The Mysterious Bell – Chapter 1082
"मैंने कल रात सोचा," मैंने कहा। "जब भी कोई जोड़ खुलता है, उसका आधा हिस्सा उसके पास जाता है। घंटी ने कहा, आधा तेरे अंदर, आधा उसके। तो मैंने सोचा — अगर आधा हिस्सा जाना ही है, तो उसे ऐसा क्यों भेजें जो उसके गले में अटक जाए।"
"कैसे?" उस्ताद ने पहली बार सीधे देखा।
मैंने कॉपी आगे की। "हर जोड़ का एक नाम होगा," मैंने कहा। "और वो नाम यहाँ लिखा जाएगा। पहले माँ का लिखा है। फिर तेरा, टिंकू। फिर भोला भाई का, नसीमा बाई का, किशनलाल काका का, शबनम आपा का, गोलू का, सानिया का, रफ़ीक़ का, चिंटू का।"
"नाम लिखने से क्या होगा?" नसीमा बाई ने पूछा।
"पता नहीं," मैंने कहा।
सब हक्के-बक्के रह गए।
"मैं झूठ नहीं बोलूँगा," मैंने दोहराया। "मुझे पता नहीं कि इससे क्या होगा। पर इतना पता है कि वो बक्सा नाम पचा नहीं सकता। उसने भैरों काका का नाम लिया और फिर तीन दिन तक अंदर ही अंदर हिलता रहा। उसने हमें आज तक किसी का नाम नहीं बताया, क्योंकि वो नामों से डरता है। नाम बोलने से रिश्ता जुड़ता है। और रिश्ता जुड़ने से उसकी भूख बढ़ती है, पर उसका डर भी बढ़ता है। सो वो चाहता है कि हम चुप रहें, अकेले रहें, नाम न लें।"
उस्ताद ने धीरे से सिर हिलाया।
"अब बात समझ आई," उन्होंने कहा। "भूखा जितना खाता है, उतना मोटा होता है। और मोटा आदमी एक दिन अपना ही हाथ देख नहीं पाता, खा जाता है।"
"तो आप कह रहे हैं कि जोड़ते रहो?" भोला भाई ने कहा।
"मैं कह रहा हूँ," उस्ताद ने कहा, "कि जोड़ने से पहले तय करो कि तुम किसे जोड़ रहे हो। अगर तुम दो पुराने झगड़े जोड़ोगे, तो उसे खुराक मिलेगी। पर अगर तुम उस आदमी को जोड़ो जो डर के मारे चुप है, उस आदमी को जो पैसा लेकर बैठा है, उस औरत को जो आठ साल से अपनी बहन का नाम नहीं लेती — तो उसके पेट में वो चीज़ जाएगी जो उसे अंदर से खोखला करेगी।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"उस्ताद, आपने ये पहले क्यों नहीं कहा?"
"क्योंकि मैंने अपनी ज़िंदगी में यही गलती की थी," उन्होंने कहा। "मैंने अपने भाई से वो झगड़ा जोड़ लिया था जो सबसे आसान था। और उसकी कीमत मैंने पचास साल चुकाई। अब समय आया है कि महँगा जोड़ करें।"
शबनम आपा अब तक सबसे पीछे खड़ी थीं। उन्होंने पूरे वक़्त अपनी चिमटी हाथ में घुमाई थी, जैसे कोई तलवार सँभाल रही हो। अब वो आगे आईं।
और उन्होंने चिमटी मेज़ पर पटक दी।
पटाक।
आवाज़ ऐसी थी कि किशनलाल काका का चने का लोटा हाथ से छूटने-छूटने को हो गया।
"तो जोड़ना बंद?" शबनम आपा ने कहा। आवाज़ में वो सब था जो कमरे में किसी के पास नहीं था — गुस्सा नहीं, थकान नहीं, ज़िद। "सब बैठे हो, जैसे कोई परीक्षा का पेपर बाँट रहा हो। कोई कहता है जोड़ो, कोई कहता है मत जोड़ो, कोई कहता है सोचो, कोई कहता है पहले बताओ कि क्या होगा। मैं पूछती हूँ — तुम सब जब टूटे थे, तब किसने पूछा था कि क्या होगा?"
किसी ने जवाब नहीं दिया।
"मेरी बहन को मैंने पंद्रह साल नहीं देखा," उन्होंने कहा। "पंद्रह साल। उसके घर की छत गिरी तो मुझे किसी ने नहीं बताया। उसकी बेटी की शादी हुई तो मैंने सुना बाज़ार से। और मैं यहाँ बैठी रही, क्योंकि मुझे लगा कि अगर मैं पहले बोलूँगी तो मैं हार जाऊँगी।" उन्होंने चिमटी उठाई। "तो मैं कहती हूँ — जोड़ो। जोड़ो, चाहे उसका पेट भरे। पर मेरी बहन का नाम उस कॉपी में लिखो, अंकुश। सबसे ऊपर। मेरे नाम के ऊपर।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"आपा…"
"मैं सुन चुकी हूँ सब," उन्होंने कहा। "तूने कहा कि जोड़ने से वो और बड़ा होगा। ठीक है, बड़ा हो। पर मेरी बहन से बड़ा नहीं होगा। मैं उससे कहूँगी — रज़िया, तेरे हिस्से का आधा भी जाएगा, पर जाएगा किसी न किसी के साथ। और हम दोनों मिलकर उस आधे को इतना भारी कर देंगे कि वो उसे उगल देगा।"
कमरे में कोई साँस लेता रहा।
और तभी दरवाज़े पर साया पड़ा।
हम सब मुड़े।
दरवाज़े पर टिंकू की माँ खड़ी थीं।
बाल भीगे हुए, साड़ी का पल्लू सिर पर, हाथ में एक काग़ज़। उस काग़ज़ का रंग पीला था, पर भीगा हुआ था, इसलिए उस पर पानी की लकीरें बन गई थीं, जैसे काग़ज़ खुद रो रहा हो।
वो अंदर नहीं आईं। दरवाज़े पर ही खड़ी रहीं और सीधे मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश बेटा," उन्होंने कहा। आवाज़ सूखी थी।
"आपा, आइए, अंदर आइए, बैठिए—"
"पहले ये सुन ले," उन्होंने कहा।
उन्होंने काग़ज़ आगे बढ़ाया।
"ये सुबह स्कूल के गेट पर चिपका मिला। मैं पानी भरने गई थी।" उनका हाथ काँप रहा था। "उस पर लिखा है कि जो बच्चा महीने भर से नहीं आया, उसका नाम कट जाएगा। और नीचे एक सूची है।"
टिंकू ने एक कदम आगे बढ़ा।
"मेरा नाम?"
उसकी माँ ने उसकी तरफ़ नहीं देखा। वो मुझे देखती रहीं।
"तेरा नाम नहीं है, बेटा," उन्होंने कहा। "पढ़ने वाले कोई और है।"
फिर उन्होंने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया, और उनकी उँगली सूची की सबसे ऊपर वाली लकीर पर रुकी।
"सबसे ऊपर तेरा नाम लिखा है, अंकुश।" उनकी आवाज़ टूट गई। "अंकुश यादव। साइकिल गली। और उसके आगे पेंसिल से दो शब्द लिखे हैं।"
मैंने काग़ज़ अपने हाथ में लिया।
पीला काग़ज़ भीगा हुआ था, स्याही फैल रही थी, पर दो शब्द साफ़ पढ़े जा रहे थे।
मैंने पढ़ा, और मेरी आवाज़ खुद मेरे कान में पराई लगी।
"जोड़ने वाला।"
कमरा शांत हो गया।
और मेरी जेब से घंटी, जो कल रात से ठंडी पड़ी थी, एक बार हल्की गरम हुई — इतनी धीमी कि जैसे कोई बुज़ुर्ग सिर्फ़ आँख उठाकर देख रहा हो, बोल नहीं रहा।
मैंने काग़ज़ सीधा किया।
और उस पीले काग़ज़ की सबसे नीचे वाली लकीर पर, जहाँ आम तौर पर मुहर होती है, वही निशान था — दो लकीरें, और बीच में एक बिंदु।
वही निशान जो चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर था।
वही निशान जो घंटी के छल्ले पर था।
और वही निशान जो कल शाम गली के कोने की धूल पर, किसी के जाने के बाद, अकेला छूट गया था।
॥
काग़ज़ मेरे हाथ में था और मेरे हाथ काँप रहे थे। अभी दो मिनट पहले इसी कमरे में शबनम आपा की आवाज़ गूँज रही थी — जोड़ो, चाहे उसका पेट भरे — और अब लग रहा था कि किसी ने कमरे की हवा तक उठाकर कहीं और रख दी हो।
टिंकू की माँ दरवाज़े पर ही खड़ी थीं। पानी उनके बालों से रिसकर गर्दन पर आ रहा था और वो उसे पोंछने की ज़हमत नहीं कर रही थीं। उनके हाथ में जो पीला काग़ज़ था, वो अब मेरे हाथ में था, पर उनकी उँगलियों के गीले निशान उस पर उभरे हुए थे, जैसे काग़ज़ पर कोई लिखकर चला गया हो।
"अंदर आ जाइए," मैंने कहा। "आपा, आप भीग रही हैं।"
"मैं भीग रही हूँ," उन्होंने दोहराया, जैसे ये बात उन्हें अभी समझ आई हो। "और तू सूखा बैठा है, अंकुश।"
ये सुनकर मेरी जीभ तालू से चिपक गई।
वो अंदर आईं। दरवाज़े की चौखट पर उनका हाथ रखा रह गया, जैसे वो अंदर आना चाहती हों और चौखट उन्हें छोड़ना नहीं चाहती हो। टिंकू दीवार के सहारे खड़ा था। उसका बस्ता उसके पैरों के पास पड़ा था, और वो बस्ते को देख नहीं रहा था। वो अपनी माँ के हाथ देख रहा था।
"बैठिए," मीरा ने आगे बढ़कर कहा। "आपा, चाय—"
"चाय नहीं।" उन्होंने सिर हिलाया। "मैं चाय पीने नहीं आई हूँ।"
कमरे में कोई हिला नहीं। शबनम आपा ने चिमटी मेज़ पर रख दी। उस्ताद अली बक्श कोने की कुर्सी पर बैठे थे और उनका चश्मा उनकी नाक पर बहुत नीचे आ गया था। भैरों काका दीवार के सहारे खड़े थे और उनकी टिन की लालटेन उनके हाथ में थी, जिसमें आग नहीं थी, फिर भी वो उसे पकड़े हुए थे, जैसे किसी का हाथ पकड़ा हो।
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