The Mysterious Bell – Chapter 1088
हम दोनों चारपाई पर बैठे। बल्ब गुनगुनाता रहा। बाहर गली में अब भी ख़ामोशी थी, पर उसमें कुछ बदल गया था। जैसे कोई गहरी नींद से हिलकर करवट बदल रहा हो।
मैंने घंटी उलटी की। नीचे का हिस्सा जहाँ वो छोटा-सा छेद था — मैंने उसे देखा। फिर पेंच को उसमें लगाया। एक बार घुमाया। दो बार।
घंटी ने आवाज़ नहीं दी।
बस, बहुत हल्की सी, किसी फुसफुसाहट जैसी हवा निकली — जैसे किसी ने बहुत दूर से अपनी साँस छोड़ी हो।
मैंने पेंच को पूरा घुमाया।
घंटी की सतह गरम थी, फिर ठंडी हो गई, फिर गरम।
चारपाई के नीचे से एक चीज़ फिसलकर आई — एक छोटा सा काग़ज़। जिसके ऊपर कुछ पेंसिल से लिखा था।
मैंने उसे उठाया।
"क्या है?" टिंकू ने पूछा।
"पता नहीं।"
मैंने उसे पढ़ना शुरू किया। पेंसिल की लिखाई थी, बहुत पुरानी, बहुत घिसी। ऊपर ऊपर पढ़ा जा रहा था — दो लकीरें। फिर एक नाम जो मिट गया था। फिर एक तारीख़ जो सिर्फ़ महीने और साल में बची थी।
और नीचे, बहुत छोटी लिखाई में, दो शब्द थे — "अभी बाकी है।"
मैंने काग़ज़ को मोड़कर जेब में रखा।
"टिंकू," मैंने कहा।
"हाँ।"
"आज रात सो जा। जैसे तू अपने घर में सोता है।"
"तुम?"
"मैं जागूँगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि आज रात के बाद कल सुबह आने वाली है, और मुझे नहीं पता वो क्या लेकर आएगी।"
वो चुप हो गया।
फिर उसने कहा, "मैं भी जागूँगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"ठीक है," मैंने कहा।
वो चारपाई पर लेट गया। मैं दरवाज़े के पास बैठ गया।
बाहर गली में पीपल की पत्तियाँ धीरे-धीरे हिल रही थीं।
रात बीत गई।
और अगले दिन सुबह, जब मैंने शटर उठाया, शटर के नीचे से एक लिफ़ाफ़ा खिसककर आया।
मैंने उसे उठाया। वो भारी था। नीला-सफ़ेद। ऊपर एक गोल मुहर लगी थी — भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की।
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला।
अंदर एक काग़ज़ था। सिर्फ़ एक।
और उस पर लिखा था — "लक्ष्मी देवी।"
टिंकू की माँ का नाम।
मैंने उसे पलटकर देखा। पीछे कुछ नहीं लिखा था। बस एक छोटी सी लाइन थी, नीली स्याही में — "कल शाम पाँच बजे। अकेले।"
और मेरे पीछे, दरवाज़े की चौखट पर, टिंकू खड़ा था।
उसने मेरे हाथ में काग़ज़ देखा।
"उस्ताद," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो सब था जो उम्र से पहले आ जाता है। "मेरी माँ का नाम क्यों?"
मैंने काग़ज़ को जेब में रखा।
"पता नहीं," मैंने कहा, और पहली बार मुझे इस बात का डर हुआ कि मेरी ज़ुबान टूटेगी क्योंकि मैं झूठ नहीं बोल सकता — "पर अब पता करना पड़ेगा।"
मेरी जेब में घंटी ठंडी थी।
बर्फ़ जैसी ठंडी।
पहली बार, बहुत दिनों में, उसने बोलना बंद कर दिया।
॥
सुबह के सात बजे थे और गली में उतनी ही ख़ामोशी थी जितनी रात में थी।
मैंने काग़ज़ को जेब में रखा और टिंकू की तरफ़ देखा। उसका चेहरा वैसा था, जैसे किसी ने उसकी कॉपी में उसका नाम मिटाकर किसी और का नाम लिख दिया हो, और वो देखकर भी कुछ न कह पा रहा हो।
"टिंकू," मैंने कहा, "मैं तुझसे झूठ नहीं बोलूँगा। मुझे नहीं पता कि तेरी माँ का नाम उस लिफ़ाफ़े पर क्यों लिखा है।"
"तो क्या करोगे?"
"जो मेरे बस में है। पहले उनसे पूछूँगा, फिर सोचूँगा।"
"अगर वो न बताएँ?"
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"तो भी पूछूँगा," मैंने कहा। "क्योंकि न पूछने से वो सवाल ख़त्म नहीं होता, बस बड़ा हो जाता है।"
तभी बाहर चप्पलों की आवाज़ आई। हल्की, जल्दी में पड़ी हुई।
टिंकू ने दरवाज़े की तरफ़ देखा और उसका चेहरा बदल गया। माँ आ रही थीं।
लक्ष्मी देवी सिर पर दुपट्टा खींचे अंदर आईं। उनके हाथ में कुछ नहीं था, पर उनकी चाल में वो चीज़ थी जो हाथ से ज़्यादा भारी होती है — फैसला।
"टिंकू, बाहर जा," उन्होंने कहा।
"अम्मी —"
"बाहर जा। दुकान के बाहर खड़ा हो। और जो मैंने कहा है, वो याद रख।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया। वो गया, पर दरवाज़े से बाहर निकलकर वहीं, दीवार से सटकर खड़ा हो गया। मुझे पता था वो सुन रहा है। और मुझे यह भी पता था कि लक्ष्मी देवी को भी पता है।
वो मेरे सामने बैठीं, पर मुझे बैठने को नहीं कहा।
"वो काग़ज़ दिखाओ," उन्होंने कहा।
मैंने निकाला। उन्होंने लिया। पढ़ा। बहुत देर तक पढ़ती रहीं, जैसे उस पर कुछ और लिखा हो जो सिर्फ़ उन्हें दिख रहा हो।
"कल रात," उन्होंने कहा, "मेरे पास एक फोन आया था।"
"किसका?"
"पता नहीं। नंबर नहीं दिखा। आवाज़ आदमी की थी, पर बूढ़ी नहीं। न जवान। बीच की।" उन्होंने काग़ज़ मेज़ पर रखा। "उसने कहा — अपने बेटे को सम्भालो। वो जिसे जोड़ रहा है, उसका नाम तुम्हारे बेटे के काग़ज़ में भी लिखा जा रहा है।"
मेरे हाथ रुक गए।
"और फिर?" मैंने पूछा।
"और फिर मैंने पूछा, तुम कौन हो।" उन्होंने मेरी आँखों में देखा। "उसने कहा, मैं वही हूँ जिसके खाते में तुम्हारा नाम भी जाएगा। और फोन कट गया।"
गली में कोई साइकिल गुज़री। घंटी नहीं बजी। मेरी जेब में जो घंटी थी, वो बर्फ़ जैसी ठंडी थी और उस पर कोई हलचल नहीं थी।
"लक्ष्मी दीदी," मैंने कहा, "आप कल शाम पाँच बजे नहीं जाएँगी।"
"तुम मुझे रोकोगे?"
"नहीं रोकूँगा। बस कहूँगा कि अकेले नहीं जाएँगी।"
उन्होंने काग़ज़ पर उँगली रखी।
"इस पर मेरा नाम है, अंकुश। मेरे बेटे के सामने नहीं — मेरे सामने लिखा है। मेरे नाम को मेरे बच्चे के डर से नहीं खींचा जा सकता। अगर मैं आज इस लिफ़ाफ़े के नीचे दब गई, तो कल टिंकू क्या सीखेगा? कि नाम आते ही आदमी चुप हो जाता है?"
मैं चुप रहा। वो सही थीं, और यही सही होने की सबसे ख़राब बात थी।
"फिर एक बात," उन्होंने कहा। "मेरा फैसला सुन लो। टिंकू राँची नहीं जाएगा। मैंने रात भर सोचा। मैं उसे अपने डर से बचाने के लिए भेज रही थी, और वही सबसे बड़ा डर है — कि मैं अपने डर से अपने बेटे को ख़ुद से दूर कर दूँ।"
"तो वो रहेगा?"
"रहेगा। पर आज रात वो घर में रहेगा। मेरे साथ।"
मैंने सिर हिलाया।
"और तुम आज रात क्या करने वाले हो?"
मैंने जवाब नहीं दिया। मेरे जवाब न देने पर उन्होंने आँखें सिकोड़ीं।
"अंकुश। तुम झूठ नहीं बोल सकते। मुझे पता है। इसीलिए मैं पूछ रही हूँ।"
"आज रात मुझे बिजलीघर जाना है।"
उन्होंने आँखें बंद कर लीं। बहुत देर तक बंद रखीं। फिर खोलीं।
"मैं तुम्हें रोक नहीं सकती। पर मैं एक बात कहूँगी — अगर उस बक्से के पास जाकर तुम्हें लगे कि यह अब बातों का नहीं, किसी और चीज़ का मामला है, तो लौट आना। वापस आना। घर आना। यह वही घर है जिसे तुम बचाने निकले हो। इसे बचाने में ख़ुद को मत ख़त्म कर देना।"
"मैं वापस आऊँगा," मैंने कहा।
"वादा?"
मैंने सोचा। वादा करने में कोई झूठ नहीं था — मैं वापस आना चाहता था। पर चाहना और होना दो अलग चीज़ें हैं।
"कोशिश नहीं करूँगा," मैंने कहा। "वापस आऊँगा।"
वो उठीं। दरवाज़े तक गईं, फिर रुकीं।
"टिंकू," उन्होंने बाहर कहा। "रोटी खाकर आना। तीन बजे। मैं दुकान पर आऊँगी।"
और वो चली गईं।
टिंकू अंदर आया। उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर नीचे।
"सुन लिया?" मैंने पूछा।
"हाँ।"
"तो अब बता — तू क्या करेगा?"
वो कुछ देर चुप रहा।
"मैं घर जाऊँगा," उसने कहा। "तीन बजे। रोटी खाऊँगा। माँ के साथ बैठूँगा।"
"अच्छा किया।"
"और फिर रात में…" उसने आँखें उठाईं, "मैं सो जाऊँगा।"
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