The Mysterious Bell – Chapter 1078
“सुन सब,” उन्होंने गली की तरफ़ मुँह करके कहा, जैसे पूरी गली उनके सामने खड़ी हो। “आज जो भी आए, जो भी काग़ज़ दिखाए, उसे कहना — पहले चाय पी ले। और चाय पीने के बाद भी अगर काग़ज़ देने की हिम्मत बचे, तो दे दे।”
मुझे हँसी आई। शबनम आपा हमेशा अपनी हँसी एक तरफ़ रखकर सबसे ज़रूरी बात कह देती हैं।
पर हँसी ज़्यादा देर नहीं टिकी। क्योंकि उसके बाद जो हुआ, वो मेरे अंदर तक चला गया।
ग्यारह बजे पीपल के नीचे भीड़ जमा हो गई। कोई किसी को नहीं बता रहा था, फिर भी सब आ गए — जैसे गली की हवा ने खबर पहुँचा दी हो।
उस्ताद अली बक्श अपनी दुकान से निकलकर आए, हाथ में मोटा चश्मा। भोला भाई अपनी आधी गिरी शटर वाली दुकान से आए। किशनलाल काका चने का लोटा छोड़कर आए। नसीमा बाई अपनी राशन दुकान का ताला लगाकर आईं। रमेश भाई पानी की बाल्टी लेकर आए, और बाल्टी उनके हाथ में ही रह गई। बच्चे — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू — पहले से चबूतरी पर बैठे थे, और गोलू भी उनके साथ, किनारे पर, थोड़ा झिझकते हुए।
चबूतरी पर जोड़ केंद्र की टूटी लकड़ी की मेज़ रखी थी, जिस पर मैंने सफ़ेद पेंट से बोर्ड बनाया था — टूटी चीज़ लाओ, टूटा रिश्ता साथ लाओ।
उसी मेज़ पर कोई काग़ज़ चिपका गया था।
मेरा हाथ वहीं रुक गया। मैंने वो काग़ज़ खोला। वही टाइप की लाइनें। वही तीन दिन।
“देख लिया?” पीछे से भोला भाई की आवाज़ आई। “सुबह मेरी दुकान के नीचे भी यही पड़ा था। मैंने सोचा किसी का कचरा है।”
“मेरे बोर्ड के नीचे भी,” नसीमा बाई ने कहा। “लगा रही थी कि एक ही है, नकल है। पर तीन जगह?”
उस्ताद ने काग़ज़ हाथ में लिया। उन्होंने उसे पलटा, सूँघा — हाँ, उस्ताद काग़ज़ सूँघते हैं, मुझे भी अब आदत हो गई है — और फिर बहुत धीमे से बोले, “नया है। स्याही दो दिन से ज़्यादा पुरानी नहीं।”
“किसने छापा?” मैंने पूछा।
“जिसके पास मशीन हो और नाम न हो।” उन्होंने काग़ज़ मुझे लौटाया। “और अंकुश, इसमें कोई तारीख़ नहीं, कोई मुहर नहीं। यानी ये चेतावनी नहीं, ये डर है। अगर ये काग़ज़ तुम्हें तोड़ सका, तो इसे कोई दफ़्तार नहीं चाहिए।”
किशनलाल काका कुछ बुदबुदाए। मैंने पूछा, “क्या कहा काका?”
“मैं कह रहा था,” उन्होंने लोटा नीचे रखा, “कि नगरपालिका पीपल के नीचे बैठकर लोगों को सलाह देने पर कभी काग़ज़ नहीं भेजती। यहाँ सालों से लोग काग़ज़ लेकर, हिसाब लेकर, झगड़े लेकर बैठते आए हैं। किसी ने नहीं रोका।”
“तो फिर अब क्यों?” रमेश भाई ने कहा।
और सब एक साथ चुप हो गए, क्योंकि सबको जवाब पता था।
क्योंकि अब पीपल के नीचे कोई बैठने लगा है जो चीज़ें जोड़ता है। और जो जोड़ता है, वो उनके धंधे में आड़े आता है।
मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा और चबूतरी पर बैठ गया।
“कल ही मैंने टिंकू और गोलू को यहीं बैठाया था,” मैंने कहा। “एक-एक सच निकलवाया। दोनों ने हाथ मिलाया।”
“मुझे पता है,” गोलू ने कहा। वो धीरे बोला, जैसे यहाँ बोलने का हक़ उसका नहीं। “मैं वहीं था। बल्ला अपने आप जुड़ा।”
“तो काग़ज़ कल रात का जवाब है,” मीरा ने कहा। वो कब आईं, मुझे पता नहीं चला। उन्होंने अपना कैमरा कंधे से उतारा और मेरे बगल में बैठ गईं। “तुमने एक रिश्ता जोड़ा, और अगली सुबह तुम्हारी जगह पर काग़ज़ आ गया। ये इत्तेफ़ाक़ नहीं है।”
“मीरा,” मैंने कहा, “क्या कोई ऐसा नियम है — किसी जगह पर लोग इकट्ठे न हों? कुछ ऐसा जिससे वो इसे रोक सकें?”
“रोकने के लिए नहीं,” उन्होंने कहा, “परेशान करने के लिए हाँ। असली काग़ज़ में तारीख़ होती है, नंबर होता है, सुनने का मौका होता है। इसमें कुछ नहीं। इसे लेकर अदालत नहीं जा सकते। पर तुम घर बैठकर डर सकते हो।”
मुझे शालिनी की बात याद आई — जो आदमी लोगों के जोड़ से खाता भरता है, वो जानता है किस बात से जोड़ टूटता है।
और मुझे कल रात का वो लम्हा याद आया — रणवीर का मुड़कर बाहर जाना, फाटक का अंधेरा, और घंटी की बर्फ़ जैसी सतह।
मैं उठ खड़ा हुआ।
“सब लोग,” मैंने कहा। “ये काग़ज़ मेरी जगह पर आया है। मैं इसका जवाब दूँगा। पर अभी मुझे कुछ सोचना है। अकेले।”
शबनम आपा ने कुछ कहना चाहा, फिर रुक गईं। उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा, “चाय रखी है। ठंडी मत होने दे।”
मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में गया। दरवाज़ा बंद किया। शटर भी गिरा दिया, आधा ही, ताकि अंदर अंधेरा रहे।
और मैंने घंटी निकाली।
वो अब भी ठंडी थी, पर इतनी नहीं जितनी रात में थी। मैंने उसे दोनों हाथों में लिया और अपने माथे से लगाया।
“घंटी,” मैंने कहा। “अब साफ़ बोल।”
कुछ देर कुछ नहीं हुआ। फिर धीरे से, बहुत धीरे से, जैसे कोई बुज़ुर्ग बुखार में बोलता है:
“पूछ।”
“ये काग़ज़ क्यों आया?”
“क्योंकि तूने जोड़ा।”
“तो जोड़ने की सज़ा है?”
“नहीं।” एक ठहराव। “जोड़ने का हिसाब है।”
“समझा नहीं।”
और फिर घंटी ने वो बात कही जो मुझे कल रात से लगातार खा रही थी, पर इस बार किसी पहेली की तरह नहीं — सीधे, सपाट, जैसे कोई बिल बढ़ाकर आपके सामने रख दे:
“हर जोड़ की आधी ऊर्जा दूसरी तरफ़ चली जाती है।”
कमरे की हवा जैसे भारी हो गई।
“दूसरी तरफ़?” मैंने कहा। मेरी आवाज़ सूखी थी।
“मरम्मत तेरी है,” घंटी ने कहा। “पर ऊर्जा दो लोगों की होती है। और एक हिस्सा चुपचाप खींच लिया जाता है।”
मैंने घंटी को मेज़ पर रख दिया, क्योंकि मेरे हाथ काँप रहे थे और मुझे लगा अगर मैंने उसे गिरा दिया तो खुद को माफ़ नहीं करूँगा।
“कौन खींचता है?” मैंने पूछा।
“जो भूखा है।”
“बक्सा?”
“बक्सा नहीं। बक्से में जो बैठा है।” घंटी फिर रुकी, और उस रुकने में कुछ ऐसा था जो मुझे अंदर तक डरा गया। “और वो भूखा अकेला नहीं है। जब तू जोड़ता है, तेरे अंदर भी एक चीज़ भरती है। जोड़ की ऊर्जा दो जगह जाती है — बाहर और भीतर। बाहर वाला हिस्सा कोई खींच लेता है। भीतर वाला हिस्सा तेरे पास रहता है।”
“तो मैंने क्या किया?”
“तूने भीतर वाला हिस्सा जोड़ा। और बाहर वाला उसके खाते में गया।”
मैंने आँखें बंद कर लीं।
और याद आने लगा। एक-एक करके, जैसे कोई पुरानी फ़िल्म धीमी गति से चले।
जिस दिन गिरधारी और मोहन की साइकिल वाली दरार जुड़ी — उसी हफ़्ते चबूतरी पर किसी ने बोला था कि नए बाज़ार में रणवीर भारद्वाज की बड़ी तस्वीर लगी है।
जिस दिन पीपल के नीचे बंसी बाबा और रहमत बाबा पैंतालीस साल बाद एक साथ बैठे — उसी शाम गली के मुँह पर सफ़ेद गाड़ी दो घंटे खड़ी रही थी।
जिस दिन कलीम और रामदीन ने पीपल के कोटर वाला डिब्बा खोला — उसी रात अस्पताल के गेट पर नया पीला नोटिस लगा था।
हाफ़िज़ बाबा और पंडित ब्रजकिशोर की पुरानी दुश्मनी टूटी — और उसके तीन दिन बाद स्कूल की छत की रिपोर्ट आई।
इब्राहीम चाचा और बृजमोहन बाबा — और फिर दुकान पर रणवीर का नया चमकदार बोर्ड।
नबी चाचा और श्यामलाल काका — और फिर दवा सूची से सल्लू चाचा का नाम कटा।
क़ादिर और बद्री — और फिर बीस दिन वाली सूची।
हर जोड़। हर बार। और हर बार वही सवाल, जो मैंने उस वक़्त हल्के में लिया था — भई, रणवीर आख़िर हर जगह क्यों फँसा हुआ है?
अब जवाब सामने था, और वो जवाब बहुत बदसूरत था। रणवीर हर जगह इसलिए नहीं था कि वो शहर में बड़ा है। रणवीर हर जगह इसलिए था कि मैं उसे बड़ा कर रहा था।
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