The Mysterious Bell – Chapter 1092
गली में झाड़ू की आवाज़ रुक गई। पता नहीं किसने रोकी, या शायद मेरे कानों ने ही सुनना बंद कर दिया।
"मामा के यहाँ जाऊँगा," टिंकू ने कहा। आवाज़ साफ़ थी, और यही सबसे बुरी बात थी। अगर वो रोता, तो पता चलता कि वो डरा हुआ है। पर वो नहीं रोया। "वहाँ काम कर लूँगा। भाई के पास रहूँगा। आप अपना काम करो, मैं नहीं चाहता कि —"
"टिंकू," लक्ष्मी देवी ने कहा।
"मैं नहीं चाहता कि आप मेरी वजह से और रोओ," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ पहली बार टूटी।
लक्ष्मी देवी ने अपना हाथ उसकी तरफ़ बढ़ाया और फिर रोक लिया। जैसे उन्हें पता था कि अगर उन्होंने बेटे को छुआ, तो वो फूट पड़ेंगी, और अगर वो फूट पड़ीं, तो सब बिखर जाएगा।
मेरे अंदर कुछ टूटा।
मैं नहीं जानता कि वो क्या था। गुस्सा था, या शर्म, या वो बेचैनी जो तब होती है जब तुम्हारे सामने किसी बच्चे को वो काम करना पड़े जो बड़ों को करना चाहिए था। तेरह साल का लड़का अपनी माँ को यह कह रहा था कि वो चला जाएगा, ताकि माँ की सिलाई बच जाए।
मैं कुछ नहीं बोला।
मैं पलटा और दुकान के अंदर गया। औज़ारों के ट्रंक से मैंने घंटी निकाली। वो हल्की गरम थी। मैंने उसे दोनों हाथों में पकड़ा और उसके ठंडे पीतल को अपनी हथेली की गरमी में ढक लिया।
"सुन," मैंने कहा।
घंटी ने धीमे से कहा — "बोल।"
"सौ अंक की शक्ति," मैंने कहा। "सच्ची ज़ुबान। रणवीर के सामने। मैं उससे सब कुछ कहलवाऊँगा। कोई झूठ नहीं बोलेगा। एक मिनट में उसका सारा सच बाहर आ जाएगा। और फिर गली के सामने, उसके ही मुँह से, वो सब निकलेगा जो बाईस साल से दबा है।"
घंटी चुप रही।
"सुन रही है तू?" मैंने कहा। "मैं तुझसे पूछ रहा हूँ।"
"सुन रही हूँ," घंटी ने कहा। "पर तू चीख़ रहा है।"
"तो सही कह रहा हूँ ना?"
"मैं नहीं बोलती कि सही है या ग़लत। मैं सिर्फ़ ये बोलती हूँ कि अभी तू जो बोल रहा है, वो तेरी आवाज़ नहीं है। ये किसी और की आवाज़ है।"
मैंने घंटी को कसकर पकड़ा और शटर की तरफ़ बढ़ा।
बाहर मीरा खड़ी थी।
वो सुबह-सुबह आई थी, हाथ में काग़ज़, पर काग़ज़ नहीं देख रही थी। मेरी तरफ़ देख रही थी। और उसकी आँखों में वो शक नहीं था जो पहले होता था। उसमें डर था।
"अंकुश," उसने कहा।
"मीरा, हट।"
"नहीं हटूँगी।"
"मीरा —"
"मैंने तेरी घंटी सुनी," उसने कहा। "दरवाज़े के बाहर से सुनी। तूने कहा — सौ अंक की शक्ति।"
"तो?"
"तो तू जानता है उसके साथ क्या जुड़ा है," उसने कहा। "भूल गया? तेरे पास जो सबसे प्यारी याद है, वो पुराने ताले में बंद हो जाएगी। और वो याद तुझे दिखेगी भी नहीं। तुझे सिर्फ़ यह लगेगा कि कुछ खो गया है। कुछ बहुत ज़रूरी। और तू उसे पहचान भी नहीं पाएगा।"
मैं रुक गया।
"मुझे पता है," मैंने कहा।
"तो फिर?"
"तो फिर मुझे यह भी पता है," मैंने कहा, "कि वो अगर बच्चे को शहर भेज रहा है, तो मैं कुछ तो करूँ। तेरे पास कोई तरीका है, मीरा? एक? सिर्फ़ एक तरीका जिससे वो मिनट में टिंकू का नाम सूची से हटवा दे और उसकी माँ का काम फिर से चालू कर दे?"
वो चुप रही।
"नहीं ना," मैंने कहा। "तो फिर मुझे मेरा तरीका इस्तेमाल करने दे।"
"गुस्से में जोड़ना," उस्ताद की आवाज़ पीछे से आई, "वो भी साठ अंक का जोड़ होता है। और उसका सबसे हल्का काट और भी होता है — वो तेरी सबसे प्यारी याद लेगा। तू पूरा खर्च करके भी जीतेगा नहीं। तू हैरान रह जाएगा कि इतना खोने के बाद जीत भी क्यों अधूरी लग रही है।"
उस्ताद आराम से चलकर आए और मेरे सामने खड़े हो गए। उनके हाथ में कैंची थी, कान पर पेंसिल, दाढ़ी सफ़ेद। उन्होंने मेरे हाथ से घंटी नहीं छीनी। उन्होंने सिर्फ़ कहा —
"गुस्सा कभी जोड़ नहीं करता। वो सिर्फ़ तोड़ने का नया रास्ता बनाता है। और उसमें उसे मज़ा आता है।"
"बक्से वाले को?" मैंने पूछा।
"उसको तो अपनी इज़्ज़त का मज़ा आता है," उस्ताद ने कहा। "इसीलिए वो चाहता है कि हममें से कोई एक चीख़ उठे। कोई एक गुस्से में कुछ कर बैठे। कोई एक ऐसा काम करे जो बाईस साल में न किया हो। क्योंकि जब टूटन होती है, तो वो खाता भरता है। और जब तुम गुस्से में जोड़ते हो, तो जोड़ का सबसे बड़ा हिस्सा तुम्हारा नहीं होता — वो उसका होता है।"
मैं कुछ देर उन्हें देखता रहा।
फिर मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने मेरा हाथ नहीं पकड़ा। वो सिर्फ़ खड़ी रही। और शायद यही ज़्यादा काम कर गया कि उसने मुझे रोकने की कोशिश नहीं की दूसरी बार।
मैंने घंटी अपनी जेब में रखी।
"ठीक है," मैंने कहा।
"ठीक है?" मीरा ने पूछा।
"मैं नहीं जोड़ रहा," मैंने कहा। "मैं अभी कुछ नहीं कर रहा। मैं गुस्सा हूँ, और गुस्से में दिए वादे मैं नहीं देता। मेरी एक ही बात है — ठीक है, भगवान के वास्ते, कोई एक तरीका ढूँढ़ो जिसमें मेरी माँ की तरह की औरतें और टिंकू की तरह के बच्चे रोज़ न रोएँ।"
लक्ष्मी देवी मेरी तरफ़ देख रही थीं। उनका काग़ज़ हवा में काँप रहा था।
"बेटा," उन्होंने धीरे से कहा। "मेरा काम जाए, पर तुम कुछ ग़लत मत करना।"
वो जो कह रही थीं, वो बहुत भारी था। मैंने सिर हिलाया।
"आंटी," मैंने कहा, "काग़ज़ दे दीजिए।"
"क्यों?"
"क्योंकि इसे मुझे मेरी कॉपी में चिपकाना है।"
वो समझीं। उन्होंने मुझे काग़ज़ दिया।
फिर वो टिंकू का हाथ पकड़कर वापस चलीं — और टिंकू ने पलटकर मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में सवाल था।
मैंने कुछ कहा नहीं। क्योंकि अभी मेरे पास जवाब नहीं था, और मैं वो शख़्स नहीं बनना चाहता था जो गुस्से में सवालों के झूठे जवाब देता है।
मैंने दुकान खोली।
और पूरा दिन जोड़ केंद्र ख़ाली पड़ा।
मैंने चबूतरी पर मेज़ रखी, सफ़ेद पेंट से बना बोर्ड, चारों तरफ़ धूल झाड़ी। सुबह से दोपहर तक कोई नहीं आया। भोला भाई वहाँ से गुज़रे, पर आँख चुराकर। नसीमा बाई ने राशन की दुकान की बोरी बाहर रखी, आधी अंदर घुसी। किशनलाल काका अपनी कुर्सी पर बैठे चना खाते रहे और हवा में देखते रहे, जैसे मैं वहाँ नहीं हूँ।
चारों बच्चे आए, पर चुपचाप। सानिया ने मेरी मेज़ पर एक टूटा कटोरा रखा, फिर उठा लिया, फिर रख दिया।
"उस्ताद," उसने कहा, "कोई नहीं आ रहा।"
"आएँगे," मैंने कहा।
"कब?"
"जब उनके हाथ में कुछ टूटा होगा और दिल में कुछ बचा होगा। दोनों एक साथ होना ज़रूरी है।"
दोपहर के तीन बजे काजल आई। वो अस्पताल से आई थी, आँखें लाल थीं।
"माँ तीन बार पानी पी गईं," उसने कहा। "और उन्होंने पूछा कि बक्सा क्या कह रहा था।"
मैंने सिर उठाया।
"तूने बताया?"
"थोड़ा।" वो बैठ गई। "कहा कि एक बक्सा था और उसने कुछ कहा। और माँ हँसकर बोलीं — तो जब कुछ कहता है, तो कुछ सुनता भी होगा।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"माँ ऐसी बातें कब से कहने लगीं?" मैंने पूछा।
"अब से," काजल ने कहा। "और पापा ने जब सुना, वो चुप हो गए और छत पर चले गए।"
शाम हो रही थी। गली में धूप पीली होकर पीपल की जड़ों पर बैठ गई थी। बच्चे पतंग की डोर से खेल रहे थे जो खाली थी, बिना पतंग। मैं अपनी कॉपी में हिसाब लिख रहा था — या लिखने की कोशिश कर रहा था। उसमें एक ही लाइन थी, और वो मैं तीन बार मिटा चुका था।
घंटी चुप थी।
फिर मुझे गाड़ी की आवाज़ सुनाई दी।
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