The Mysterious Bell – Chapter 1077
“क्या हुआ?” उन्होंने पूछा। “तुम्हारा चेहरा…”
“रणवीर अंदर था,” मैंने कहा।
शालिनी रुक गईं।
“क्या?”
“बक्से के सामने खड़ा था। ताबीज़ पहने हुए। उसने बक्से से बात की, शालिनी। इंसान से नहीं। बक्से से। और कहा — एक और जोड़ बना आज, दो लड़के, बारह अंक, मैंने भी पूरे बारह लिए।”
शालिनी की साँस रुकी। उन्होंने अपना बैग सीने से लगाया, जैसे कोई ढाल पकड़ रही हों।
“तुम्हें पक्का पता है?”
“मैंने अपने कानों से सुना।”
वो कुछ देर चुप खड़ी रहीं। फिर उन्होंने बहुत धीमे से कहा, “तो मेरा शक सही था।”
“कौन सा शक?”
“तुम्हारे गोदाम वाले खाते में जो अक्षर थे — य, पू, बा। मैं सोच रही थी कि ये नामों के टुकड़े हैं।” उन्होंने बैग से एक मुड़ा काग़ज़ निकाला। “रात भर बैठकर मैंने उन्हें गिना। हर बार जब तुम कोई झगड़ा जोड़ते थे, उसी हफ़्ते के खाते में एक नई लकीर बढ़ती थी। और लकीर के आगे वही अक्षर। हर बार।”
मुझे ठंड लगी, और वो ठंड बिजलीघर की हवा से नहीं आई थी।
“मतलब मेरा अच्छा काम किसी के खाते में लिखा जा रहा है।”
शालिनी ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो वकील की आँखों में होती है जब उसे मुकदमा जीतता दिखने लगे, पर मुवक्किल का चेहरा उतरा हुआ हो।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, “अभी यह बात किसी को नहीं बतानी।”
“क्यों?”
“क्योंकि अगर यह सच है, तो हम किसी गली वाले को भी यह नहीं बता सकते। जो आदमी लोगों के जोड़ से खाता भरता है, वो यह भी जानता है कि किस बात से जोड़ टूटता है।”
उनकी बात सही थी। और यही सबसे डरावनी थी।
टिंकू ने मेरी कमीज़ खींची।
“उस्ताद, घंटी।”
मैंने जेब से घंटी निकाली। वो अब भी बर्फ़ जैसी थी। मैंने उसे हथेली में दबाया, गरम करने की कोशिश की, पर वो गरम नहीं हुई।
घर लौटते वक़्त रास्ते में टिंकू ने तीन बार मुँह खोला और तीनों बार मैंने सिर हिलाकर चुप करा दिया। आख़िरी बार उसने कहा, “उस्ताद, बक्से में कुछ है। मुझे पता है। मेरे नाना कहते थे…”
“कल बताना,” मैंने कहा। “आज बस सो जा।”
पर वो नहीं सोया। और मैं भी नहीं सोया।
रात भर मैं चारपाई पर करवटें बदलता रहा। बाहर पीपल की पत्तियाँ हवा में खड़खड़ाती रहीं, और हर बार जब वो खड़खड़ाती थीं, मुझे लगता था कोई दरवाज़ा खुल रहा है।
सुबह मुझे नींद नहीं आई थी, बस आँख बंद थी। और उसी हालत में मैंने शटर के नीचे से आती आवाज़ सुनी — काग़ज़ खिसकने की आवाज़। पतली, हल्की, जैसे कोई जान-बूझकर धीरे से कुछ डाल रहा हो।
मैं उठा। चारपाई से पैर नीचे रखे। ज़मीन ठंडी थी।
बाहर जाकर देखा तो गली में सुबह की वो रोशनी थी, जो हर चीज़ को धुँधला और ईमानदार बना देती है। और शटर के नीचे, ज़मीन पर, एक काग़ज़ पड़ा था।
सफ़ेद। मुड़ा हुआ। ऊपर कोई नाम नहीं, नीचे कोई मुहर नहीं।
मैंने उठाया।
उस पर टाइप किया हुआ था, टेढ़ा-मेढ़ा, जैसे कोई जल्दी में पुरानी टाइप मशीन पर बना रहा हो। बड़ा-सा ऊपर लिखा था — सार्वजनिक भूमि पर अस्थायी निर्माण।
और नीचे:
पीपल के नीचे बना जोड़ केंद्र अवैध अतिक्रमण है। वहाँ बैठकर लोगों को जमा करना, काग़ज़ रखना और सलाह देना नगरपालिका नियमों के खिलाफ़ है। पीपल की ज़मीन सार्वजनिक है और उसे किसी भी निजी या सामूहिक गतिविधि के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। तीन दिन के अंदर जगह खाली कर दी जाए। ऐसा न होने पर सामान ज़ब्त किया जाएगा और कार्रवाई होगी।
तीन दिन।
मैं वहीं खड़ा रह गया, बिल्कुल सुन्न। बस मेरा हाथ उस काग़ज़ को पकड़े था और आँखें बार-बार उस एक लाइन को पढ़ रही थीं — तीन दिन के अंदर जगह खाली कर दी जाए।
कल।
कल मैंने पीपल के नीचे टिंकू और गोलू को बैठाया था। दोनों को एक-एक सच बोलने को कहा था। दोनों ने हाथ मिलाया था। बल्ले की कीलें चटककर गिरी थीं और बल्ला अपने आप जुड़ गया था। घंटी ने कहा था — छोटा जोड़, बारह।
और अगली सुबह, जोड़ केंद्र पर खाली करने का काग़ज़।
मुझे अपनी उँगलियों में ग्रीस महसूस हुई, जो वहाँ नहीं थी। मैंने काग़ज़ को दो बार मोड़ा और जेब में रखा, और कुछ देर ऐसे खड़ा रहा जैसे कोई आदमी अपने ही हाथों को पहचानने की कोशिश कर रहा हो।
पीछे से टिंकू की आवाज़ आई। “उस्ताद? क्या हुआ?”
“कुछ नहीं,” मैंने कहा। और यह मेरा पहला झूठ था उस दिन का। मुझे उस वक़्त पता नहीं था कि यही झूठ आज मुझसे सबसे बड़ी कीमत लेगा।
मैं गुमटी की तरफ़ चला।
शबनम आपा चूल्हे पर केतली रख रही थीं। सुबह की पहली भाप उठ रही थी और उसी भाप में उनका चेहरा थोड़ा नरम लग रहा था।
“इतनी सुबह?” उन्होंने कहा। “कल रात का असर है? चेहरा देखो अपना, जैसे किसी ने तुम्हें कुएँ में डालकर निकाला हो।”
“आपा,” मैंने कहा। “पीपल के नीचे कोई सामान रखता है क्या आजकल?”
उनके हाथ रुक गए। केतली की भाप उनके चश्मे पर जम गई, और उन्होंने उसे पोंछा नहीं।
“ये सवाल क्यों?”
मैंने काग़ज़ उनकी तरफ़ बढ़ाया।
शबनम आपा ने काग़ज़ पढ़ा। धीरे-धीरे। हर लाइन पर रुककर। फिर उन्होंने उसे मेरी तरफ़ वापस किया, और मेरी तरफ़ देखकर कहा, “किसने दिया?”
“शटर के नीचे पड़ा था।”
“किसने दिया?” उन्होंने दोहराया। उनकी आवाज़ वैसी ही थी जैसी तब होती है जब आपा को कुछ पता हो और वो बताना न चाहें।
“मुझे नहीं पता।”
“मुझे पता है।” उन्होंने केतली उतारी, चूल्हा बंद किया, और मेरे सामने आकर खड़ी हो गईं। “ये काग़ज़ वही लाते हैं जो अपना नाम नहीं लिखते। और ये काग़ज़ किसी दफ़्तार से नहीं आता, अंकुश। ये किसी की जेब से आता है और किसी के जेब में ही वापस जाता है।”
“पर इसमें नगरपालिका लिखा है।”
“इसमें कुछ नहीं लिखा।” उन्होंने काग़ज़ पर उँगली रखी। “नंबर नहीं, न तारीख़, न किसी का हस्ताक्षर, न मुहर। बस बड़ी-बड़ी बातें। डराने के लिए बना काग़ज़ है।”
“और अगर कल कोई आकर चबूतरी पर ताला लगा दे?”
शबनम आपा कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रहीं। फिर उन्होंने कहा, “तो ताला लगेगा। और हम उसे खोलेंगे। पर पहले ये बता — तेरे चेहरे पर डर काग़ज़ का है या किसी और चीज़ का?”
मैं चुप रह गया।
“बता,” उन्होंने कहा।
“कल रात मैं बिजलीघर गया था।”
आपा की आँखें सिकुड़ीं।
“घंटी ने मना किया था,” मैंने कहा। “और मैं फिर भी गया।”
वो मेरी तरफ़ देखती रहीं, और उनके चेहरे पर वो भाव आया जो माँ के चेहरे पर आता है जब बेटा कहे कि मैं गिर गया था पर चोट नहीं लगी।
“अंदर क्या देखा?” उन्होंने बहुत धीमे से पूछा।
“रणवीर।”
आपा के हाथ से चिमटी छूट गई। वो धातु की आवाज़ करती हुई ज़मीन पर गिरी और एक बार उछली।
“और?” उन्होंने कहा।
“और बक्से से आवाज़ आई।”
आपा ने एक कदम पीछे रखा। ऐसा नहीं कि वो डरीं — ऐसा कि उन्हें अपना संतुलन चाहिए था।
“मैंने तुमसे कहा था न,” उन्होंने कहा, “उस्ताद ने भी कहा था। ये लोग काग़ज़ नहीं लाते, ये लोग काग़ज़ के बहाने अपना रास्ता बनाते हैं। तुम उनके रास्ते पर खड़े हो गए।”
“आपा…”
“चुप।” उन्होंने हाथ उठाया। “पहले मुझे सोचने दे।”
वो वहीं चूल्हे के पास खड़ी रहीं। उनके होंठ हिल रहे थे पर आवाज़ नहीं आ रही थी। फिर उन्होंने चिमटी उठाई, सीधी की, और गुमटी की मेज़ पर पटक दी — इतनी ज़ोर से कि स्टील की थाली झनझना उठी।
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