The Mysterious Bell – Chapter 1089
हम दोनों जानते थे कि वो झूठ है। पर मैंने कुछ नहीं कहा। कभी-कभी झूठ को भी थोड़ी जगह मिलनी चाहिए, ताकि सच साँस ले सके।
दिन अजीब तरीके से शांत बीता।
ग्यारह बजे दुकान पर सील लगने की बात थी। ग्यारह बजे एक सिपाही आया, शालिनी का लगाया हुआ अदालती काग़ज़ पढ़ा, दो बार सिर खुजाया, और बोला — "काग़ज़ आ गया है तो अभी सील नहीं होगी।" मैंने कहा, "भाई साहब, चाय पी लीजिए।" उसने कहा चाय नहीं, नींबू पानी। मैंने नींबू पानी दिया और वो चला गया।
मीरा ने अपनी कॉपी में इस घटना को दर्ज किया — "सील टली, नींबू पानी के बदले।"
उस्ताद दिन भर चुप बैठे रहे। एक बार मशीन की सुई हिलाई, फिर रख दी। मैंने पूछा, "क्या सोच रहे हैं, उस्ताद?" उन्होंने कहा, "सोच नहीं रहा। गिन रहा हूँ।"
"क्या गिन रहे हैं?"
"जितनी बार मैंने आज तक किसी बंद चीज़ को खोला है और वो अच्छी निकली, और जितनी बार बुरी।" उन्होंने चश्मा साफ़ किया। "हिसाब बराबर नहीं है, बेटा। बुरी चीज़ें ज़्यादा बार निकली हैं। इसीलिए मैंने सीख लिया — जो बंद है, उसे धीरे खोलो। पहले आवाज़ सुनो।"
"और अगर अंदर से गाने की आवाज़ आ रही हो?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"फिर तो और धीमे खोलना।"
दोपहर चार बजे भैरों काका आया।
वो उस तरह आया जैसे गली में नहीं, किसी जंगल से निकला हो। झोपड़ी के कपड़े, हाथ में बिना आग वाली टिन की लालटेन, और आँखों में वो डर जो बहुत पुराना हो चुका हो तो शर्म बन जाता है।
"आज रात चलना है," उसने कहा, किसी सवाल की जगह नहीं छोड़ी।
"क्यों आज रात?"
"क्योंकि आज भवन में बड़ा काम हुआ है। बबलू का स्कूटर सुबह से वहाँ था। दस गाड़ियाँ लदी।" उसने लालटेन उतारकर मेज़ पर रखी। "जब भवन में काम बड़ा होता है, उस रात बक्सा ज़्यादा बोलता है। जैसे उसे बाज़ी मिल रही हो।"
"काका, आपने उस बक्से को कभी छुआ?"
"एक बार।" वो बैठ गया। "बीस साल पहले। मैं उस वक़्त यहाँ चौकीदार था। रात में कुत्ते भौंके, मैं देखने गया। बक्से के ऊपर का ढक्कन आधा खुला था। मैंने हाथ लगाया।"
"और?"
"और मेरी हथेली तीन दिन जलती रही। डॉक्टर ने कहा इंफ़ेक्शन। मेरा मन कहता है मैं पूरी ज़िंदगी उस एक छूने के बदले भर रहा हूँ।"
रात साढ़े ग्यारह बजे हम चले।
मैं, मीरा, उस्ताद अली बक्श और भैरों काका।
शबनम आपा ने गुमटी से चार कप चाय पिलाई, एक कप खाली ज़मीन पर रखकर दी, और कहा, "ये उसके लिए, जो रास्ते में मिलेगा।" मैंने पूछा, "किसके लिए?" उन्होंने कहा, "पता नहीं। पर जब मेरी कोई नहीं सुनता, मैं अंधेरे वाले को भी चाय दे देती हूँ। शायद वो भी किसी का हो।"
मैंने उस कप को हाथ में उठाया, एक घूँट खुद पिया, और फिर ज़मीन पर डाल दिया।
"अब चलो," मैंने कहा।
पुराने बाज़ार की गली संकरी और फिसलन भरी थी। बंद दुकानों के शटर रास्ते में दीवार जैसे बन गए थे। ऊपर बिजली के तार जाल जैसे लटके थे। कोई कुत्ता भूँका, फिर चुप हो गया, जैसे उसे भी पता हो कि आज रात भौंकने का कोई फ़ायदा नहीं।
बिजलीघर का फाटक लोहे का था, और उससे आधा हाथ भी ऊँचा था। भैरों काका ने जेब से पतला तार निकाला, कुंडी में डाला, एक झटका दिया — और फाटक खुल गया, इतनी आसानी से कि मुझे बुरा लगा। कोई ताला जो इतनी आसानी से खुले, वो आम तौर पर किसी को बुला रहा होता है।
अंदर घुसे तो पहली चीज़ जो मिली, वो गंध थी। जंग, नमी और जले काग़ज़ की गंध, तीनों साथ। मीरा ने नाक पर हाथ रखा।
"यहाँ कुछ जला है," उसने धीरे कहा।
"बहुत कुछ," भैरों काका ने कहा। "बीस साल में इतना जला है कि तुम गिन नहीं पाओगी।"
छह बक्से थे।
दीवार के साथ, बराबर अंतर पर, बड़े-बड़े लोहे के बक्से। मेरे कंधे से ऊँचे। हर बक्से पर जंग की मोटी परत, धूल की मोटी परत, मकड़ी के जाले, और ऊपर ढक्कन पर कुछ लिखा हुआ, जो अब पढ़ा नहीं जाता था।
पाँच बक्सों पर धूल इतनी थी कि उस पर उँगली चलाओ तो लकीर बन जाए।
छठे पर नहीं।
छठा बक्सा सबसे आख़िरी था। उसके ऊपर धूल नहीं थी। बिलकुल नहीं। जैसे हर सुबह कोई आकर उसे पोंछता हो। और उसके चारों तरफ़ ज़मीन पर धूल की एक गोल सीमा थी, जैसे कोई वहाँ रोज़ खड़ा होता हो और अपनी जगह बना चुका हो।
मेरी जेब में घंटी ठंडी थी। बर्फ़ जैसी। सुबह से।
तभी आवाज़ आई।
बहुत धीमी। गुनगुनाहट जैसी। जैसे कोई बूढ़ी औरत बैठकर कुछ सी रही हो और बहुत प्यार से कोई पुराना गीत गुनगुना रही हो।
मेरी साँस रुक गई।
क्योंकि यह धुन मैंने सुनी थी। बहुत बार सुनी थी। माँ रोटी बेलते वक़्त यही गुनगुनाती थीं, जब वो थक जाती थीं और उन्हें लगता था कोई सुन नहीं रहा।
"यह क्या है?" मीरा ने फुसफुसाया।
"यही तो हम देखने आए हैं," भैरों काका ने कहा, और उसकी आवाज़ में डर के साथ थोड़ा मज़ाक भी था। "बीस साल से मैं सोच रहा हूँ कि मैं पागल हो गया हूँ। तुम सुन रही हो न? मतलब मैं पागल नहीं हूँ।"
"काका," मैंने कहा, "किसने बनवाए थे ये बक्से?"
"पता नहीं। मेरे आने से पहले थे। बुज़ुर्ग कहते थे ये बिजलीघर के साथ आए थे।"
उस्ताद बक्सों के सामने गए, बहुत धीरे, बहुत संभलकर, जैसे किसी बीमार के पास जाते हों। उन्होंने अपना चश्मा उतारा और आँखें सिकोड़कर छठे बक्से को देखा।
"यहाँ लिखा है," उन्होंने कहा। "धूल के नीचे नहीं। बाजू पर। कोई नुकीली चीज़ से खुरचा है।"
"क्या लिखा है?"
"दो लकीरें। और बीच में एक बिंदु।"
मेरी रीढ़ में ठंडी सुई सी चली गई। वही निशान। चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर। घंटी के छल्ले पर। चौक की धूल में। और अब यहाँ।
मीरा ने अपना बैग खोला और कैमरा निकाला।
"नहीं," भैरों काका ने कहा। उसकी आवाज़ एकदम बदल गई थी — अब वो डरा हुआ नहीं था, सख़्त था। "यहाँ कुछ दिखाना मत।"
"क्यों?"
"क्योंकि यह चीज़ देखने से बढ़ती है।" उसने कैमरे पर हाथ रख दिया। "मैंने बीस साल देखा है। जिस रात कोई इसे देखता है, उस रात यह ज़्यादा बोलती है। दिखाना मतलब खिलाना।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया।
उसने कैमरा बंद कर दिया, पर बैग में वापस नहीं रखा। हाथ में पकड़े रही। मुझे पता था — अगर ज़रूरत पड़ी, वो एक सेकंड में चालू कर देगी। मीरा वही करती है जो सही होता है, पर उससे पहले वो हमेशा तैयार रहती है।
मैं छठे बक्से के पास गया।
एक कदम। दो कदम।
गुनगुनाहट तेज़ नहीं हुई। बस थोड़ी साफ़ हो गई, जैसे अब मुझे पता चल रहा हो कि यह माँ की आवाज़ जैसी क्यों लगती है — क्योंकि इसमें वही थकान है, वही धीमापन, वही हर लाइन के बाद थोड़ा सा विश्राम।
मैंने हाथ बढ़ाया।
उस्ताद ने कुछ कहा, बहुत धीरे, पर मैंने सुना नहीं।
मेरी उँगलियाँ बक्से की सतह पर पड़ीं।
वो ठंडी थी। लोहे जैसी ठंडी, हड्डी तक जाने वाली ठंडी।
और उसी वक़्त मेरी जेब में घंटी गरम हो गई।
बर्फ़ से अचानक आग। इतनी तेज़ कि मैंने हाथ जेब पर रख लिया।
"क्या हुआ?" मीरा ने पूछा।
"घंटी," मैंने कहा। "आज पूरे दिन बर्फ़ जैसी थी। अब गरम है।"
"क्या बोली?"
"कुछ नहीं।"
मैंने जेब से घंटी निकाली। उसके भीतर कुछ हलचल थी — बिना बजे, बिना आवाज़ के, जैसे कोई जानवर सोते से करवट बदल रहा हो और बताना चाह रहा हो कि मैं जाग रहा हूँ, डरो मत।
भैरों काका मेरे पीछे आए और उन्होंने बहुत धीमे कहा, "तुम्हारी जेब से मुझे गरमी लग रही है।"
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