The Mysterious Bell – Chapter 1081
रमेश भाई ने मुँह खोला, फिर बंद कर दिया। सानिया ने रफ़ीक़ की तरफ़ देखा। रफ़ीक़ ने अपना टूटा चश्मा आँख पर लगाया, जैसे उससे सच ज़्यादा साफ़ दिखेगा।
और तभी टिंकू उठा।
"उस्ताद," उसने कहा। आवाज़ छोटी थी, पर सवाल बड़ा था। "अगर हम जोड़ेंगे, तो रणवीर और बड़ा होगा?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
मेरे मुँह में जवाब आया — नहीं टिंकू, ऐसा नहीं है, हम संभाल लेंगे, हम चालाकी करेंगे, हम कुछ ऐसा करेंगे कि उसे पता भी नहीं चलेगा। अच्छे जवाब। तसल्ली के जवाब। बड़ों के जवाब।
मेरा मुँह खुला, और बात गले में अटक गई।
क्योंकि तंत्र का नियम साफ़ था। मरम्मत के वक़्त मैं झूठ नहीं बोल सकता। मैं चुप रह सकता हूँ, बात छिपा सकता हूँ, पर झूठ नहीं।
तीन सेकंड की चुप्पी के बाद मैंने कहा, "हाँ।"
टिंकू का चेहरा उतर गया।
"और अगर हम न जोड़ें?"
मैंने घंटी की तरफ़ देखा। वो ठंडी पड़ी थी, जैसे चुप्पी भी कोई जवाब हो।
"तो भी वो बढ़ेगा," मैंने कहा। "क्योंकि टूटे रिश्ते भी उसे खिलाते हैं। और गली में रोज़ कुछ न कुछ टूटता है। आज भी टूटा होगा। कोई बाप बेटे से नहीं बोला होगा, कोई औरत अपनी बहन को याद करके चूल्हा जलाकर बैठी होगी, कोई दुकानदार उधार माँगने वाले को झूठ बोलकर टाल गया होगा।"
"तो हम कुछ भी करें," टिंकू ने धीरे से कहा, "वो बढ़ता ही रहेगा।"
"हाँ।"
"फिर हम लड़ क्यों रहे हैं?"
दुकान में इतनी चुप्पी छाई कि मुझे अपनी साँस भारी लगने लगी।
और उसी चुप्पी में दरवाज़े पर हलचल हुई।
बच्चों की टोली उठ खड़ी हुई। सानिया ने कहा, "देखो, हम लाए हैं।"
दरवाज़े पर एक बूढ़ा खड़ा था।
उम्र सत्तर के पार। कमर झुकी हुई, कपड़े धुले हुए पर बहुत पुराने, कंधे पर फटी चादर, हाथ में टिन का बना हुआ एक पुराना लालटेन जिसमें आग नहीं थी। और आँखें। आँखें इतनी धँसी हुई थीं कि लगता था कोई उन्हें भीतर से बंद कर आया है।
भैरों काका।
पुराने बिजलीघर का चौकीदार। जो बीस साल पहले वहाँ से हटाया गया था और तब से पीछे की झोपड़ी में पड़ा था। जिसके बारे में गली कहती थी कि वो पागल हो गया है। जिसके बारे में मैंने खुद एक बार मज़ाक में कहा था — "काका, वो बिजली नहीं आती अब, आप किसकी चौकीदारी करते हो।"
आज वो खुद मेरे दरवाज़े पर खड़ा था।
मैं उठा। "काका, आइए, बैठिए।"
वो नहीं बैठा। वो दरवाज़े के पास ही खड़ा रहा, जैसे अंदर आने से पहले कुछ तय कर रहा हो।
"तुम वही हो," उसने कहा। "जो घंटी वाला है।"
मेरे हाथ में घंटी थी। मैंने उसे मेज़ पर वापस रख दी।
"हाँ, काका।"
फिर वो बोला, और उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कुएँ से आ रही हो।
"मैं बीस साल से उस जगह के पीछे बैठा हूँ," उसने कहा। "मैंने तुम लोगों से कभी कुछ नहीं माँगा। एक बात नहीं कही। क्योंकि मुझे लगता था, कहूँगा तो कोई सुनेगा नहीं, और उल्टा मेरी बात बक्से तक पहुँच जाएगी।"
"कौन सा बक्सा, काका?"
"तुम जानते हो कौन सा," उसने कहा। "जो अब खुला है।"
फिर उसने अपनी टिन की लालटेन उठाई और मेज़ पर रख दी।
"सुनो," उसने कहा। "मैं रोज़ रात सोने से पहले उस गली में एक फेरा लगाता हूँ। बीस साल से। सर्दी हो या बारिश, मेरी आदत है। और मैंने एक बात नोटिस की। जिस रात मोहल्ले में कोई रिश्ता जुड़ता है, उस रात देर से उन बक्सों में से गुनगुनाहट आती है।"
"गुनगुनाहट?"
"हाँ। जैसे कोई सोते में गुनगुनाता है। जैसे किसी को नींद में अच्छी चीज़ दिख रही हो।" भैरों काका ने अपने हाथ की तरफ़ देखा। उसकी उँगलियाँ हिल रही थीं। "और जिस रात कोई रिश्ता टूटता है, उस रात वो खट-खट करता है। मैंने दोनों आवाज़ें सुनी हैं। बार-बार सुनी हैं।"
दुकान में कोई हिला नहीं।
"और काका," मीरा ने धीरे से कहा, "आपने कभी किसी को वहाँ देखा?"
भैरों काका ने एक लंबी साँस ली। जैसे कोई बोझ उठाने से पहले साँस भरता है।
"एक रात," उसने कहा। "मैं उस रात बीमार था, फिर भी उठकर गया। क्योंकि उस शाम गली में कुछ हुआ था, कोई दो भाई लड़े थे, मैंने सुना था। मैंने सोचा, देख आऊँ कि बक्सा आज गुनगुनाता है या नहीं।"
"क्या हुआ?"
"बक्सा गुनगुना रहा था," उसने कहा। "और उसके सामने एक आदमी खड़ा था। सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद जूते, और हाथ में काला थैला।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"आपने उसे पहचाना?"
"मैंने उसे नहीं पहचाना," भैरों काका ने कहा। "उसने मुझे पहचाना। मैं झाड़ी के पीछे था, वो मुड़ा, और मुझे देखकर मुस्कुराया।"
"क्या कहा?"
"कुछ नहीं," काका ने कहा। "वो बस मुस्कुराया और थैले को बक्से के ऊपर रखकर चला गया। और मैंने देखा कि थैले से कुछ टपक रहा था। बूँदें। काली। बारिश के पानी जैसी नहीं, गाढ़ी।"
"आपने उस थैले को छुआ?"
"नहीं।" काका की आवाज़ टूट गई। "और तीन दिन बाद उसने मेरा नाम लिया।"
"किसने?"
"बक्से ने।" वो मेज़ के किनारे पकड़कर खड़ा हो गया, जैसे अब बोलने के लिए सहारा चाहिए था। "रात के तीन बजे। सिर्फ़ तीन शब्द। भैरों। हम बोल रहे हैं। बस इतना। और मैं तीन रात नहीं सोया। चौथी रात मैं गया और उससे माफ़ी माँगी।"
"माफ़ी?" मैंने कहा। "किस लिए?"
"क्योंकि मैंने देखा था," उसने कहा। "और मैंने किसी को नहीं बताया। मैंने बीस साल अपनी गली के लोगों को जलते देखा और चुप रहा। यही मेरा गुनाह है।" उसने अपने सूखे होंठों पर जीभ फेरी। "और सुनो, तुम, घंटी वाले। वो बक्सा भूखा है। और भूखा चीज़ कभी चुप नहीं रहती। सोती है, गुनगुनाती है, पर चुप नहीं रहती।"
फिर उसने वो कहा जिसने दुकान की हवा भारी कर दी।
"वो गिनता है," उसने कहा। "मैंने महसूस किया है। जब गली में कोई झगड़ा होता है, वो खट करता है। जब कोई सुलह होती है, वो गुनगुनाता है। दोनों में उसका पेट भरता है। फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि सुलह में वो ज़्यादा खुश होता है। क्योंकि सुलह जुड़ती है, फिर जोड़ टिकता है, फिर कोई उसे तोड़ता है, और वो दोबारा खाता है। एक रिश्ते से वो दो बार खाता है। तुमने कभी सोचा?"
मैंने कुछ नहीं कहा। क्योंकि सोचा था। रात भर सोचा था।
तभी टिंकू बोला, बहुत धीमे से, मगर साफ़।
"भैरों काका, आपको नहीं लगता कि हमें जोड़ना बंद कर देना चाहिए?"
भैरों काका ने उसकी तरफ़ देखा। बच्चे की तरफ़ ऐसे देखा जैसे बहुत सालों बाद किसी ने सही सवाल पूछा हो।
"बेटा," उसने कहा, "मैं बीस साल से यही सोचकर बैठा हूँ। न कुछ जोड़ा, न कुछ तोड़ा। और नतीजा? गली पहले से ज़्यादा टूटी हुई है। मेरा बेटा मुझसे नहीं बोलता। मेरी बहू मेरे मुँह नहीं लगती। मैंने कुछ नहीं किया, और मेरे हिस्से का भी वो खा गया।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "जो चुप रहता है, वो भी उसकी मेज़ पर परोसा जाता है।"
फिर वो बेंच के कोने पर बैठ गया, धीरे से, जैसे अपना आख़िरी हथियार रख रहा हो।
मैं मेज़ के पास गया।
मैंने नई कॉपी खोली।
"सब सुनो," मैंने कहा। "मैं झूठ नहीं बोलूँगा, इसलिए बात कड़वी होगी। हाँ, अगर हम जोड़ेंगे तो वो बढ़ेगा। और अगर हम नहीं जोड़ेंगे, तोभी वो बढ़ेगा, क्योंकि टूटना रुकेगा नहीं।" मैंने कॉपी उठाई। "इसका मतलब यह नहीं कि हम डरकर बैठ जाएँ। इसका मतलब यह है कि हमें तय करना होगा — क्या जोड़ें।"
"मतलब?" रमेश भाई ने कहा।
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