरे में बोल रहा हो —
"अब हिसाब अपने आप बोलेगा।"
मैंने घंटी को मेज़ पर रखा और अपनी कॉपी खोली।
ऊपर माँ का नाम था। उसके नीचे मैंने लिखा — लक्ष्मी देवी, काम बंद। नीचे लिखा — टिंकू, तेरह साल, माँ को अपनी वजह से रोता नहीं देखना चाहता। और उसके नीचे सबसे छोटा, सबसे साफ़ अक्षरों में मैंने लिखा —
कल, दुकान पर, कुछ आएगा।
और मैंने उसके नीचे कलम रोक दी, क्योंकि मुझे नहीं पता था कि आगे क्या लिखना है। और उस अधूरी लाइन को देखते हुए मुझे पता चला कि मेरा हिसाब अब मेरा नहीं रहा। वो उन सबका हो गया है जिनके नाम मैंने उसमें लिखे हैं।
बाहर गली में शबनम आपा की गुमटी की लालटेन जल उठी। पीपल की छाया लंबी हो गई।
और उस पीली रोशनी में, दुकान के शटर पर, मुझे अपने साये के साथ एक दूसरा साया दिखा — छोटा, झुका हुआ, जैसे कोई मेरे पीछे खड़ा होकर मेरे कंधे के ऊपर से मेरी कॉपी देख रहा हो।
मैं पलटा।
कोई नहीं था।
और जब मैंने वापस मुड़कर कॉपी देखी, तो उस अधूरी लाइन के नीचे पेंसिल से कुछ लिखा हुआ था, बहुत छोटे अक्षरों में। मेरी लिखाई नहीं थी।
उस पर सिर्फ़ एक शब्द था।
भाई।
॥
मैं उस शब्द को देखता रहा।
भाई।
छोटे अक्षरों में, पेंसिल से, हल्का-सा झुका हुआ। जैसे किसी ने जल्दी में लिखा हो और फिर तुरंत हाथ खींच लिया हो। मेरी कलम उसके बगल में पड़ी थी, खुली, स्याही सूखी। और मेरा हाथ उस काग़ज़ से चार अंगुल दूर रह गया था, जैसे काग़ज़ ने खुद ही सीमा खींच दी हो।
मैंने पलटकर दुकान देखी।
शटर आधा नीचे था। उसकी दरार से गली की पीली रोशनी आ रही थी — शबनम आपा की गुमटी की लालटेन। पीछे के कमरे का बल्ब गुनगुना रहा था, जैसे कोई उम्रदराज़ आदमी पुरानी चारपाई पर साँस ले रहा हो। ट्रंक, औज़ार, अलमारी, चारपाई, दीवार पर टँगी रिंच — सब अपनी जगह। कोई नहीं था।
मैंने मेज़ के नीचे फ़र्श देखा। धूल थी। उस धूल पर पैर का एक भी निशान नहीं था। बिलकुल नहीं। जैसे किसी ने आकर कॉपी खोली, लिखा, और बिना ज़मीन छुए लौट गया हो।
मैंने होंठों से कहा, किसी से नहीं, खुद से, "ठीक है।"
और मेरी आवाज़ खोखली लगी।
मैंने घंटी उठाई। यह ठंडी थी — पर बर्फ़ जैसी नहीं। जैसे कोई बर्तन आग से उतरने के बाद देर तक अपनी गरमाहट याद रखता है, वैसी ठंडी। मैंने इसे कान के पास नहीं किया। मैंने इसे मेज़ पर वापस रख दिया और उँगली उस शब्द पर रख दी।
स्याही नहीं थी। पेंसिल थी। और पेंसिल की धूल सूखी थी — मतलब यह ज़्यादा पुरानी नहीं थी।
"कौन?" मैंने कहा। पूरी दुकान से। अलमारी से, ट्रंक से, पीछे के अंधेरे से, उस आधे खुले दरवाज़े से जिसके पीछे टॉर्च रखी थी।
कोई जवाब नहीं आया।
मैंने कॉपी बंद कर दी। बंद करके ट्रंक के ऊपर रख दी, उलटी। जैसे अगर मैंने उसे सीधा रखा, तो वो शब्द बढ़ जाएगा। जैसे वो साँस लेने लगेगा।
फिर बाहर से चप्पलों की आवाज़ आई।
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