The Mysterious Bell – Chapter 1079
मैंने अपनी हथेली देखी। ग्रीस के निशान, पुराने, कई साल पुराने, नाखून के नीचे तक जमे हुए। यही हाथ हैं जो पहिए की तीलियाँ सीधी करते हैं, जो टूटी चीज़ों को जोड़ते हैं।
और यही हाथ अपने ही दुश्मन को पाल रहे थे।
मुझे माँ की आवाज़ याद आई — उस दरवाज़े की दरार से आई थी, कमज़ोर, खाँसी के बीच — अंकुश, अच्छे काम का हिसाब उल्टा क्यों आता है?
मैंने उस वक़्त जवाब नहीं दिया था। मैंने सिर्फ़ वादा किया था कि मैं जवाब ढूँढूँगा। और माँ की तरह माँ के सवाल भी ऐसे होते हैं कि वो इंतज़ार करते हैं, और जब जवाब आता है तो ऐसा आता है कि आदमी कुर्सी पकड़ कर बैठ जाए।
“घंटी,” मैंने कहा, और इस बार मेरी आवाज़ में वो मज़ाक नहीं था जो लोग मुझे पहचानते हैं। “उसका खाता कहाँ है?”
“तूने देखा है।”
“बिजलीघर।”
“हाँ।”
“और बात यही है कि मैं जोड़ता हूँ, वो खींचता है?”
“हाँ।”
“तो फिर मैं जोड़ना छोड़ दूँ?”
इस बार घंटी ने जवाब देने में देर लगाई। इतनी देर कि मुझे लगा वो चुप हो गई है, या मेरा सवाल उसके पास पहुँचा ही नहीं।
“अगर छोड़ेगा,” वो बोली, “तो टूटे हुए रिश्ते टूटे रहेंगे और वो वैसे ही खाएगा। जो जुड़ता है उससे उसे कुछ मिलता है, और जो टूटता है उससे भी। उसके लिए दोनों रास्ते खुले हैं।”
“तो मेरे पास रास्ता क्या है?”
“इसका जवाब तेरे पास नहीं है।” वो फिर रुकी। “इसका जवाब उस जगह है जहाँ नाम पहले लिखा जाता है।”
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
“वो लड़की,” मैंने कहा। “हमीदा दाई की बेटी की रिश्तेदार। उसने कहा था — जो नाम जोड़ता है, उसका नाम पहले लिखा जाता है।”
“तूने सुना था,” घंटी ने कहा। “अब समझ भी।”
मैंने घंटी उठाई और दरवाज़ा खोला।
बाहर शबनम आपा खड़ी थीं, हाथ में मिट्टी का कुल्हड़।
“चाय,” उन्होंने कहा। “और ये बात मुझे पहले बतानी थी कि तू बिजलीघर गया था। अब बता, घंटी ने क्या कहा?”
मैंने कुल्हड़ लिया। हाथ जल गया। पर मैंने उसे छोड़ा नहीं, क्योंकि उस जलन में कुछ ऐसा था जो मुझे असली दुनिया में रख रहा था।
“आपा,” मैंने कहा। “मैंने अपनी मेहनत से अपने ही दुश्मन को पाला है।”
आपा ने एक पल मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने वो किया जो वो हर बार करती हैं — उन्होंने कोई बड़ी बात नहीं कही, कोई झूठी तसल्ली नहीं दी। उन्होंने सिर्फ़ कहा, “कुल्हड़ में चाय है। पी। ठंडी हो गई तो मिट्टी का स्वाद आएगा और मुँह कड़वा लगेगा।”
मैंने चाय पी।
और उस वक़्त गुमटी के पीछे से आवाज़ आई।
मैंने मुड़कर देखा। वो नई लड़की थी — कल वाली — पुरानी पतली कॉपी सीने से लगाए खड़ी।
“मैंने कुछ सोचा है,” उसने धीरे से कहा, “पर आप सुनेंगे या नहीं, यह पहले हाँ कहिए।”
मैंने कुल्हड़ नीचे रखा।
“कहो,” मैंने कहा।
“मेरी माँ अस्पताल की रसोई में काम करती थी,” उसने कहा। “और उसने मुझे एक बात दो बार दोहराई थी। पहली बार जब मैं आठ साल की थी, और दूसरी बार अब, जब वो अस्पताल नहीं जा रही।” उसने कॉपी खोली। “उसने कहा था — जो नाम जोड़ता है, उसका नाम किसी और के खाते में पहले जाता है। चाहे वो इंसान जाने या न जाने।”
मेरी साँस रुक गई।
“किसी और के खाते में?” मैंने कहा।
“हाँ। और मेरी माँ कहती थी — इसीलिए कुछ लोग गली में बड़े-बड़े नाम कमाते हैं, और उनके हाथ कभी गंदे नहीं होते।”
शबनम आपा ने कुछ ऐसा कहा जो किसी गाली जैसा था पर गाली नहीं थी, और फिर बोलीं, “बैठ जा, बेटी। चाय पी। और ये सब पहले से बता।”
लड़की बैठ गई।
और मैंने अपने कमरे में लौटते वक़्त सिर्फ़ इतना सोचा — कल एक छोटा-सा जोड़ हुआ, दो लड़के, बारह अंक। और रणवीर ने बिजलीघर में खड़े होकर कहा था — मैंने भी पूरे बारह लिए।
उसे कैसे पता कि मुझे बारह मिले?
क्योंकि वो उसी लेन-देन का हिस्सा है।
दोपहर को वो हुआ जो मैं अपनी ज़िंदगी में नहीं भूलूँगा। मैं चबूतरी पर बैठा काग़ज़ पर उँगली फेर रहा था, और उस्ताद आकर मेरे पास बैठ गए।
“क्या सोच रहा है?” उन्होंने पूछा।
“सोच रहा हूँ,” मैंने कहा, “कि मैं जोड़ना छोड़ दूँ।”
उस्ताद ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने कुछ भोंडा कह दिया हो।
“और तू छोड़ देगा?” उन्होंने पूछा। “तो गिरधारी-मोहन फिर बोलना बंद कर देंगे। बंसी बाबा फिर रहमत बाबा को सलाम नहीं करेंगे। गोलू और टिंकू फिर एक-दूसरे को कोसेंगे। यही चाहता है तू?”
“नहीं।”
“तो फिर? तू सोच रहा है कि अच्छा करने से भी वो बढ़ता है, तो अच्छा करना क्यों? अंकुश, मैंने पचास साल पहले यही सोचकर सब छोड़ दिया था। बंद कर दिया।” उन्होंने अपनी सिलाई मशीन की तरफ़ देखा। “और उसके बाद मैंने देखा कि चीज़ें खुद-ब-खुद टूटती गईं। लोग झगड़ते गए। और मेरे हाथ साफ़ रहे।” उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। “पर मेरा नाम भी कभी किसी के खाते में नहीं लिखा गया, और अच्छाई भी किसी के काम नहीं आई।”
मैं चुप रहा।
“अच्छा करना बंद मत कर,” उन्होंने कहा। “बस अब सिर्फ़ अच्छा करके मत बैठ। किसी और को भी जोड़। उन लोगों को जोड़ जिनसे वो डरता है।”
“कौन डरता है?”
“जो खींचता है, वो अपने मालिक से भी डरता है,” उस्ताद ने कहा। “बक्से वाला मालिक नहीं है। बक्से वाला सिर्फ़ मुँह है।”
शाम को मीरा आई। उसके हाथ में एक नई कॉपी थी, और उस कॉपी में उसने रात से लेकर अब तक सब लिखा था — तारीख़ें, नाम, जगहें। उसने कॉपी मेरे सामने खोली।
“देख,” उसने कहा। “मैंने आज सुबह से पूरी गली की बातचीत के हिसाब से मिलाया। हर बार जब तुमने कोई बड़ा जोड़ किया, उसके तीन दिन के अंदर रणवीर की कोई चीज़ बढ़ी — नई ज़मीन, नया बोर्ड, नई सूची, नया नोटिस, नया काग़ज़।”
“मतलब?” मैंने कहा, हालाँकि मुझे पता था।
“मतलब, तुम उसकी सीढ़ी के दो सिरों पर खड़े हो। तुम रिश्ते जोड़ते हो, और वो सीढ़ी ऊपर चढ़ता है।”
मैंने कॉपी बंद कर दी।
“मीरा,” मैंने कहा, “अगर ये सच है तो मैं उसे रोकने के लिए क्या करूँ? जो काम मेरा है, वही उसे ताकत देता है।”
मीरा ने कुछ देर सोचा। फिर उसने वो कहा जो शायद उस वक़्त उसने खुद भी पूरा नहीं समझा था, पर जो कहना ज़रूरी था।
“तुम उसे रोकने के लिए मत सोच,” उसने कहा। “तुम यह सोच — उसने अब तक कौन सा जोड़ नहीं तोड़ा? और कौन सा जोड़ ऐसा है जो उसके बक्से को खुद डरा दे?”
मुझे घंटी की बात याद आई — वो डरता है उस सभा से जहाँ लोग सच बोलकर एक हो जाएँ।
और मुझे माँ का सवाल याद आया — अच्छे काम का हिसाब उल्टा क्यों आता है।
“माँ,” मैंने धीरे से कहा, आँखें बंद करके, जैसे दरवाज़े की दरार से बोल रहा हूँ। “अब मुझे जवाब मिल गया। उल्टा इसलिए आता है कि हम हिसाब अकेले लिखते हैं और उसे कोई और पढ़ता है। अब इस हिसाब में मैं एक और नाम जोड़ूँगा — तेरा।”
रात में बारिश आई। छोटी, तेज़, बिना गड़गड़ाहट वाली बारिश। मैंने दुकान का शटर बंद किया, टिंकू को घर भेजा, और पीछे वाले कमरे में घंटी अपने सामने रख दी।
“घंटी,” मैंने कहा। “एक आख़िरी बात।”
“पूछ।”
“अब तू जो बताया — तूने पहले क्यों नहीं बताया?”
“क्योंकि पहले यह बात तेरे भरोसे को तोड़ देती,” घंटी ने कहा। “अब तू इतना जुड़ा है कि टूटेगा नहीं।”
“तो आगे क्या?”
“आगे तेरा हिसाब बदलेगा।”
मैंने घंटी उठाई।
“मतलब?”
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