The Mysterious Bell – Chapter 1080
और घंटी ने वो कहा जिसने मेरे अंदर कुछ ठंडा कर दिया — बिल्कुल साफ़, बिना रहम, जैसे कोई बुज़ुर्ग आख़िरी वसीयत बता रहा हो:
“अब तू जोड़ेगा, तो वह और बढ़ेगा।”
कमरा चुप हो गया। बाहर बारिश टपक रही थी।
“तो फिर मैं क्या करूँ?” मैंने कहा।
घंटी की सतह पर वही दो लकीरें और बीच में बिंदु चमक उठा — एक पल के लिए, जैसे कोई आँख खुलकर बंद हो गई हो।
“कर वही,” वो बोली, “जो कोई अकेले नहीं कर सकता।”
“मतलब?”
“इसका जवाब रात में नहीं मिलेगा।” वो ठंडी हो गई। “सुबह उस औरत के पास जा जिसने कहा था — जो नाम जोड़ता है, उसका नाम पहले लिखा जाता है। और पूछ, वो नाम किस खाते में लिखा जाता है।”
मैंने घंटी जेब में रखी।
पर वो जेब में जाते-जाते एक बार फिर बोली, इतने धीमे कि मुझे लगा मैंने सुना ही नहीं:
“और अंकुश — कल से अपना हिसाब खुद लिखने लग। किसी और की कॉपी में मत छोड़।”
मैं देर तक बैठा रहा। बाहर बारिश की आवाज़ थी, और दूर कहीं पुराने बिजलीघर की तरफ़ से कोई धातु की आवाज़ — शायद बक्से का ढक्कन, शायद बारिश का टपकना पीतल पर।
और मेरी जेब में वो काग़ज़ था जिसमें लिखा था — तीन दिन।
तीन दिन में मुझे अगर यह नहीं समझा कि मेरी मेहनत का हिसाब किसके खाते में जा रहा है, तो चबूतरी तो बहुत पीछे की बात है, मैं खुद अपने ही हिसाब से मिट जाऊँगा।
॥
सुबह बारिश उतर चुकी थी, पर गली अभी भीगी थी। पीपल के पत्तों से पानी टपक रहा था और नाली के पत्थर पर काई जैसी चमक आ गई थी। मैंने शटर उठाया तो नीचे से पानी की एक पतली लकीर दुकान के अंदर तक आई हुई थी। ट्रंक के पास जाकर रुक गई थी, जैसे रास्ता भूल गई हो।
मैंने पोछा लिया, फिर दुकान की मेज़ पर एक नई कॉपी रखी।
नई कॉपी।
मेरी ज़िंदगी में पहली बार ऐसा हुआ कि मैंने अपना हिसाब खुद लिखना शुरू किया। पेंसिल उठाई और पहला नाम लिखा — माँ। सुशीला यादव। उसके नीचे एक लकीर खींची, जैसे कोई हिसाब का खाना बना रहा हो।
तुम सोच रहे होगे कि कॉपी खोलकर नाम लिखने में क्या बड़ी बात है। तो सुनो, बड़ी बात यह थी कि उस नाम के आगे मैंने कुछ नहीं लिखा। न रकम, न तारीख़, न मोहर। सिर्फ़ नाम। क्योंकि घंटी ने कहा था, कल से अपना हिसाब खुद लिखना। और मैंने तय किया था कि मेरे हिसाब में सबसे पहले वही नाम जाएगा जिसने मुझे चलना नहीं, बोलना सिखाया।
तभी दरवाज़े पर टिंकू की आवाज़ आई।
"उस्ताद!"
वो भीगा हुआ आया था, बाल माथे पर चिपके, और जासूसी थैला कंधे से लटक रहा था। उसने मेज़ पर नई कॉपी देखी और रुक गया।
"ये क्या है?"
"मेरा हिसाब," मैंने कहा।
"मतलब?"
"मतलब, अब से जो भी जोड़ होगा, उसका नाम यहाँ लिखा जाएगा। पहले माँ का। फिर तेरा।"
टिंकू की आँखें बड़ी हो गईं। "मेरा भी?"
"तेरा भी। और सबका। अब जा, सबको बुला ला। उस्ताद को, शबनम आपा को, मीरा को, भोला भाई को, नसीमा बाई को, किशनलाल काका को, रमेश भाई को, बच्चों को। सबको। कहना, अंकुश ने बुलाया है और बात बड़ी है।"
टिंकू एक पल खड़ा रहा, फिर उसने कुछ ऐसा पूछा जो उसकी उम्र से बड़ा था।
"उस्ताद, बात बुरी है या अच्छी?"
"बात सच है," मैंने कहा। "बुरी-अच्छी बाद में तय करेंगे।"
वो भाग गया।
मैंने उस वक़्त दुकान के बाहर देखा। सामने उस्ताद अली बक्श की दुकान थी। दरवाज़ा आधा खुला था और अंदर से सिलाई मशीन की टिक-टिक आ रही थी। टिक, टिक, टिक। जैसे कोई बूढ़ा दिल अपनी गिनती पूरी कर रहा हो।
आधे घंटे में दुकान भर गई।
पहले मीरा आई, कैमरा कंधे पर, बाल गीले, बैग फटा हुआ। फिर उस्ताद, अपनी लाठी के सहारे, धीरे-धीरे। फिर शबनम आपा, हाथ में लोहे की चिमटी, मुँह पर ऐसा भाव जैसे किसी को मारने आई हों। भोला भाई आधा शटर छोड़कर आए। नसीमा बाई साड़ी का पल्लू कंधे पर, रमेश भाई पीछे-पीछे, किशनलाल काका चने का लोटा लिए हुए, जैसे वो लोटा ही उनकी ढाल हो। बच्चों की टोली — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू — चबूतरी से सटी बेंच पर बैठ गई। और सबसे पीछे, दरवाज़े की आड़ में, पापा खड़े थे। बोले कुछ नहीं। बस खड़े रहे।
मैंने घंटी जेब से निकालकर मेज़ पर रखी।
"ये क्या है?" रमेश भाई ने पूछा।
"यही तो बताने के लिए बुलाया है," मैंने कहा।
फिर मैंने सबको बताया। बिना घुमाए, बिना मीठा किए। कि हर जोड़ का आधा हिस्सा मेरे अंदर रहता है और आधा बाहर जाता है। कहाँ जाता है, यह भी बताया। बिजलीघर के उस खुले लोहे के बक्से तक, जहाँ कोई बैठा है जो मालिक नहीं, सिर्फ़ मुँह है। जो भूखा है। जो टूटे रिश्ते भी खाता है। और जिसके खाते में मेरी मेहनत का आधा हिस्सा खुद-ब-खुद चला जाता है।
दुकान में ऐसी चुप्पी छाई कि पीपल से टपकती बूँदें सुनाई देने लगीं।
फिर मीरा उठी।
और मीरा ने वो कहा जो मैं सुनना नहीं चाहता था, पर सुनना ज़रूरी था।
"ये तो सीधा धोखा है," उसने कहा। आवाज़ ऊँची नहीं थी, पर इतनी साफ़ थी कि कान में चुभ गई। "अंकुश, तू मज़दूर है और मज़दूरी किसी और को मिल रही है। तू रात-रात जागता है, गली-गली घूमता है, अपनी माँ को अस्पताल में छोड़कर दौड़ता है, और उसका आधा हिस्सा एक बक्से में बैठा कोई खा जाता है। इसे तू न्याय कहता है? इसे तू काम कहता है?"
"नहीं," मैंने कहा।
"तो फिर?"
"मैं इसे सच कहता हूँ," मैंने कहा। "और सच को न्याय कहने की ज़रूरत नहीं होती।"
मीरा ने कैमरा मेज़ पर रख दिया। ज़ोर से नहीं, धीरे से, पर उस धीमेपन में गुस्सा था।
"तू मुझे समझा रहा है या अपने आप को?"
मैं चुप रहा। क्योंकि वो सवाल सही था।
उस्ताद अली बक्श बेंच के कोने पर बैठे थे। उन्होंने पूरे वक़्त कुछ नहीं कहा। मैंने देखा, उनका हाथ गोद में रखे कपड़े पर था और उँगली धीरे-धीरे उसी टिक-टिक की लय पर चल रही थी। जैसे वो सिलाई मशीन नहीं, कोई पुरानी बात सुन रहे हों।
"उस्ताद," मैंने कहा, "आप चुप क्यों हैं?"
उन्होंने चश्मा सीधा किया। "मैं सुन रहा हूँ।"
"क्या?"
"अपनी मशीन," उन्होंने कहा। "पचास साल से यही टिक-टिक है। जब मैंने इलियास से झगड़ा किया था, उस रात भी यही आवाज़ थी। और उस रात भी मुझे लगा था कि सब बंद कर देना चाहिए।"
"फिर आपने बंद किया?"
"हाँ," उन्होंने कहा। "और देखो, पचास साल से मैं उसी बंद दुकान में बैठा हूँ।"
फिर भोला भाई बोले। उनकी आवाज़ काँप रही थी।
"अंकुश भाई, मेरी आरज़ू है। रात में दौरे पड़ते हैं। उसकी दवा नौकरी जाने के दिन बंद कर दी गई थी। अगर मैं ये सब जानता हूँ और फिर भी चुप रहूँ, तो मैं उसके सामने क्या मुँह लेकर जाऊँगा?"
"भोला भाई…"
"मैं कहना यह चाहता हूँ," उन्होंने कहा, "कि अब जोड़ना बंद कर दे। हम डर सह लेंगे। हम गाली सह लेंगे। पर हम उसका पेट नहीं भरेंगे।"
नसीमा बाई ने साड़ी का पल्लू कसकर पकड़ लिया। "मेरा साजिद उससे दो हज़ार ले चुका है," उसने कहा। "मुझे नहीं पता वो किस काम के पैसे थे। अगर तुम जोड़ोगे और वो बढ़ेगा, तो मेरा बेटा और अंदर धँसेगा।"
"और मेरी दुकान?" किशनलाल काका ने कहा। "चौदह साल से मैंने वो बिक्री का काग़ज़ बोरी के नीचे दबाकर रखा है। आज तक नहीं जलाया। क्यों? क्योंकि मुझे लगता था कोई तो आएगा जो सच निकालेगा। अब वो आया है। और तुम कह रहे हो कि उसकी ताकत भी मेरे ही हाथ से बढ़ रही है?"
कमरा भारी हो गया।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno